कालेज में बीए अंतिम वर्ष के बाद विदाई समारोह के दौरान ...
निधी - राम हम तीन वर्ष एक सांथ पढ़कर निकल रहे हैं, आज कालेज का अंतिम दिन है शायद कल के बाद हमारी मुलाक़ात हो, या ना भी हो, यह हम नहीं जानते हैं !
राम - हाँ, सच कहा तुमने निधी ... पर शायद मुलाक़ात संभव भी हो क्योंकि दुनिया गोल है !
निधी - राम हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं ... शायद दोस्ती के दौरान मुझे तुम ... मुझे तुमसे प्यार भी हो गया है किन्तु मैंने कभी तुमसे कहा नहीं, आज हिम्मत कर कह रही हूँ यदि तुम्हारी हाँ हो तो हम एक सांथ जीवन भी गुजार सकते हैं !
राम - हाँ एक-दो बार मुझे एहसास हुआ है कि तुम मुझे चाहने लगी हो किन्तु ... किन्तु मैं अनदेखी करता रहा ... वजह भी तुम जानती हो, मेरे लिए पढ़ाई कितनी जरुरी थी !
निधी - पर अब पढ़ाई पूरी हो चुकी है, मेरी दिली इच्छा है कि मैं जीवन भर के लिए तुम्हारी हो जाऊं !
राम - मैं जानता हूँ मुझे तुमसे अच्छी लड़की नहीं मिल सकती, और शायद सारे जहां में कोई दूसरी लड़की तुम जैसी होगी भी नहीं ... पर शादी करना मुमकिन नहीं है !
निधी - हाँ, मैं जानती हूँ तुम्हारी पारिवारिक परिस्थितियों को तथा तुम्हारे दायित्वों को ... फिर भी अगर तुम चाहो तो हम दोनों सांथ मिलकर ...
राम - निधी, शायद मुमकिन नहीं है !
निधी - ठीक है, मैं समझती हूँ, ... मेरी शादी कब होगी यह तो मैं नहीं जानती, पर ... शादी के फेरे पड़ने के पहले तक मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा ... जैसे ही हालात बदलें तुम निसंकोच चले आना !
राम - 'रब' जानता है क्या होगा, क्या नहीं ... फिलहाल तो मैं कुछ नहीं कह सकता !
निधी - राम, क्या हम विदा होने के पहले एक बार गले लग सकते हैं ?
राम - आज नहीं, 'रब' ने चाहा तो हम जरुर गले लगेंगे ...
( दोनों एक-दूसरे को कुछ देर देखते रहे ... तथा अगले पल ... दोनों एक-दूसरे को नम आँखों से शुभकामनाएं देते हुए विदा हो गए ... )
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
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Wednesday, November 9, 2011
Monday, September 5, 2011
टुडेज लव : गुरु दक्षिणा !
देश के नामी-गिरामी मीडिया हाऊस के एक एयरकंडीशन आफिस रूम में ...
आशुतोष - आओ, स्मिता आओ ... बैठो ... कैसी हो !
स्मिता - जी, ठीक हूँ, आपके रहते किस बात की चिंता !
आशुतोष - हाँ, वो तो है ... आज क्या मिशन रहा !
स्मिता - कुछ ख़ास नहीं, आज 'टीचर्स डे' था उसी पर एक स्टोरी लगाई है !
आशुतोष - बहुत सुन्दर ... 'टीचर्स डे' ... वेरी गुड ... अरे स्मिता, तुम्हारा भी तो कोई 'गुरु' होगा ... कौन है !
स्मिता - हाँ, जरुर है ... सच बोलूँ ... मेरे तो आप ही 'गुरु' हैं, मैंने आज तक जो कुछ भी सीखा-समझा है वह सब आप से ही सीखा है, आज लगभग ८-९ साल हो गए इस लाइन में काम करते हुए, जब कभी कुछ उलझन लगी मन में, आपके काम करने के तौर-तरीके को याद करते हुए उलझन को सुलझाया ... सच कहूं - आपकी सोच, क्रियाशीलता, फुर्ती, नजरिया, और लगातार घंटों काम करने की आपकी आदत से मैंने बहुत कुछ सीखा है ... आप मेरे 'गुरु' हैं, इसे स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है !
आशुतोष - क्या बात है ... लो आज तक मुझे ही पता नहीं था कि कोई मेरा 'शिष्य' भी है, आई मीन मुझसे कुछ सीख रहा है ... वो भी बिना 'गुरु दक्षिणा' के ... !
