Showing posts with label रावण. Show all posts
Showing posts with label रावण. Show all posts

Saturday, September 30, 2017

सच .. मैं .. रावण हूँ ... !

अबे .. चूजो ...
घोंचुओ ...
भोंपुओ ...
पप्पुओ ... चप्पुओ ...

रात-दिन .. दुम हिलाने वाले टट्टुओं ...
अब तुम ...
राम बनने की कोशिश ... न करो ....

क्या तुम मेरे पुतले को जलाकर राम बन जाओगे ???

सुबह-शाम .. तलुए चाँटने वाले स्वयं-भू सूरमाओ
क्या तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं है ... ?
क्या तुम्हारे अंदर का खून पानी हो गया है ... ?
क्या तुम्हारा जमीर मर गया है ... ?

जो तुम .. मेरे पुतले के सामने ... सीना ताने खड़े हो
जलाओ ...
चलाओ तीर ...
फूंक दो .. मुझे .... और ...
अकड़ के खड़े रहो .. बिना रीढ़ वालो ..... !!

शायद .. तुमसे ...
भृष्टाचारियों ... मिलावटखोरों .... ठगों .....
ढोंगियों .. पाखंडियों .. के विरुद्ध .. कुछ होगा भी नहीं ...

क्यों ? ... क्योंकि -
तुम्हें ..
मेरा पुतला .. जलाने ... देखने ... तालियाँ बजाने ...
की आदत-सी हो गई है ... !

गर .. दम है ... तो ....
जला के दिखाओ ... उसे .. उन्हें ... जिनमें मैं ....
आज भी ज़िंदा हूँ .. जी रहा हूँ ....
हाँ .. सच ... मैं .. रावण हूँ .... अजर हूँ .. अमर हूँ .... !!!

Thursday, October 25, 2012

भड़ास ...


आज रावण ने रावण जला के, खूब वाह-वाही लूटी है 
पर, दिल के किसी कोने में, बेचैनी जला रही है उसे ? 
...
उनका अहंकार, किसी रावण से कम नहीं है 'उदय'
बस, फर्क है तो, ................. तनिक लचीला है ?
...
भ्रष्टाचार रूपी अवैध बम फट तो रोज रहे हैं 'उदय'
मगर अफसोस, कोई कार्यवाही को तैयार नहीं है ?
... 
हद है 'उदय', लोगों ने, पुतलों पे भड़ास निकाल ली है 
जबकि, कदम-कदम पे, ज़िंदा रावणों की भरमार है ? 

Wednesday, October 24, 2012

सत्ता की डोर ...

भाईयों ... सुनो ... चलो ...
रावण को मारेंगे ...
नहीं ... नहीं ... नहीं ...
मत मारो ... रावण को !

क्यों ? किसलिये ??
क्योंकि -
आज,
उसके हाँथों में सत्ता की डोर है !

तो ... रहने दो ... क्या हुआ ?
नहीं ... ज़रा सोचो ...
उसके मरते ही,
डोर ... छूट जायेगी हाँथों से ...
और हम ...
दिशाहीन ... हो जायेंगे !

तो फिर ... ये भ्रष्टाचार ??
भ्रष्टाचार ...
होने दो ... रहने दो ... बढ़ने दो ...
पर, रावण को ...
ज़िंदा ... रहने दो ... !

रहने दो ... होने दो ... भ्रष्टाचार ...
ज़िंदा ... रहने दो ... रावण को
कहीं,
सत्ता की डोर ...
छूट न जाए ... उसके हाँथों से !!

Thursday, October 6, 2011

मैं रावण नहीं मारूंगा ...

भईय्या, मैं रावण नहीं मारूंगा, कोई कुछ भी कहे, कहता रहे, मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता ... अरे, क्या हो गया, क्यूं ऐंसा बड़बड़ा रहा है, क्या वजह है साफ़ साफ़ बता ... भईय्या, अब आप से क्या छिपाऊँ, जब आज तक कोई बात छिपाई नहीं तो फिर आज कैंसे छिपा दूं ... हाँ, बता क्या बात है ... भईय्या, मैं पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान चल रहा था मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है किन्तु डर के कारण मैं उसे कह नहीं पा रहा था, कल रात मेरे एक दोस्त की बर्थ-डे पार्टी थी मैं भी गया था वहीं पर हम दोनों दोस्त बीयर पी रहे थे बीयर पीते पीते मैं उस लड़की की याद में तनिक मायूस सा हो गया था तब मेरे दोस्त ने मुझे कहा - एक बीयर और पी ले सब टेंशन दूर हो जाएगा किन्तु मैंने नहीं पी ... बहुत बढ़िया बेटा, एक से ज्यादा बीयर कभी पीना भी नहीं चाहिए, तू समझदार बच्चा है !

