Wednesday, September 15, 2010

... जय जय लोकतंत्र !!!

... तालियों की गड-गडगडाहट के साथ भाषण शुरू ... राष्ट्र, राज्य, संभाग, जिले के संचालक, पालनहार, प्रमुख, प्रधान, मठाधीश बगैरह बगैरह ... दूसरे शब्दों में इन्हें एक आम इंसान "माई-बाप" की संज्ञा देता है ... इनके ही भरोसे देश चल रहा है अर्थात इनके ही हाथों में बागडोर है, ये जैसा चाहें वैसा संचालन करेंगे और संचालन कर रहे हैं ... बागडोर खिंच रही है और देश चल भी रहा है पर ... अब यहाँ ये पर कहाँ से गया ... पर का आना लाजिमी है क्योंकि देश चल तो रहा है पर विकास दिखाई नहीं दे रहा, विकास हो भी रहा है तो कागजों में, फाइलों में ... पर भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार, शोषण, कालाबाजारी, मिलावटखोरी, मारामारी, सार्वजनिक अर्थात जगजाहिर है

यह खेल कोई लुके-छिपे नहीं चल रहा वरन खुल्लम-खुल्ला चल रहा है ... चल भी इसलिए रहा है क्योंकि सभी मिलकर चला रहे हैं, जिस काम को सिस्टम के सभी मठाधीश मिलकर चलायें भला उसे कोई कैसे रोक सकता है, अगर कोई रोकने का दुस्साहस करे भी तो क्या फर्क पड़ता है ... वह दुस्साहस कर समाधान के लिए किसी किसी के सामने तो जाएगा, अब जिसके सामने जाएगा ... वह भी उसी सिस्टम का हिस्सा है, आश्वासन मिलेगा और मिलते रहेगा ... इतनी देर तक आश्वासन मिलते रहेगा जब तक दुस्साहसी का साहस ठंडा पड़ जाए ... ये तो सभी जानते हैं कि जब जोश ठंडा पड़ जाता है तो इंसान बड़े-से-बड़े गुनाह को - गुनाहगार को माफ़ कर देता है, यह एक मानवीय नेचर है

समस्या, समस्या के खिलाफ आवाज, समाधान के लिए आश्वासन पर आश्वासन ... देर-सबेर समस्याओं का ठंडा बस्ता, आखिर कब तक ठंडा बस्ता बनता रहेगा, कब तक आम नागरिकों की आवाज सिस्टम के लचर-पचर, लुंज-पुंज रबईये में गुम होते रहेगी ... लोकतंत्र, प्रजातंत्र, जनतंत्र का क्या यही मतलब है कि चलने दो, चलने दो, जो चल रहा है उसे चलने दो ... आखिर कब तक यह रबैय्या चलता रहेगा, कब तक हम लोकतंत्र की चक्की में पिसते रहेंगे ... या फिर किसी दिन जिनके हांथों में लोकतंत्र की बागडोर है वे खुद ही लोकतंत्र की गिर रही गरिमा को संभालेंगे ... पर ऐसा कब होगा ... क्या हम सच्चे लोकतंत्र को देख पायेंगे !!!

... ( फोन की घंटी बजी ... नींद से जागते हुए ... तकिये से मुंह निकालते हुए ... कालर आई-डी पर नंबर देखते हुए ) ... हाँ भईय्या प्रणाम ... क्यों शाम को पांच बजे तू सो रहा है ... सो रहा हूँ , नहीं भईय्या मैं तो भाषण दे रहा था ... कहाँ भाषण दे रहा है तेरी आवाज सुनकर तो ऐसा लग रहा है जैसे बिस्तर पर पडा है और नींद में है ... नहीं भईय्या मैं तो दिल्ली में गांधी आडिटोरियम हाल में "लोकतंत्र" पर भाषण दे रहा था ... होश में दो घंटे पहले तो तू मुझसे मिलकर गया है फिर दिल्ली कैसे पहुँच जाएगा ... ( भईय्या की बातें सुनकर करेंट सा आया ... खुद को झंकझोरते हुए देखा तो घर के बिस्तर पर देखा ) ... अरे भईय्या आप सच कह रहे हो शायद मैं सपना देख रहा था ... मतलब अब तुम सपने में भी गुल खिलाने लगे हो ... नहीं भईय्या, आज सपना ही सही कल हकीकत में होगा, आज मैंने "लोकतंत्र" पर जो भाषण दिया है अच्छे-अच्छों की बैंड बजा कर रख दी थी, मगर अफसोस ये सब सपने में चल रहा था ...खैर कोई बात नहीं तू निराश मत हो मुझे पता है तू एक दिन "लोकतंत्र " का सच्चा रूप सामने ला कर ही रहेगा ... हाँ भईय्या एक दिन ऐसा ही होगा जय जय लोकतंत्र ... जय जय लोकतंत्र !!!

19 comments:

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

सुन्दर प्रस्तुति,

यहाँ भी पधारें :-
अकेला कलम...

ललित शर्मा said...

शानदार सपना देखा है श्याम भाई
कभी हकीकत में भी बदल सकता है।
भाषण भी जानदार रहा।

Shah Nawaz said...

:-)

Coral said...

बहुत अच्छा भाषण था :)

अच्छी प्रस्तुती

Coral said...

बहुत अच्छा भाषण था :)

अच्छी प्रस्तुती

दिगम्बर नासवा said...

भाई सपना भी क्या चीज़ है .... ग़ज़ब का व्यंग है ....

arvind said...

कब तक आम नागरिकों की आवाज सिस्टम के लचर-पचर, लुंज-पुंज रबईये में गुम होते रहेगी ... अच्छी प्रस्तुती

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब जी

'उदय' said...

@ ललित शर्मा
... ये सपना तो अनुज ने देखा है चलो आप और हम भी कोई सपना संजो लें !!!

S.M.HABIB said...

:) आमीन.(:

Akhtar Khan Akela said...

uday bhaayi aadaab bhaayi pehle to aapka shukriyaa aapkaa yeh mere upr dusraa nhin bhulane vaala ehsaan he ab aap hmare uda bhaayi se uday ustaad ji hue shukriyaa dhnyvad aapki posten pdh kr to hm gyaan arjit kr hi rhe hen lekin aapki in tips ne to hmen lut liyaa. akhtar khan akela kota rajsthan

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

हा हा हा....
ये कमबख्त फोन भी ना! हमेशा ही गलत टाईम पे आता है!
मज़ा आया.....
--
बैचलर पोहा!!!

मनोज कुमार said...

जय जय लोकतंत्र ... जय जय लोकतंत्र !!!

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

dhratrashtra said...

अच्छी प्रस्तुती !

अनामिका की सदायें ...... said...

चलो जो सब के सामने ना कह सके...सपनों में ही कह कर अपने को सुकून दे ले.

सुंदर व्यंग्य.

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

Udan Tashtari said...

शानदार सपना :)

ZEAL said...

बहुत खुब !