Thursday, September 9, 2010

अंतिम साँसें ...

लोकतंत्र और आजादी
दोनों इस आस में, खड़े थे
कि -
मीडिया रूपी, अंतिम साँसें
उन्हें, संजो लेंगे, बचा लेंगे !

पर क्या करें
कब तक चलतीं
अंतिम साँसें
कभी तो उखड़ना था
चलो आज ही सही !

अंतिम साँसें
जिन पे आस थी
विश्वास की अंतिम डोर थी
टूट गई डोर
बिखर गई आस
बिक गईं, बिकना ही था
आजादी की, अंतिम साँसों को !

खरीददार जो खड़े थे
कुछ बिक रहे थे
कुछ खरीदे जा रहे थे
फिर कौन
रोक सकता था
बिकने से
अंतिम साँसों को !

बिक गईं
सचमुच बिक गईं
अंतिम साँसें !

क्या करते
कोई दूजा विकल्प
भी नहीं था
बिकने के सिवाय !!

पर बिकने का सिलसिला
रुका नहीं
एक के बाद एक
सब बिकते चले गए
सारी की सारी
अंतिम साँसें, बिक चुकी थीं !

शायद अब
आजादी भी
लोकतंत्र की भांति
निढाल हो, देख रही थी
उसे जीवित रखने वाली
अंतिम साँसों को
बिकते हुए !!!

7 comments:

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

Rahul Singh said...

ग्राहक हों तो बाजार और बाजार लग जाए तो ग्राहक जुटते देर नहीं लगती.

निर्मला कपिला said...

ये सच इतना कडुवा हो गया है कि अब निकगलना भी मुश्किल होता जा रहा है। बहुत अच्छी लगी कविता। शुभकामनायें।

kshama said...

Loktantr me logon kee ekjut ke siwa any vikalp kahan? Ham wo bikhari lakdiyan hain jise koyi bhi tod sakta hai! Waise daad deti hun ki,jaisabhi hai,loktantr abtak bana hua hai!

वन्दना said...

अब तो कडुवा घूँट पीना ही पडता है………………सच दिखाती कविता।

प्रवीण पाण्डेय said...

लोकतन्त्र व स्वतन्त्रता का साम्य आने में बहुत समय लगता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लोकतंत्र और आज़ादी को लेकर एक अच्छी रचना बुनी है ..