स्मिता - इसमें आश्चर्य क्यों ... वो भी 'गुरु दक्षिणा' के लिए ... मांगिये, क्या मांगते हैं आप 'गुरु दक्षिणा' में ... आप जो मांगेगे, वो आपको मिलेगा ... ये मेरा वचन है, मेरी जुबान नहीं पलटेगी ... मैं यह मान लूंगी कि - आज मेरी अग्नि परीक्षा है और मुझे एक 'आदर्श शिष्य' के नाते इस परीक्षा को पास करना है ... आप "जो चाहे" मांग सकते हैं अपनी इस 'शिष्या' से !
आशुतोष - तुमने इतना कह दिया ... बस यही मेरी 'गुरु दक्षिणा' है ... मुझे गर्व है तुम पर ... और अपने आप पर भी कि मेरे पास तुम्हारे जैसी 'शिष्या' है !
स्मिता - सर, आप बात को टालने की कोशिश कर रहे हैं ... अभी तक मैंने जो कुछ भी सीखा है वह अप्रत्यक्ष तौर पर सीखा है, हो सकता है प्रत्यक्ष रूप में भी कुछ सीखने का मौक़ा मिल जाए ... आप ये समझ लीजिये कि - आज आपके माँगने और मेरे देने की परीक्षा है 'गुरु दक्षिणा' ... बताइये, क्या चाहते हैं !
आशुतोष - स्मिता, तुम भी बहुत जिद्दी हो मेरी तरह ... जो ठान लेती हो तो बस ठान लेती हो ... जाने दो, फिर कभी देखेंगे ... !
स्मिता - सर, मैंने कहा न, आज हम दोनों की परीक्षा है ... अब तो आपको मांगना ही पडेगा ... !
आशुतोष - जाने दो ... हो सकता है मैं कोई ऐसी-वैसी "चीज" मांग लूं जो तुम दे न पाओ !
स्मिता - मैंने कहा न सर, यह भी एक परीक्षा है ... या तो आप, या तो मैं, या फिर हम दोनों ही पास होंगे !
आशुतोष - ऐसा है क्या ... ( कुछ देर सन्नाटे का माहौल रहा फिर आशुतोष की जुबान से धीरे धीरे कुछ निकला ) ... ऐसा है तो सुनो ... यदि तुम कह रही हो कि यह परीक्षा है तो समझ लो परीक्षा ही है ... सुनो - यह एक पहेली है, मैं इसमें कुछ मांग रहा हूँ और तुमको समझना है कि मैं क्या मांग रहा हूँ ... सुनो, गौर से सुनो - "तुम मुझे कोई ऐसी "चीज" दो, जो तुम मुझे दे भी दो, मुझे मिल भी जाए, और वह "चीज" तुम्हारी ही बने रहे !"
( आफिस में सन्नाटा पसर गया ... क्या पहेली है ... क्या माँगा है ... एक 'गुरु' ने एक 'शिष्या' से ... लगभग ४०-४५ मिनट सन्नाटा पसरा रहा ... दोनों ओर से खामोशी बिखरी रही ... इस बीच दोनों ने थर्मस से निकाल निकाल कर दो-दो कप ब्लेक-टी भी पी ली ... फिर स्मिता ने आशुतोष की आँखों में आँखे डालते हुए चुप्पी तोडी ... )
स्मिता - सर, मानना पडेगा आपको, आप सचमुच महान हैं, मैं जितना सोचती थी आप उससे भी कहीं ज्यादा बुद्धिमान हैं ... मैं आपकी बुद्धिमता को 'सैल्यूट' करती हूँ ... यह सिर्फ एक पहेली नहीं वरन आपकी बुद्धिमता की एक झलक है ... आपको जो गर्व मुझे एक 'शिष्या' के रूप में पाकर महसूस हुआ है, निसंदेह आपको साक्षात 'गुरु' के रूप में पाकर तथा आपको 'गुरु दक्षिणा' देकर मुझे भी उतना ही गर्व होगा ... यहाँ 'ताज', 'ओबेराय' या और कहीं समय खराब करने से बेहतर होगा कि - 'गुरु-शिष्य' दोनों 'गुरु दक्षिणा' के लिए २-३ दिनों के लिए सिंगापुर, न्यूजीलैंड, स्वीटजरलैंड या कहीं और ... जहां आप चाहो ... !
( बात पूरी होते होते, कहते कहते, सुनते सुनते ... दोनों अपनी अपनी कुर्सी से उठकर 'टीचर्स डे' की बधाई देते हुए एक-दूसरे के गले लग गए ! )
आशुतोष - आओ, स्मिता आओ ... बैठो ... कैसी हो !
