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Tuesday, February 7, 2012

विरासत ...

मुझे ...
विरासत में क्या मिला !
शायद कुछ नहीं !!
शायद बहुत कुछ !!!
पर
मैं अपने बच्चों को
विरासत में
कुछ देना चाहता हूँ
पर क्या ?
भ्रष्टाचार व बेईमानी से -
अर्जित संपत्ति ?
या अच्छे संस्कार ??

Tuesday, January 31, 2012

थैंक-यू ...

एक छोटे साब
बड़े साब के आफिस में
नॉक करते हुए -
मे आई कम-इन सर
कहते हुए
जैसे ही घुसे -
ठीक वैसे ही, बड़े साब -
यू ... यू आर ...
इडियट
नानसेंस
केयरलेस ...
यू आर ... सस्पेंडेड !!
वट व्हाय सर ?
नो ... नो ... नो ... गेट आऊट ...
थैंक-यू सर !!!

Monday, January 30, 2012

रण है ! विजय हैं हम !!

हर घड़ी, हैं मोर्चे पे हम
रण है ! विजय हैं हम !!

दिलों में धडकनें हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

खौफ का नाम हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

आख़िरी आस भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

जुनूं हैं, जान भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

विश्वास के प्रतीक हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

फक्र का दौर भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

वतन
की आन हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

वतन की शान हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

Sunday, January 29, 2012

हम हैं, विजय है !!

नक्सली खौफ़ है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

आतंकी दौर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

बारूदी
ढेर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

पहाडी डगर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

ठंड, गर्म, बरसात है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

दहशत का माहौल है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

नक्सली खौफ़ है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

Tuesday, January 24, 2012

वे ऐंसे क्यूँ हैं ?

सुनते हैं,
उनकी कोई आल-औलाद नहीं है
फिर भी
वे किसी को -
प्रेम भरी नजर से नहीं देखते !
सुनते हैं
उन्होंने दौलत भी खूब जमा कर रक्खी है
फिर भी
वे किसी भिखारी को -
अन्न का एक दाना तक नहीं देते !
वे जब भी मुझे नजर आते हैं
मेरे मन में
सवाल कौंधने लगते हैं
कि -
वे ऐंसा क्यूँ करते हैं ? वे ऐंसे क्यूँ हैं ??

Monday, January 23, 2012

गुमान ...

हम
न जाने कब, धीरे धीरे
चट्टान से
रेत के कण हो गए
खबर न हुई !

चलो अच्छा ही हुआ
हमें
चट्टान होने का जो गुमान था
टूट गया !

शायद
अब हम
टूटेंगे नहीं, सिर्फ बिखरेंगे
और फिर
खुद, सिमट भी जाएंगे !!

Friday, January 20, 2012

पूर्णता ...

सच ! जी चाहता है
तेरे -
चमकते
दमकते
ख़ूबसूरत चेहरे पर
कहीं, किनारे -
काजल का टीका लगा कर
माथे पर
एक सिंदूरी बिंदिया लगा दूं !
और कह दूं !!
सभी से
कि -
मेरी कविता पूर्ण हो गई है !!

Wednesday, January 18, 2012

गंगा-स्नान ...

एक दिन मैंने भी सोचा
क्यों न - मैं भी गंगा-स्नान करूँ !
इसलिए,
ब्रह्ममुहूर्त में पहुँच गया, मैं सीधे गंगा तट पे !
पर, वहां भीड़ देख चंडालों की
मैं थोड़ा-सा सहम गया !

सारे गंगा तट पर -
भीड़ बड़ी थी, चोरों और चंडालों की !
डुबक-डुबक ...
भीड़ देख कर मैंने सोचा -
नहीं, अभी नहीं वो घड़ी है आई
कि -
मैं गंगा-स्नान करूँ !!

आज, यहाँ गंगा तट पर -
पाप-पुण्य की बेला है
न जाने -
किसको, क्या मिलना - क्या देना है ?
चहूँ ओर ... डुबक-डुबक ...
चलो चलें ...
देखेंगे, फिर देखेंगे, फिर किसी दिन देखेंगे !
आज नहीं वो बेला है
सच ! आज, गंगा-स्नान झमेला है !!

