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Friday, September 14, 2018

हिन्दी .... नचइयों की मौज !

इक दिन .. मैं ... बिन बुलाये मेहमान की तरह
एक कार्यक्रम के ... दर्शक दीर्घा में जाकर बैठ गया

मैंने देखा ..
कुछ नचइये हिन्दी को नचवा रहे थे

हिन्दी घूँघट में थी
और
नचइये .. हिन्दी संग मदमस्त झूम रहे थे

नचइये किस मद में थे
यह कह पाना मुश्किल है
क्योंकि -
आजकल .. नशे भी कई प्रकार के होते हैं

खैर .. छोड़ो ...

कुछ देर बाद मैंने देखा
हिन्दी .... ब्रा और पेंटी में नाच रही थी
और
नचइये .. मंजीरे, ढोल, नगाड़े, इत्यादि पीट रहे थे

फिर .. कुछ देर बाद ... क्या देखता हूँ

हिन्दी ... ब्रा-पेंटी औ चुनरी में स्टेज पर चुपचाप खड़ी थी
और .. सारे नचइये कुर्सियों में ससम्मान बैठे थे

हॉल में तालियाँ गूँज रही थीं
पुरुस्कार वितरण का समय आ गया, यह सोचकर

मैं ... उठकर चला आया .... ??

~ उदय

Thursday, August 23, 2018

सावधान ...

01

कुछ उट-पुटांग से ख्याल हैं हमारे
तुम्हारे बारे में

दूर रहा करो हमसे
और
सावधान भी

कहीं ऐसा न हो
किसी दिन

जमकर
कोसो हमें .... !

बस
इसे तुम वार्निंग समझ लो ..... !!

~  उदय

02

एक बार
एक गधे को भ्रम हो गया
कि
वह शेर है

बस
फिर क्या था
इसी भ्रम में ..
पाँच साल गुजर गए !

~ उदय

03

अभी तय नहीं है लौटने का वक्त
पर
तय है लौटना

बस
तुम
आस मत छोड़ना !

~ उदय 

Wednesday, August 22, 2018

मन की लहरें ..

01

बहुत तीखी मिर्ची है
वो, खुद को कुछ ऐसा समझती थी

पर
उसे मेरे स्वाद का अंदाजा नहीं था

बस
फिर क्या था .... !

~ उदय

02

तुम्हें देखते ही ...

मुँह में .. पानी-सा आ गया था
और ..
दाँत भी खट्टे हो गए थे

समझ गया था
इमली सा स्वाद है तुम्हारा,

पर
मन नहीं माना .... !

~ उदय

03

कुछ कषैला सा स्वाद है तुम्हारा .. औ खुशबू भी
क्या तुम्हें पता था कॉफ़ी पसंद है मुझे ...........?

~  उदय 

Sunday, August 19, 2018

ये बाजार .. तुम्हारा ही बनाया हुआ है ... ?

इक दिन तुम्हारी भी कीमत लगेगी
तुम भी बिक जाओगे

ये बाजार है
यहाँ -

ईमान
स्वाभिमान
सत्य
सिद्धांत
तन
मन
जिन्दगी
मौत
जिन्दे
मुर्दे
सब बिक जाते हैं, बिक रहे हैं

देखना
इक दिन
तुम्हारी भी बोली लग रही होगी

और
तुम बिक चुके होगे
कोई .. तुम्हें खरीद कर अपने साथ ले जा रहा होगा

ये बाजार .. तुम्हारा ही बनाया हुआ है ... ?

~  उदय

Saturday, August 18, 2018

उस्ताद की उस्तादी

कल
आखिरी 'शो' था 'उस्ताद' का
हो गया, पर्दा गिर गया

लोग निहारते रहे, नम आँखों से
और
'उस्ताद' अलविदा कह गए

यही तो उस्तादी थी 'उस्ताद' की
कि -
उन्हें
आखिरी 'दृश्य' में अलविदा कहना था
और फिर लौटना भी नहीं था

बस
फिर क्या था

इसलिए
उन्होंने
'दृश्य' चुना 'मौत' का
जमाई 'धूनी' ..
पंचतत्वों में, और विलीन हो गए ... !