स्मिता - जी, ठीक हूँ, आपके रहते किस बात की चिंता !
आशुतोष - हाँ, वो तो है ... आज क्या मिशन रहा !
स्मिता - कुछ ख़ास नहीं, आज 'टीचर्स डे' था उसी पर एक स्टोरी लगाई है !
आशुतोष - बहुत सुन्दर ... 'टीचर्स डे' ... वेरी गुड ... अरे स्मिता, तुम्हारा भी तो कोई 'गुरु' होगा ... कौन है !
स्मिता - हाँ, जरुर है ... सच बोलूँ ... मेरे तो आप ही 'गुरु' हैं, मैंने आज तक जो कुछ भी सीखा-समझा है वह सब आप से ही सीखा है, आज लगभग ८-९ साल हो गए इस लाइन में काम करते हुए, जब कभी कुछ उलझन लगी मन में, आपके काम करने के तौर-तरीके को याद करते हुए उलझन को सुलझाया ... सच कहूं - आपकी सोच, क्रियाशीलता, फुर्ती, नजरिया, और लगातार घंटों काम करने की आपकी आदत से मैंने बहुत कुछ सीखा है ... आप मेरे 'गुरु' हैं, इसे स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है !
आशुतोष - क्या बात है ... लो आज तक मुझे ही पता नहीं था कि कोई मेरा 'शिष्य' भी है, आई मीन मुझसे कुछ सीख रहा है ... वो भी बिना 'गुरु दक्षिणा' के ... !
स्मिता - इसमें आश्चर्य क्यों ... वो भी 'गुरु दक्षिणा' के लिए ... मांगिये, क्या मांगते हैं आप 'गुरु दक्षिणा' में ... आप जो मांगेगे, वो आपको मिलेगा ... ये मेरा वचन है, मेरी जुबान नहीं पलटेगी ... मैं यह मान लूंगी कि - आज मेरी अग्नि परीक्षा है और मुझे एक 'आदर्श शिष्य' के नाते इस परीक्षा को पास करना है ... आप "जो चाहे" मांग सकते हैं अपनी इस 'शिष्या' से !
आशुतोष - तुमने इतना कह दिया ... बस यही मेरी 'गुरु दक्षिणा' है ... मुझे गर्व है तुम पर ... और अपने आप पर भी कि मेरे पास तुम्हारे जैसी 'शिष्या' है !
स्मिता - सर, आप बात को टालने की कोशिश कर रहे हैं ... अभी तक मैंने जो कुछ भी सीखा है वह अप्रत्यक्ष तौर पर सीखा है, हो सकता है प्रत्यक्ष रूप में भी कुछ सीखने का मौक़ा मिल जाए ... आप ये समझ लीजिये कि - आज आपके माँगने और मेरे देने की परीक्षा है 'गुरु दक्षिणा' ... बताइये, क्या चाहते हैं !
आशुतोष - स्मिता, तुम भी बहुत जिद्दी हो मेरी तरह ... जो ठान लेती हो तो बस ठान लेती हो ... जाने दो, फिर कभी देखेंगे ... !
स्मिता - सर, मैंने कहा न, आज हम दोनों की परीक्षा है ... अब तो आपको मांगना ही पडेगा ... !
आशुतोष - जाने दो ... हो सकता है मैं कोई ऐसी-वैसी "चीज" मांग लूं जो तुम दे न पाओ !
स्मिता - मैंने कहा न सर, यह भी एक परीक्षा है ... या तो आप, या तो मैं, या फिर हम दोनों ही पास होंगे !
आशुतोष - ऐसा है क्या ... ( कुछ देर सन्नाटे का माहौल रहा फिर आशुतोष की जुबान से धीरे धीरे कुछ निकला ) ... ऐसा है तो सुनो ... यदि तुम कह रही हो कि यह परीक्षा है तो समझ लो परीक्षा ही है ... सुनो - यह एक पहेली है, मैं इसमें कुछ मांग रहा हूँ और तुमको समझना है कि मैं क्या मांग रहा हूँ ... सुनो, गौर से सुनो - "तुम मुझे कोई ऐसी "चीज" दो, जो तुम मुझे दे भी दो, मुझे मिल भी जाए, और वह "चीज" तुम्हारी ही बने रहे !"