... लेकिन भईय्या आगे तो सुनो, थोड़ी देर बाद एक "काली छाया" सी आकर मेरे सामने खड़ी हो गई और कहने लगी कि - तू क्यूं परेशान है राजेश ... मैं सहम सा गया, सोचने लगा कि यह क्या मुसीबत है, कहीं ज्यादा नशा तो नहीं हो गया ... वह फिर बोली - डर मत, मैं रावण के वंशस का हूँ और मैं अमर हूँ, पास से गुजर रहा था तुम्हारा दुःख देखा नहीं गया इसलिए तुम्हारे पास आ गया हूँ अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ ... मैंने कहा - क्या ... जो तुम बोलो ... अच्छा, मुझे हिम्मत दो कि मैं जिससे प्यार करता हूँ उसे प्यार का इजहार कर दूं ... लगाओ फोन - बोल दो, डरो मत, मैं हूँ, लगाओ लगाओ ... मैंने फोन लगा कर - आई लव यू कह दिया, सामने से लड़की भी नाराज नहीं हुई किन्तु उसने जवाब नहीं दिया, मैं खुश हुआ, बहुत खुश हुआ !

... फिर मैंने उसे बैठने को कहा ... वह बैठ गया और बोला - दो बीयर बुलवाओ इंजॉय करेंगे ... फिर जैसा जैसा वह बोलता गया मैं करता गया, कितनी पी, कितना मुर्गा खाया, और कौन मुझे घर छोड़ गया, मुझे याद नहीं है, पर मेरी एक सबसे बड़ी समस्या का समाधान निकल गया, मैंने कल उसको आई लव यू बोल ही दिया, अब आप ही बताओ भईय्या कैसे मैं रावण को मारने जा सकता हूँ ... तू सरक गया है, ये क्या फिजूल की बकवास कर रहा है, तुझे तो तेरा दोस्त अनिल घर छोड़ के गया था पर तूने बहुत पी रखी थी, आज के बाद यह सब बर्दास्त नहीं होगा, और रही दूसरी बात - आई लव यू, देख कहीं तुझे लेने के देने न पड़ जाएं ... कुछ समझा नहीं भईय्या आपका मतलब ... अरे यार तूने नशे की हालत में आई लव यू बोल दिया है कहीं लड़की पुलिस-वुलिस में कम्पलेंट न कर दे या घर में शिकायत न कर दे ... बात तो सही कह रहे हो भईय्या, पर कल रात उस "काली छाया" की मेहरवानी से मेरा एक टेंशन तो मिट गया, अब देखेंगे जो होगा ... पर मैं तो आज रावण को मारने नहीं जाने वाला, आखिर उसके वंशज की मदद से अपुन का टेंशन दूर हुआ है ... ठीक है जैसी तेरी मर्जी !

... भाई के कमरे से बाहर जाते ही "काली छाया" फिर से प्रगट हो गई, देख कर राजेश सन्न हो गया ... वह बोली - डरो मत, कल रात से अपुन दोनों दोस्त हो गए हैं, जल्दी तैयार हो जाओ, आज अपुन मौज-मस्ती करने जंगल चलते हैं घर पर अनिल इंतज़ार कर रहा होगा, और हाँ तुम्हारी प्रेमिका का भी तुमको फोन आने वाला है ... ऐंसा है क्या ! तब तो लो फटा-फट तैयार हो जाते हैं ... और राजेश पंद्रह मिनट में ही नहा-धोकर तैयार हो गया ... और चाय पीते पीते प्रेमिका का फोन भी आ गया तथा उससे बातें कर राजेश प्रसन्न हो गया ... फिर क्या था, राजेश को लगा कि -उसकी निकल पडी है कोई "अद्भुत शक्ति" से दोस्ती हो गई है जो हर पल, हर घड़ी मदद में है और अब मौजे ही मौजे ... भाई के लाख समझाने पर भी राजेश नहीं माना और रावण दहन के कार्यक्रम का पूर्णरूपेण त्याग करते हुए मित्र अनिल के सांथ जंगल की सैर पर निकल गया ...
क्रमश : ... कहानी जारी है ... पार्ट - २ ... ब्रेक के बाद ...

रावण ...

एक दिन ऐंसा भी आयेगा
रावण
वादा कर
जलने से ...
मरने से ... मुकर जाएगा !

लड़ते लड़ते ... अड़ जाएगा
सामने ...
रावण रूपी राम को देखकर
मरने से
वह पीछे हट जाएगा !

कह देगा, ... वो कह देगा
नहीं मरुंगा, ... नहीं मरुंगा
कलयुगी राम -
के हांथों से
अब मैं नहीं मरुंगा !

