Saturday, February 20, 2010

"गुरु-चेले"

"गुरु-चेले" तो सदियों से चले आ रहे हैं और सदियों तक साथ-साथ चलते रहेंगे - दिखते रहेंगे, बात मुद्दे की ये है कि गुरु ने चेले को चेला बनाया या चेले ने गुरु को गुरु बनाया ... सच कहूं तो इस मुद्दे पर लंबी चर्चा-परिचर्चा हो सकती है ... खैर छोडो, असल बात तो ये है कि गुरु के बिना चेले और चेले के बिना गुरु की कल्पना असंभव है जब चेला ही नहीं रहेगा तो गुरु-गुरु कौन चिल्लायेगा और जब गुरु ही न हो तब चेले ... !

"गुरु-चेले" दरअसल पैदा नही किये जाते अपने आप हो जाते हैं जिस तरह नदी बहते-बहते समुद्र में समा जाती है ठीक उसी तरह गुरुओं और चेलों का मिलन स्वमेव हो जाता है .... जब मिलन हो ही गया फ़िर क्या ... दोनों मिलकर कुछ-न-कुछ "गुंताड" में लग जाते हैं और अपना एक अलग अस्तित्व बना कर ही दम लेते हैं, चेले के पीछे नये चेले... चेले ... चेले ... और अनेकों चेलों की भीड लग जाती है .... ऊपर बैठा चेला नीचे बाले चेले का गुरु बन जाता है ..... फ़िर चारों ओर "गुरु-चेले" ... "गुरु-चेले" ... "गुरु-चेले" ... !

..... अब असली मुद्दे पे आ ही जाते हैं ये "गुरु-चेले" चिटठाकार जगत में भी "घुसपैठ" कर चुके हैं ..... अरे भाई इनकी यहां क्या जरुरत ..... सच कहा इनकी यहां जरुरत तो नहीं थी पर क्या करें ..... अस्तित्व, अस्तित्व की लडाई तो कहीं भी हो सकती है, लडाई न भी हो तो क्या "दबदबा" बनाना भी तो जरुरी है .... एक दिन "गुरु-चेले" आपस में बात कर रहे थे संयोग से मैं भी वहां बैठा था दोनों चर्चा मे मशगूल थे ......

... चेला "ब्लाग जगत" में छा जाने के गुर पूंछ रहा था और गुरु भी दनादन छापे पडे थे चेला सुन रहा था गुरु कह रहे थे ... बेटा तू "बडा ब्लागर" है बडे लोग छोटे लोगों के घर पर नहीं जाते है ... अगर चले भी गये तो वहां बैठते नहीं हैं अर्थात टिप्पणी नहीं करते हैं .... अगर हम वहां टीका-टिप्पणी करने लगेंगे तो वे बडे हो जायेंगे फ़िर हम को कौन पूंछेगा ... अगर बहुत ज्यादा जरुरत पडी तो "ई-मेल" ठोक देना उसे कौन देखता है ...

... चर्चा जारी थी दुर्भाग्य से स्टेशन आ गया मुझे उतरना था उतर गया ... सिलसिला बीच मे ही टूट गया ... अब आगे क्या कहें ... जय "गुरु-चेले" ... जय "गुरु-चेले" ... जय "गुरु-चेले" !!

21 comments:

मनोज कुमार said...

........ चेला "ब्लाग जगत" में छा जाने के गुर पूंछ रहा था और गुरु भी दनादन छापे पडे थे चेला सुन रहा था गुरु कह रहे थे ... बेटा तू "बडा ब्लागर" है बडे लोग छोटे लोगों के घर पर नहीं जाते है .... अगर चले भी गये तो वहां बैठते नहीं हैं अर्थात टिप्पणी नहीं करते हैं .... अगर हम वहां टीका-टिप्पणी करने लगेंगे तो वे बडे हो जायेंगे फ़िर हम को कौन पूंछेगा .... अगर बहुत ज्यादा जरुरत पडी तो "ई-मेल" ठोक देना उसे कौन देखता है .....
अच्छा लगा पढकर।

संजय भास्कर said...