( आफिस में सन्नाटा पसर गया ... क्या पहेली है ... क्या माँगा है ... एक 'गुरु' ने एक 'शिष्या' से ... लगभग ४०-४५ मिनट सन्नाटा पसरा रहा ... दोनों ओर से खामोशी बिखरी रही ... इस बीच दोनों ने थर्मस से निकाल निकाल कर दो-दो कप ब्लेक-टी भी पी ली ... फिर स्मिता ने आशुतोष की आँखों में आँखे डालते हुए चुप्पी तोडी ... )
स्मिता - सर, मानना पडेगा आपको, आप सचमुच महान हैं, मैं जितना सोचती थी आप उससे भी कहीं ज्यादा बुद्धिमान हैं ... मैं आपकी बुद्धिमता को 'सैल्यूट' करती हूँ ... यह सिर्फ एक पहेली नहीं वरन आपकी बुद्धिमता की एक झलक है ... आपको जो गर्व मुझे एक 'शिष्या' के रूप में पाकर महसूस हुआ है, निसंदेह आपको साक्षात 'गुरु' के रूप में पाकर तथा आपको 'गुरु दक्षिणा' देकर मुझे भी उतना ही गर्व होगा ... यहाँ 'ताज', 'ओबेराय' या और कहीं समय खराब करने से बेहतर होगा कि - 'गुरु-शिष्य' दोनों 'गुरु दक्षिणा' के लिए २-३ दिनों के लिए सिंगापुर, न्यूजीलैंड, स्वीटजरलैंड या कहीं और ... जहां आप चाहो ... !
( बात पूरी होते होते, कहते कहते, सुनते सुनते ... दोनों अपनी अपनी कुर्सी से उठकर 'टीचर्स डे' की बधाई देते हुए एक-दूसरे के गले लग गए ! )
Sunday, July 24, 2011
टुडेज लव : शायद वक्त को यही मंजूर था !
लगभग एक सप्ताह बाद राज अपने गाँव से लौट कर शहर आया तथा प्रिया से मिला, मिलते ही उसने बिना संकोच किये बेझिझक पिछले एक सप्ताह की आपबीती सुनाई, राज की बातें सुनकर प्रिया की आँखे डबडबा गईं, कुछ देर के सन्नाटे के बाद प्रिया ने बोलना शुरू किया ...
... राज मुझे माफ़ कर दो, शायद यह हमारी आखरी मुलाक़ात है कल तक मैं तुमसे मिलते रही बेहिचक - बेझिझक, शायद इसलिए कि हम दोनों एक दूसरे से बेइंतेहा प्यार करते थे, ऐसा नहीं है कि आज हमारे बीच प्यार अचानक समाप्त हो गया, प्यार समाप्त हुआ या नहीं यह तो मैं नहीं जानती पर यह सच है कि यह हमारी आखरी मुलाक़ात है शायद हम आज के बाद बिलकुल भी न मिलें . तुम जानते हो हमारे न मिलने की बजह, मैं तुमसे प्यार करती हूँ शायद आगे भी करती रहूँ या फिर धीरे धीरे मेरा प्यार ख़त्म हो जाए, ख़त्म हो जाए तो ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि अब आज के बाद हमारी जिन्दगी में एक दूसरे की कोई जगह नहीं रही. कल तक की बात और थी हम मिलते रहे अपनी अपनी सहुलियत और जरुरत के अनुसार, पर आज वो समय नहीं रहा, जैसा आज से एक सप्ताह पहले तक था जब तुम गाँव गए थे मैं खुद तुमको स्टेशन तक छोड़ने गई थी पर कल जब तुम गाँव से वापस आए हो तब अकेले नहीं आए हो, मेरा राज नहीं आया है जिसे मैंने स्वयं स्टेशन जाकर विदा किया था, वह राज चला गया मेरे जीवन से कहीं दूर चला गया, आज जो राज मेरे सामने खडा है वह मेरा नहीं वरन मीना का राज है, जिस पल तुम्हारी शादी हुई मीना के सांथ ठीक उसी पल से तुम प्रिया के राज नहीं रहे, आई मीन आज से तुम्हारी यह प्रिया अकेली है, मैं तुम्हें दोष नहीं देती और न ही तुम्हें कसूरवार ठहराती हूँ, शायद तुम्हारी जगह कोई और होता तो वह भी शायद वही करता जो तुमने किया या यूं कहूं मैं भी होती तो शायद यही करती, यदि तुम्हारी जगह मेरे पिता भी जीवन की अंतिम साँसे गिन रहे होते, उन्हें भी अचानक हार्ट अटैक आया होता तो शायद मैं भी उनका दिल व मान रखने के लिए जहां वो कहते वहां शादी कर लेती. तुमसे कोई गलती नहीं हुई है आई मीन तुम्हारी कोई गलती नहीं है तुमने जो किया वह उन हालात में जायज था शायद वक्त को यही मंजूर था, तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को नए जीवन की शुभकामनाएं ...