लोग निहारते रहे, नम आँखों से .... !!

~ उदय

Friday, August 17, 2018

तेरे छूने से

मैं टूटा नहीं था उतना उसके तोड़ने से
जितना मैं बिखर गया हूँ
तेरे छूने से

तू है कौन
ये मुझको बतला दे
मंशा क्या है आने की जतला दे

मैं खास नहीं हूँ
ये भी तुझको मालूम है

तू आम नहीं है
ये भी मुझको मालूम है

क्यूँ बिखेर चला जा रहा है मुझको
बस, तू ..
इतना बतला दे

क्यूँ आया था ...
मंशा क्या थी .. जतला दे .... ?

मैं टूटा नहीं था उतना .... !!

~ उदय

Thursday, August 16, 2018

'अटल' अमर थे, जीवन पथ पर

आम नहीं थे
खास नहीं थे
कुछ तो थे, कुछ हटके थे

कोई नहीं था
कोई नहीं है
उनके कद का, उनके जैसा

कुछ ऐसा किरदार था ...

राह दिखाते, राह बताते, राह बनाते
कदम-कदम पर

'अटल' अमर थे, जीवन पथ पर
न हारे न जीते जग से ... !

~ उदय

Wednesday, August 15, 2018

आजादी

मुबारक हो
तुम्हें .. तुम्हारी .. भाषणी आजादी, कागजी आजादी

हमें तो
एक ऐसी आजादी चाहिए जहाँ -

बोलने ..
उड़ने ..
घूमने ..
फिरने ..
चलने ..
विचरने ..
सोने ..
जगने ..
उठने ..
बैठने ..
लिपटने ..
सिमटने .. की पूरी आजादी हो

कला आजाद हो, कलाकार आजाद हों
धर्म आजाद हों,
संस्कृतियाँ आजाद हों ..... !

~  उदय

Tuesday, August 14, 2018

बेरहम

कौन जानता था, किसने सोचा था
कि
जिन्दगी बेरहम निकल जायेगी
और वक्त ... जालिम
कि -

कभी तन्हाईयाँ होंगी, और हम तन्हा होंगे

वर्ना
हम भी सहेज कर रख लेते कुछ रिश्ते
ये सोच कर
कि -
कभी काम आएंगे ... !

इसके लिए
हमें
बस .. थोड़ा ... खुदगर्ज ही तो बनना था !!

~ उदय

Monday, August 13, 2018

नवाबी ठाठ

पहले .. हजार, दो हजार, पांच हजार फूंका करते थे
शौक पर, शौक से

अब
सौ, दो सौ, तीन सौ ही फूंक पा रहे हैं

क्योंकि -
गरीबी रेखा के नीचे जो पहुँच गए हैं साहब

वजह
वही पुराने नवाबी ठाठ

विदेशी शराब
मंहगी-मंहगी सिगरेट के कश
जंगलों की सैर

ठाठ औ शौक
दोनों अभी भी जिंदा हैं

बस ..
बीपीएल कार्ड जारी नहीं हुआ है

क्योंकि -
साहब आज भी पुरानी कोठी में रहते हैं !

~ उदय

Sunday, August 12, 2018

इक तेरा ही आना बाकी है !

लाइफ में किरदार बहुत से आये हैं
बस
इक तेरा ही आना बाकी है

जो छू कर
इस मृत शरीर में हलचल भर दे

लिपट-सिपट कर
इस शरीर को चंदन कर दे

मरा नहीं हूँ
शायद .. जान अभी भी बाकी है

दो बूँद अमृत की
तेरे होंठों से पीना बाकी है

लाइफ में किरदार .... !

~ उदय

Friday, August 10, 2018

थप्पड़

वक्त ने
खेंच के थप्पड़ मारा है

कब ?
किसे ?
क्यों ?

पता नहीं ...
पर
आवाज गूंज रही है !

तुम प्रधान हो, कोई तुर्रम नहीं हो
संभल के रहो

कहीं ऐसा न हो
तुम्हारा गाल भी तिलमिला जाए !!

~ उदय

Sunday, August 5, 2018

मित्र छाँव है, पूरा एक गाँव है !

