कडुवा सच ...
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
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टेलीफोनिक कविता
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Tuesday, October 22, 2013
टेलीफोनिक कविता ...
हैलो …
हाँ …
हाँ …
हूँ …
हाँ …
कौन …
कैसे …
कब …
ओह …
उफ्फ …
हूँ …
हाँ …
हाँ, प्रणाम !
Saturday, January 28, 2012
एक टेलीफोनिक कविता ...
हैलो ...
एं ...
ऊं ...
हाँ ...
एं ...
एं ...
हाँ ...
ऊं ...
हाँ ...
हाँ ...
हाँ ...
ओके बाय !!
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