... प्रिया अपनी बात ख़त्म कर अपने आंसू पौंछते पौंछते चली गई जाते जाते उसने राज को पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, राज खामोश खडा देखता रहा !!
... राज मुझे माफ़ कर दो, शायद यह हमारी आखरी मुलाक़ात है कल तक मैं तुमसे मिलते रही बेहिचक - बेझिझक, शायद इसलिए कि हम दोनों एक दूसरे से बेइंतेहा प्यार करते थे, ऐसा नहीं है कि आज हमारे बीच प्यार अचानक समाप्त हो गया, प्यार समाप्त हुआ या नहीं यह तो मैं नहीं जानती पर यह सच है कि यह हमारी आखरी मुलाक़ात है शायद हम आज के बाद बिलकुल भी न मिलें . तुम जानते हो हमारे न मिलने की बजह, मैं तुमसे प्यार करती हूँ शायद आगे भी करती रहूँ या फिर धीरे धीरे मेरा प्यार ख़त्म हो जाए, ख़त्म हो जाए तो ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि अब आज के बाद हमारी जिन्दगी में एक दूसरे की कोई जगह नहीं रही. कल तक की बात और थी हम मिलते रहे अपनी अपनी सहुलियत और जरुरत के अनुसार, पर आज वो समय नहीं रहा, जैसा आज से एक सप्ताह पहले तक था जब तुम गाँव गए थे मैं खुद तुमको स्टेशन तक छोड़ने गई थी पर कल जब तुम गाँव से वापस आए हो तब अकेले नहीं आए हो, मेरा राज नहीं आया है जिसे मैंने स्वयं स्टेशन जाकर विदा किया था, वह राज चला गया मेरे जीवन से कहीं दूर चला गया, आज जो राज मेरे सामने खडा है वह मेरा नहीं वरन मीना का राज है, जिस पल तुम्हारी शादी हुई मीना के सांथ ठीक उसी पल से तुम प्रिया के राज नहीं रहे, आई मीन आज से तुम्हारी यह प्रिया अकेली है, मैं तुम्हें दोष नहीं देती और न ही तुम्हें कसूरवार ठहराती हूँ, शायद तुम्हारी जगह कोई और होता तो वह भी शायद वही करता जो तुमने किया या यूं कहूं मैं भी होती तो शायद यही करती, यदि तुम्हारी जगह मेरे पिता भी जीवन की अंतिम साँसे गिन रहे होते, उन्हें भी अचानक हार्ट अटैक आया होता तो शायद मैं भी उनका दिल व मान रखने के लिए जहां वो कहते वहां शादी कर लेती. तुमसे कोई गलती नहीं हुई है आई मीन तुम्हारी कोई गलती नहीं है तुमने जो किया वह उन हालात में जायज था शायद वक्त को यही मंजूर था, तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को नए जीवन की शुभकामनाएं ...
... प्रिया अपनी बात ख़त्म कर अपने आंसू पौंछते पौंछते चली गई जाते जाते उसने राज को पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, राज खामोश खडा देखता रहा !!
टुडेज लव सीरीज की अन्य पोस्टें ...
Monday, July 11, 2011
टुडेज लव : पुलों की चाहतें !
एक न्यूज चैनल के कार्यालय पर शाम ६.०५ बजे एडिटर के चैंबर के दरवाजे को नाक कर दरवाजा खोलते हुए एक महिला रिपोर्टर ...
रिपोर्टर - में आई कम इन सर !
एडिटर - हाँ, अन्दर आ जाओ श्वेता, बैठो, चाय या काफी !
रिपोर्टर - सर, जी नहीं, शुक्रिया, बस घर जाने का टाईम हो गया है, वो तो आपने, काम के बाद मिल कर जाने को कहा था, इसलिए आई हूँ !
एडिटर - श्वेता आपको तो पता ही होगा कि अपने सब-एडिटर राजेश, इस सन्डे से दूसरे चैनल को ज्वाईन करने वाले हैं, वह पोस्ट खाली होने वाली है !
रिपोर्टर - जी सर, यह खबर सब जानते हैं राजेश जी को बड़ा आफर आया है इसलिए वो यहाँ से जा रहे हैं !
एडिटर - शायद तुमको यह पता नहीं होगा कि अपना अगला सब-एडिटर कौन होगा !