मित्र छाँव है, पूरा एक गाँव है
भाई है
पिता है
माँ है
बहन है

मित्र, क्या नहीं है ?

कुआ है
झरना है
बहता पानी है

चौपाल है
स्कूल है
मंदिर है
बाजार है
खेत है
खेल का मैदान है

मित्र, क्या नहीं है ?

धूप है
बरसात है
ठंड है
आग है
मित्र छाँव है, पूरा एक गाँव है !

~ उदय

Friday, August 3, 2018

वक्त वक्त की बात

कभी हम भी किसी की फर्स्ट चॉइस थे
पर
अब ... लास्ट भी नहीं हैं

इसे ही कहते हैं दोस्त
वक्त का बदलना

वक्त जब बदलता है तो
विचार ..
पसंद ..
कभी-कभी तो ईमान भी बदल जाते हैं

लोगों का बदलना छोड़ो दोस्तो
देखो
खुद भी तो कितना बदल गए हो ?

~ उदय

Wednesday, August 1, 2018

मुनासिब घड़ी

नफरत के बीज बो दिए गए थे
बहुत पहले

अब तो
फसल लह-लहा रही है

पर
अभी काटने का वक्त नहीं आया है

फसल
काटी जाएगी
एक मुनासिब घड़ी में .... !

~ उदय

Tuesday, July 31, 2018

दिल्ली से ...

डसने को आतुर, व्याकुल
कुछ नेता
रोज .. फुफकार रहे हैं
दिल्ली से ... ,

साँप नहीं, पर
साँपों से भी ज्यादा जहरीले उनके मंसूबे हैं

कब .. डस लें, लील लें
चितकार रहे हैं

बचो ..
छिपो ..
भागो ..
उनकी आँखें .. तुम पर ही टिकी हुई हैं ... !

~ उदय

Monday, July 30, 2018

रोजी-रोटी

खोपड़ी किस की है
दलित की, पंडित की, ठाकुर की या बनिया की
क्या फर्क पड़ता है

वैसे भी ...
कौनसा हर पंडित विद्वान होता है
और हर ठाकुर बहादुर

खैर .. छोड़ो ...
हम तो सभी को विद्वान और बहादुर मानते हैं

और वैसे भी
कौनसा हमें विद्वानी और बहादुरी से करतब दिखाना है
हमें तो खोपड़ी से दिखाना है

इसलिये
लगाओ एक काला टीका खोपड़ी पे
लटकाओ नींबू और हरी मिर्च
फूँको लोभान

और ..
शुरू करो डमरू की डम-डम
आखिर ... रोजी-रोटी का सवाल .... !!

~ उदय

Sunday, July 29, 2018

कीमत

अभी अलट-पलट के टटोल रहे हैं
परख रहे हैं

सिक्का ..
कहीं खोटा तो नहीं है,

फिर
बाजार में उछाल देंगे

और .. वसूल लेंगे
कीमत मेरी !!

~ उदय

Wednesday, July 25, 2018

तीन इक्के

जिन्दगी भर .. हम ...
दाँव लगाते रहे
कभी जीतते, तो कभी हारते रहे
पर,
कभी नुकसान में नहीं रहे

तमाम उम्र ... एक अफसोस-सा रहा
कि -
कभी तीन इक्के नहीं आये

पर,
कल आये .. हाँ ... तीन इक्के ....
लेकिन
हम हार गए
और,
दुक्की-तिक्की-पंजा .. पत्तों वाला जीत गया

मुफ़लिस चाल थी ..
मुफ़लिस में .. छोटे पत्ते बड़े होते हैं
और .. बड़े छोटे .... !!

~ उदय

Sunday, July 22, 2018

खुबसूरती

सुनो मैडम ..
आपकी खुबसूरती की वजह

कभी लिपस्टिक
कभी पावडर
कभी काजल
कभी बिंदिया
तो कभी चकमक ड्रेस होती है
वर्ना ....

खैर ... छोड़ो ....
ये तो आप भी जानती हैं
कि -
आपका आईना
कभी आपसे झूठ नहीं बोलता ?

~ उदय