अच्छा लगा पढकर।

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

ali said...

:)

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर जी मजेदार ओर धार दार

डॉ टी एस दराल said...

सिलसिला बीच में ही छूट गया।
गुरु ने और क्या क्या बताया , ये भी बताइये।

प्रकाश पाखी said...

बहुत सटीक लिखा है आपने,साधुवाद...
वास्तव में खुद को श्रेष्ठ मान कर अपना एक समूह बनाकर ब्लॉग जगत में स्तरहीन लेखन की परम्पराएँ स्थापित हो रही है..वास्तव में अगर आप श्रेष्ठ लेखक है तो सामान्य लोगों पर पहुँच कर उनका मनोबल बढाकर ही साहित्य की सेवा कर सकते है..इससे एक आम व्यक्ति अच्छा पाठक तो बनेगा ..साहित्य में पाठक कम लेखक बढे जा रहे है..अच्छे लेखक को भी टिप्पणियों की आवश्कता होती है और साधारण ब्लोगर को भी..अन्यथा वह अपनी दिशा नहीं निर्धारित कर सकता..इसी दृष्टिकोण से ही आगे बढना चाहिए..

jamos jhalla said...

बकौल अटल बिहारी वाजपेयी आज कल गुरुओं का नहीं वरन गुरू घंटालों का ज़माना है|

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ऐसे गुरूओं को नमस्ते जी

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सही कहा आपने. ब्लॉग-जगत बाकी जगत से कोई अलग थोड़े ही है.

योगेश स्वप्न said...

sahi baat, umda vyangya.

arvind said...

बहुत सटीक .खुद को श्रेष्ठ मान कर अपना एक समूह बनाकर ब्लॉग जगत में स्तरहीन लेखन की परम्पराएँ स्थापित हो रही है.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत छिपा कर वार किया है ... बहुत अच्छा व्यंग है श्याम जी ... गुरु-चेला ... क्या बात है ....

श्रद्धा जैन said...

hmmm badiya kataksh hai
aapne bahut kuch sun liya .........
:)

देवेश प्रताप said...

बहुत सही लिखा आपने .....

गिरीश पंकज said...

bahut sundar vichar. yah peeda bhi hai lekin sachchha lekhak isaki parvaah nahi karta, ti koi tippani karta hai ya nahi. likhna hmara dharm hai.dhyaan rahe ki keval likha hua hi rah jata hai. tippaniyaa, nasht ho jati hai. lshresth likha hua antatah kaaljai rahataa hai. isliye likhana hi hamara ddharma hai, kartavya hai.

ललित शर्मा said...

मारा रे भाई पापड़ वाले को,
चकनाचुर हो गया पापड़,
लकड़ी तो बस जल भई
देखो बच गया है राखड़।

जय हो गुरु

बेचैन आत्मा said...

बढ़िया कटाक्ष है.
होना यह चाहिए कि इन सब बातों को सोंचना ही नहीं चाहिए. यह निरपेक्ष भाव से लिखा गया पोस्ट है इसलिए इस पर कमेन्ट कर दिया वरना मैं तो जिस पोस्ट में जरा भी राजनीति देखता हूँ या किसी प्रकार कि गुरुवई देखता हूँ तुरत वहाँ से भाग जाता हूँ. मेरे विचार से इस समस्या का यही हल है.

निर्मला कपिला said...

बहुत बडिया कटा़ है सही रग पकडी है ब्लागजगत की जब फिर से ट्रेन मे बैठें तो आगे का हाल भी सुनायें धन्यवाद्

Apanatva said...

bahut sunder vyung lekhan .......hakeekat bayan karata.........

psingh said...

guru aur shishya ka sath to sadiyon se hai aur rahega bhi