रिपोर्टर - हाँ सर यह तो किसी को ... मतलब मुझे नहीं मालुम है !
एडिटर - अभी एक घंटे पहले ही मेरी बॉस के सांथ मीटिंग हुई है ... उन्होंने मेरी राय जानना चाही है कि इस पोस्ट के लिए अपना राकेश कैसा रहेगा ... राकेश तुम्हारा कलिग जो तुम्हारा क्लासमेट भी रहा है ... किन्तु मैंने अभी अपनी राय दी नहीं है मैंने कहा कि कल शाम तक बताता हूँ !
रिपोर्टर - सर ... फिर आप क्या सोच रहे हैं !
एडिटर - श्वेता ... मैं यह सोच रहा हूँ कि पिछले ५ सालों से तुम दोनों मेरे सांथ काम कर रहे हो, दोनों ही काम-काज में एक्सपर्ट हो ... बस कुछेक मामलों में ही राजेश तुम से बीस बैठता है ... पर तुम भी इस पोस्ट को डिजर्व तो करती हो ... !
रिपोर्टर - मैं समझी नहीं आपका मतलब ... मेरा मतलब, बॉस राजेश को ही क्यों प्रिफर कर रहे हैं ... खैर मुझे पता है कि आपकी राय के बगैर बॉस खुद कोई फैसला नहीं करेंगे ... जब आपने यह चर्चा मेरे सामने छेड़ी है तो इसके पीछे आपका कोई न कोई मकसद जरुर होगा ... ( लगभग १-२ मिनट के सन्नाटे के बाद श्वेता बोली ) ... सर, आप चाहते क्या हैं, मेरा मतलब यदि यह पोस्ट मुझे ... बदले में आपकी चाहत क्या है मुझसे ?
एडिटर - देखो श्वेता ... तुम मुझे पिछले पांच सालों से जान रही हो, मैं साफ़-सुथरे ढंग से निष्पक्ष रूप से काम करने में विश्वास रखता हूँ ... मेरे कैरियर में अब तक कोई दाग-धब्बा नहीं है और आगे भी न हो यह ही मेरी कार्यशैली रहती है ... अब तुम मुझसे पूंछ ही रही हो कि मैं चाहता क्या हूँ, तो सुनो ( ... लगभग आधा-एक मिनट शांत रहने के बाद बोले ... ) ... मैं चाहतों के पुल बनाने में विश्वास नहीं रखता किन्तु पुलों पर चाहतें हों इस बात से इंकार भी नहीं करता ... बस, तुम सब-एडिटर के पद को डिजर्व करती हो इसलिए मैंने यह चर्चा तुम्हारे सामने छेड़ना मुनासिब समझा ... !
( चैंबर में लगभग ५-७ मिनट तक सन्नाटा पसरा रहा, दोनों एक-दूसरे को बीच बीच में निहारते, और कुछ सोच-विचार में उलझे रहे, फिर अचानक श्वेता ने चुप्पी तोडी ... )
... ठीक है सर ... यदि मैं इस पोस्ट को डिजर्व करती हूँ तो समझो करती ही हूँ ... जब करती हूँ तो कोई और कैसे इस पद पर बैठ सकता है ... ( ... श्वेता अपनी कुर्सी से उठ कर एडिटर के हाँथ को पकड़ कर चूमते हुए ... ) ... ओके माय डीयर पुष्कर ... तुम पुल बनाओ और मैं पुलों पर चाहतें ... !!
रिपोर्टर - में आई कम इन सर !
एडिटर - हाँ, अन्दर आ जाओ श्वेता, बैठो, चाय या काफी !
रिपोर्टर - सर, जी नहीं, शुक्रिया, बस घर जाने का टाईम हो गया है, वो तो आपने, काम के बाद मिल कर जाने को कहा था, इसलिए आई हूँ !
एडिटर - श्वेता आपको तो पता ही होगा कि अपने सब-एडिटर राजेश, इस सन्डे से दूसरे चैनल को ज्वाईन करने वाले हैं, वह पोस्ट खाली होने वाली है !
रिपोर्टर - जी सर, यह खबर सब जानते हैं राजेश जी को बड़ा आफर आया है इसलिए वो यहाँ से जा रहे हैं !
एडिटर - शायद तुमको यह पता नहीं होगा कि अपना अगला सब-एडिटर कौन होगा !
रिपोर्टर - हाँ सर यह तो किसी को ... मतलब मुझे नहीं मालुम है !