कैसे ... मैं मर जाऊं ...
आज, उन हांथों से, जो खुद ही
भ्रष्ट
कपटी
पापी
दुष्ट
घुटालेबाज हुए हैं !

जन ... गण ... मन ...
जिनसे -
त्रस्त हुए हैं !
एक दिन, ऐंसा भी आयेगा
रावण -
मरने से पीछे हट जाएगा !!

दशहरा पर्व ...

बेहद मुश्किल ... दुष्कर्मों को
जो कभी ...
मुझे ... बहुत प्रिय हुआ करते थे
उन्हें,
शनै: शनै: छोड़ चुका हूँ !

सबसे पहले ... नान वेज
फिर ... वाइन
उसके बाद ... स्मोकिंग
अब ... महसूस कर रहा हूँ
बेहद सुकूं ... !

अब ... आगे ... धीरे-धीरे
एक-दो और नित्य कर्मों पर
ध्यान है मेरा,
देखें ... अब-कब,
उनकी बारी आयेगी !

पर
यकीं है, मुझे ... खुद पर
वह दिन दूर नहीं
जब
मैं भी ... नेक इंसा बन जाऊंगा !

फिर ... मैं भी ...
रावण दहन ... देखने
रामलीला मैदान ... जाऊंगा
उस दिन ... दशहरा पर्व
मैं भी ... धूम-धाम से मनाऊंगा !!
... ... ... ... ... ... ... ...
सभी मित्रों को दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ...

Wednesday, October 5, 2011

रावण की नाराजगी ... संशय में राम !

दशहरा पर्व के दिन ... शाम होते होते सारे शहर में हल्ला हो गया कि - रावण ने जलने से मना कर दिया है ... खबर फैलते हीचहूँ ओर, संशय का विकट वातावरण निर्मित हो गया ... यह खबर आग की तरह रावण का दहन करने वाले राम अर्थात शहर के सबसे दबंग नेता जी तक भी पहुँच गई ! अब चूंकि नेता जी एक पावरफुल मंत्री थे इसलिए सारा प्रशासनिक अमला और उनके चेले-चपाटे खबर की पुष्टि करने के लिए दौड़ पड़े ... कुछ ही देर में खबर की पुष्टि करने वालों की ... मंत्री जी के बंगले पर भीड़ लग गई ! 

जब सारे पुष्टिकर्ता आ गए ... तब मंत्री ने स्वयं सभी से चर्चा की ... चर्चा पर असल मसला सामने आया कि - शाम चार बजे रावण निर्माण का फिनिशिंग काम चल रहा था तब अचानक एक आवाज गूंजने लगी ... आवाज सुनकर बनाने वाले कारीगर डरने लगे, तब अचानक रावण रूपी एक विशाल आकृति प्रगट हुई और कहने लगी कि - "आज मुझे कोई राम प्रवृति का इंसान ही जलाएगा, यदि ऐंसा नहीं हुआ तो ... जो मुझे जलाएगा उसे चौबीस घंटे के अन्दर मैं जलाकर राख कर दूंगा" ... सुनते ही मंत्री जी चिंतित हो गए, मीटिंग हाल में सन्नाटा-सा पसर गया !

कुछ देर बाद मंत्री जी सहमे सहमे से बोले - अब क्या किया जाए ? ... कुछेक जुझारू प्रवृति के लोग बोल पड़े ... कुछ नहीं होता सर ... आप डरिए मत ... यह सब फिजूल बकवास जैसा है ... और फिर आप भी तो साक्षात भगवान राम ही हैं ... हाँ सर, आप भगवान राम से कम नहीं हैं ... मंत्री जी को ये सारे सुझाव मरवाने वाले सुझाव लग रहे थे, कुछ देर गमगीनी माहौल के बाद मंत्री जी ने मीटिंग हाल से सभी को बाहर बैठने का निर्देश दिया !


सभी के बाहर निकलते ही मंत्री जी अपने चहेते एक अधिकारी व अपने एक ख़ास आदमी से गुप्त रूप से बोले - आप दोनों त्वरंत जाओ, और रावण से हाँथ जोड़कर प्रार्थना करो कि - इस समस्या का कोई हल वे स्वयं बताएं ... उनसे आग्रह करो कि - मंत्री जी आपका दहन करना चाहते हैं यह उनकी मजबूरी है ... इसलिए आप स्वयं ही कोई उपाय सुझाएँ ... ऐंसा क्या किया जाए जिससे आप नाराज न हों, और आपकी नाराजगी का असर हमें मंत्री जी को खोकर न उठाना पड़े, ... और हाँ, सीधेतौर पर हाँथ जोड़कर प्रार्थना में बता देना कि मंत्री जी राम प्रवृति के नहीं है, कहीं कोई संशय न रहे ... जी सर ... !