Saturday, January 14, 2012

लग रहा है अब मकां मिल जाएगा !

आज फिर तन्हाई राहों में दिखे है
दिल कहे है कोई तो मिल जाएगा !

भोर की किरणें सुहानी लग रही हैं
लग रहा है जी मचल ही जाएगा !

ओस की बूँदें भी मन को छू रही हैं
लग रहा है तन पावन हो जाएगा !

धड़क रहा है, दिल मेरा, नाम तेरे
अब कहाँ, वो मेरा रह पायेगा !

चल पड़े हैं, पग मेरे, तेरी डगर को
लग रहा है अब मकां मिल जाएगा !!

Thursday, January 12, 2012

आम आदमी ...

इस बार -
उसका पेट भूखा नहीं था !
इस बार -
उसका गला प्यासा नहीं था !
फिर भी
वह
बहुत बेचैन -
व्याकुल सा नजर आ रहा था !

उसकी बेचैनी -
उबलती
तड़फती
बिलखती
खुंखार-सी नजर आ रही थी !
इस बार -
उसकी आँखें और आत्मा -
दोनों,
भूखी-प्यासी थीं !

वह
खूंखार दरिंदा भी नहीं था
फिर भी
उसे इस तरह देखकर
मेरे मन में
तरह तरह के सवाल -
उठ रहे थे ?

कि -
ये कैसा आम आदमी है
जो
खूंखार दरिंदों से भी जियादा खुंखार -
नजर आ रहा है !
क्यों ? ऐंसा क्यों ?
आम आदमी -
इतना भूखा, प्यासा, खुंखार, ... क्यों है ?

मैंने पूंछा -
क्यों भाई, इतना आक्रोश क्यों है ?
उसकी आँखें और चेहरा -
दोनों, सवाल सुनते ही, तम-तमा उठे !
खून उतर आया हो जैसे
कुछ पल सन्नाटा-सा पसरा रहा
फिर उसके हलक से -
एक आवाज गूंजी ... भ्रष्टाचार !!!

Wednesday, January 11, 2012

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का ...

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !

क्या मिलेगा अब, बन के अंधड़ किसी को
अब कहाँ तिनका रहा मैं, जो तू उड़ाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं सारे जहां का
क्या मिलेगा अब तुझे, जो तू मेरा होना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं खारा समंदर
भला क्यूँ, अब मुझमें तू डुबकी लगाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं वटवृक्ष यारा
भला क्यूँ, अब मुझे तू बहारों की कहानी सुनाना चाहता है !

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !!

Tuesday, January 10, 2012

सवाल ...

सामने खडा हर इंसान
अपने आप में एक सवाल है
वो -
क्यों आया है ?
क्यों खडा है ?
क्या चाहता है ?
जो जुबां पे है उसके, कितना सही है ?
उसने मीठी-मीठी बातें क्यों की हैं ?
उसके अन्दर -
क्या कड़वाहट छिपी हुई है ?
उस पर विश्वास करें, या न करें ?
इतना तो तय है
कि -
वह अनेक सवाल -
अपने सांथ ले कर आया है !
इन सवालों के जवाब -
क्या हमें मिल पाएंगे ??

Monday, January 9, 2012

जागरुक मतदाता ...

कल वोट डलना है, चुनाव है
इसलिए
एक जागरुक मतदाता ने
यह प्रण कर लिया
कि -
वह किसी भ्रष्ट प्रत्याशी -
और किसी भ्रष्ट पार्टी को वोट नहीं देगा !

खुशी-खुशी
वो सीना तान के आया
और उसने हंसते-हंसते अपना हाल सुनाया
हाल सुनकर, मैं सन्न रह गया
कुछ पल को
जागे हुए मतदाता को देखकर
मन प्रसन्न हो गया !