एडिटर - अभी एक घंटे पहले ही मेरी बॉस के सांथ मीटिंग हुई है ... उन्होंने मेरी राय जानना चाही है कि इस पोस्ट के लिए अपना राकेश कैसा रहेगा ... राकेश तुम्हारा कलिग जो तुम्हारा क्लासमेट भी रहा है ... किन्तु मैंने अभी अपनी राय दी नहीं है मैंने कहा कि कल शाम तक बताता हूँ !
रिपोर्टर - सर ... फिर आप क्या सोच रहे हैं !
एडिटर - श्वेता ... मैं यह सोच रहा हूँ कि पिछले ५ सालों से तुम दोनों मेरे सांथ काम कर रहे हो, दोनों ही काम-काज में एक्सपर्ट हो ... बस कुछेक मामलों में ही राजेश तुम से बीस बैठता है ... पर तुम भी इस पोस्ट को डिजर्व तो करती हो ... !
रिपोर्टर - मैं समझी नहीं आपका मतलब ... मेरा मतलब, बॉस राजेश को ही क्यों प्रिफर कर रहे हैं ... खैर मुझे पता है कि आपकी राय के बगैर बॉस खुद कोई फैसला नहीं करेंगे ... जब आपने यह चर्चा मेरे सामने छेड़ी है तो इसके पीछे आपका कोई न कोई मकसद जरुर होगा ... ( लगभग १-२ मिनट के सन्नाटे के बाद श्वेता बोली ) ... सर, आप चाहते क्या हैं, मेरा मतलब यदि यह पोस्ट मुझे ... बदले में आपकी चाहत क्या है मुझसे ?
एडिटर - देखो श्वेता ... तुम मुझे पिछले पांच सालों से जान रही हो, मैं साफ़-सुथरे ढंग से निष्पक्ष रूप से काम करने में विश्वास रखता हूँ ... मेरे कैरियर में अब तक कोई दाग-धब्बा नहीं है और आगे भी न हो यह ही मेरी कार्यशैली रहती है ... अब तुम मुझसे पूंछ ही रही हो कि मैं चाहता क्या हूँ, तो सुनो ( ... लगभग आधा-एक मिनट शांत रहने के बाद बोले ... ) ... मैं चाहतों के पुल बनाने में विश्वास नहीं रखता किन्तु पुलों पर चाहतें हों इस बात से इंकार भी नहीं करता ... बस, तुम सब-एडिटर के पद को डिजर्व करती हो इसलिए मैंने यह चर्चा तुम्हारे सामने छेड़ना मुनासिब समझा ... !
( चैंबर में लगभग ५-७ मिनट तक सन्नाटा पसरा रहा, दोनों एक-दूसरे को बीच बीच में निहारते, और कुछ सोच-विचार में उलझे रहे, फिर अचानक श्वेता ने चुप्पी तोडी ... )
... ठीक है सर ... यदि मैं इस पोस्ट को डिजर्व करती हूँ तो समझो करती ही हूँ ... जब करती हूँ तो कोई और कैसे इस पद पर बैठ सकता है ... ( ... श्वेता अपनी कुर्सी से उठ कर एडिटर के हाँथ को पकड़ कर चूमते हुए ... ) ... ओके माय डीयर पुष्कर ... तुम पुल बनाओ और मैं पुलों पर चाहतें ... !!
Thursday, July 7, 2011
टुडेज लव : डोंट वरी, मिलते रहेंगे !!
प्रिया - राज तुम मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम से शादी नहीं कर सकती !
राज - ऐसा क्या हुआ, मुझसे क्या गलती हो गई, जो तुम अचानक ही ... मैं जानता हूँ तुम मुझे उतना ही प्यार करती हो जितना मैं तुम्हें चाहता हूँ !
प्रिया - बेहतर होगा, तुम मुझे भूल जाओ ... सिर्फ मुझे ही नहीं, मेरे प्यार को भी ... मैं आज के बाद ... शायद तुम से न मिलूं, प्यार तो बहुत दूर की बात है, प्लीज !
राज - ... प्रिया ... प्लीज ... मैं तुम्हें, अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ, तुम्हारे बगैर ... शायद जी न सकूं ... प्लीज, ऐसा मत कहो, आखिर तुम भी तो मुझे बे-इन्तेहा चाहती रही हो ... तुम मुझे कैसे भूल सकती हो !
प्रिया - सुनो राज, अब इन बातों का कोई मतलब नहीं है, बेहतर होगा तुम मुझे भूल ही जाओ ... और तुम अपने कैरियर के लिए तैयारी करो ... मैं अब तुमसे प्यार नहीं करती ... और शायद आज ये मेरी तुमसे आख़िरी मुलाक़ात है ... अब मैं जा रही हूँ ... प्लीज !
राज - तुम मुझे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती ... हमारा तीन साल का प्यार, एक पल में कैसे ख़त्म हो सकता है ... तुम्हें मुझे बजह बतानी ही पड़ेगी, मैं तुम्हें ऐसे जाने नहीं दूंगा !
प्रिया - प्लीज राज, तुम मुझे भूल जाओ, मेरे घर वाले शादी के लिए जिद कर रहे हैं ... और तुम जानते हो कि मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मैं सुनील से अगले हफ्ते शादी कर रही हूँ ... तुम जानते हो सुनील को !
राज - उस सुनील से ... करोड़पति बाप की बिगड़ी औलाद से ... तुम्हारा उससे कई बार झगड़ा भी हो चुका है और तुम उसे पसंद भी नहीं करती हो ... उसका चाल-चलन कितना खराब है ... और वो तुम्हें प्यार भी नहीं दे सकता, न जाने कितनी लड़कियों के सांथ फ्लर्ट ... !
प्रिया - सुनो राज ... प्लीज ... मुझे माफ़ कर दो ... मुझे भूल जाओ ... ( लगभग ५-७ मिनट के सन्नाटे के बाद प्रिया अपने हाँथ को राज से छुडाते हुए ) ... राज सिर्फ प्यार ही काफी नहीं होता जीने के लिए ... प्लीज ... टेक केयर ... ओके बाय ... ( चलते चलते प्रिया राज को देखते हुए हाँथ उठाकर बाय करते हुए अपनी बांई आँख मारते हुए बोली ) ... डोंट वरी, मिलते रहेंगे !!
राज - ऐसा क्या हुआ, मुझसे क्या गलती हो गई, जो तुम अचानक ही ... मैं जानता हूँ तुम मुझे उतना ही प्यार करती हो जितना मैं तुम्हें चाहता हूँ !
प्रिया - बेहतर होगा, तुम मुझे भूल जाओ ... सिर्फ मुझे ही नहीं, मेरे प्यार को भी ... मैं आज के बाद ... शायद तुम से न मिलूं, प्यार तो बहुत दूर की बात है, प्लीज !
राज - ... प्रिया ... प्लीज ... मैं तुम्हें, अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ, तुम्हारे बगैर ... शायद जी न सकूं ... प्लीज, ऐसा मत कहो, आखिर तुम भी तो मुझे बे-इन्तेहा चाहती रही हो ... तुम मुझे कैसे भूल सकती हो !
प्रिया - सुनो राज, अब इन बातों का कोई मतलब नहीं है, बेहतर होगा तुम मुझे भूल ही जाओ ... और तुम अपने कैरियर के लिए तैयारी करो ... मैं अब तुमसे प्यार नहीं करती ... और शायद आज ये मेरी तुमसे आख़िरी मुलाक़ात है ... अब मैं जा रही हूँ ... प्लीज !
राज - तुम मुझे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती ... हमारा तीन साल का प्यार, एक पल में कैसे ख़त्म हो सकता है ... तुम्हें मुझे बजह बतानी ही पड़ेगी, मैं तुम्हें ऐसे जाने नहीं दूंगा !
प्रिया - प्लीज राज, तुम मुझे भूल जाओ, मेरे घर वाले शादी के लिए जिद कर रहे हैं ... और तुम जानते हो कि मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मैं सुनील से अगले हफ्ते शादी कर रही हूँ ... तुम जानते हो सुनील को !
राज - उस सुनील से ... करोड़पति बाप की बिगड़ी औलाद से ... तुम्हारा उससे कई बार झगड़ा भी हो चुका है और तुम उसे पसंद भी नहीं करती हो ... उसका चाल-चलन कितना खराब है ... और वो तुम्हें प्यार भी नहीं दे सकता, न जाने कितनी लड़कियों के सांथ फ्लर्ट ... !
प्रिया - सुनो राज ... प्लीज ... मुझे माफ़ कर दो ... मुझे भूल जाओ ... ( लगभग ५-७ मिनट के सन्नाटे के बाद प्रिया अपने हाँथ को राज से छुडाते हुए ) ... राज सिर्फ प्यार ही काफी नहीं होता जीने के लिए ... प्लीज ... टेक केयर ... ओके बाय ... ( चलते चलते प्रिया राज को देखते हुए हाँथ उठाकर बाय करते हुए अपनी बांई आँख मारते हुए बोली ) ... डोंट वरी, मिलते रहेंगे !!
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