फिर चुपके से मैंने उससे पूंछा -
क्यूँ मियाँ,
किसी भ्रष्टाचारी को वोट नहीं दोगे -
वो तो ठीक है !
पर, ये तो बताते जाओ
कि -
किसे वोट दोगे ?
क्या कोई विकल्प है तुम्हारे पास ??

Sunday, January 8, 2012

गुनाह ...

हे ईश्वर
मेरा क्या गुनाह है, जो आज -
मैं भूखा हूँ !
हूँ तो हूँ, पर क्यूँ हूँ ?
मजदूर हूँ
रोज कमाता हूँ, रोज खाता हूँ !
कल सुबह से
सारा शहर बंद है -
दंगाइयों की वजह से !
कर्फ्यू की वजह से !!
सच ! इस जनम में, मैंने तो -
कोई गुनाह नहीं किये हैं
फिर मैं क्यों भूखा हूँ -
कल रात से ?
कहीं तेरी नजर में भी -
गरीब होना तो गुनाह नहीं है ?

Saturday, January 7, 2012

विकल्प ...

चारों ओर
बड़ी बड़ी दीवारें खड़ी हैं
तुम चीखोगे
तो जरुरी नहीं कि तुम्हारी आवाज
उस ओर
किसी के कानों तक पहुंचेगी !

गर, पहुँच भी गई
तो यह कतई जरुरी नहीं
कि -
जिसके कानों तक पहुँची है
इन दीवारों के बीच
उसकी भी एक दीवार न हो !

इस तरह
तुम्हारी आवाज दब के रह जायेगी
या फिर गूंजती रहेगी
फिर क्या करोगे ?
क्या कोई और विकल्प है -
तुम्हारे पास ??

Friday, January 6, 2012

लाल रंग ...

सुनो, जाओ, हर एक दीवार पे
लाल रंग से
इंकलाब लिख दो !
जो पढ़े-लिखे हैं -
वो तो पढ़कर समझ लेंगे !
और जो अनपढ़ हैं
उन्हें
लाल रंग का मतलब पता है !!

Tuesday, January 3, 2012

ताप ...

फट पडी थी
धरा
ताप के बढ़ जाने से !
हो जाने दो
नम
इसे, तुम हो जाने दो !
इन तूफानों सी
बारिश को
तुम
मत रोको
झरने दो, झर जाने दो !!

शोर ...

शोर
हुआ था बहुत
कान
फटने लगे थे !
मातम का है
या चाहे
जैसा भी सन्नाटा है
रहने दो
कुछ घड़ी इसे तुम
रहने दो !!

Monday, December 26, 2011

साहित्य सेवा ...

मियाँ, आप भी, अपनी एनर्जी -
फालतू
बेफिजूल
इधर-उधर जाया कर रहे हो !

और तो और, ख़ामो-खां
क्यूँ -
किसी से भी लड़-भिड़ रहे हो !

आओ, चले आओ, हमारी 'गैंग' में -
बेझिझक शामिल हो जाओ
कुछ न कुछ
'तमगे' तुम्हें भी मिल जायेंगे !

आखिर ये 'गैंग' -
हम
इसीलिये ही तो चला रहे हैं !!

और नहीं तो क्या !
क्या तुम ये सोच रहे हो
कि -
यहाँ बैठ के -
हम साहित्य सेवा कर रहे हैं !!

Saturday, December 24, 2011

आग ...

ये कैसी आग है ?
जो जब से जली है
तब से -
अब तक, अभी तक जल रही है !!
क्यों ये बुझने नहीं पाई ?
यहाँ पर कौन है ?
जो उससे झुलसा नहीं है ??

ये आग है -
दुशमनी
नफ़रत
भूख
गरीबी
शोषण
ह्त्या
बलात्कार
चोरी, लूट, डकैती, छल, कपट, बेईमानी !!

जिससे, कोई न कोई -
कभी न कभी, किसी न किसी रूप में
झुलसता रहा है !
ऐंसा कौन है ?
जो इससे झुलसा नहीं है !!
ये कैसी आग है ?
जो जब से जली है
तब से -
अब तक, अभी तक जल रही है !!!