लगभग आधे घंटे के बाद ... दोनों महाशय रावण से प्रार्थना-अर्चना कर वापस आकर मंत्री जी से मिले तथा बोले ... सर, मसला बेहद गंभीर है, रावण की आत्मा साक्षात प्रगट हो रही है, सर्वप्रथम तो माननीय रावण साहब भड़क गए और कहने लगे कि - तुम लोगों ने ये क्या मजाक बना कर रखा हुआ है, क्या तुम्हें इतने बड़े शहर में कोई राम जैसे स्वभाव का इंसान नहीं मिलता जो तुम शहर के सबसे दुष्ट व पापी इंसान से मेरा सालों से दहन करवा रहे हो, ... बहुत हो गया, अब मुझसे बर्दास्त नहीं होगा, जाओ चले जाओ !


फिर ... फिर हम दोनों उनके चरणों में गिर पड़े तथा अपनी मजबूरी व्यक्त किये, तब कहीं जाकर वे तनिक शांत होकर बोले - अच्छा ये बात है, ठीक है जाकर अपने रामरुपी मंत्री को बोल दो कि - मुझ पर तीर चलाने के पहले हाँथ जोड़कर मुझसे प्रार्थना करते हुए अपनी मजबूरी व्यक्त करने के बाद ही तीर चलाये, नहीं तो ... और हाँ, आप लोगों ने ये जो ढोंग बना कर रक्खा है कि शहर का सबसे बड़ा पापी व दुष्ट इंसान मुझे हर साल मार कर नाम कमा रहा है वह जल्द बंद कर दो अन्यथा ... यह सब देखते देखते अब मुझे क्रोध आने लगा है, कहीं ऐंसा न हो ... जो मेरा दहन करने आ रहा है उसका ही मैं दहन शुरू कर दूं !

बातें सुनते ही मंत्री जी सन्न हो गए तथा कुछ देर के लिए पुन: सन्नाटा-सा छा गया ... कुछ देर बाद लम्बी गहरी सांस लेते हुए मंत्री जी बोले - चलो ठीक है, जान में जान आई ... इस बार तो छुटकारा मिल गया, अगली बार का अगली बार देखेंगे ... दोनों बोल पड़े - जी सर, पर मामला बेहद संगीन होते जा रहा है, कोई न कोई हल निकालना पडेगा " रावण दहन" का ... कहीं ऐंसा न हो कि लेने-के-देने पड़ जाएं ... क्योंकि अभी सालों-साल तक आपको ही रावण दहन करना है ... 
ठीक है, चिंता जायज है, बाद में मुख्यमंत्री जी से बात करेंगे ! 

ठीक शाम सात बजे ... निर्धारित समयानुसार मंत्री जी ने रामलीला मैदान पहुँच कर ... मंच से, दूर से ही मन ही मन रावण से  क्षमा प्रार्थना की तथा प्रार्थना करने के बाद ही तीर चलाया ... तीर चलते ही ... चारों ओर ... फटाकों की गूँज ... शोर-गुल ... आतिशबाजी ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... के नारे गूंजने लेगे तथा मैदान में सभी लोग एक-दूसरे से गले लगने लगे ... चारों ओर ... बधाई ... बधाई ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... नारों व खुशियों के बीच रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हुआ ... इन सब के बीच ...  मंत्री जी सन्न ... उपस्थित जनता प्रसन्न ...  और रावण तनिक खिन्न ... नजर आये ... जय श्रीराम !!

Sunday, October 17, 2010

एक रावण को मारता दूसरा रावण !!

महाराज चलो रावण मारने चलें !
क्या मतलब है दिखावा करने से ?

नहीं महाराज दिखावा काहे का !
अरे ये दिखावा नहीं है तो और क्या है ?

चलो ठीक है, अब रावण मारना भी आपकी नजर में दिखावा हो गया है !
दिखावा नहीं तो और क्या है, जो रावण तुम्हारे अन्दर बसा हुआ है उसे क्यों नहीं मारते हो ?

आप भी मजाक कर रहे हो, अब जिसे खुद पाल कर, अन्दर बसा कर, सिद्ध कर रखे हुए हैं ... उसे भला मारना कैसा ?
तो फिर रावनरूपी पुतला बना बना कर जलाने का दिखावा किसलिए ?

महाराज अब आप तो खुद समझदार हो, आजकल दिखावा बहुत जरुरी हो गया है ! ... यदि हम लोग दिखावा नहीं करेंगे तो किसी दिन कोई रामनुमा इंसान हमें ही जलाने का विचार नहीं कर लेगा ?
ये तो सच कहा ... मतलब खुद को बनाए रखने के लिए कुछ--कुछ ढोंग-धतूरा तो करना ही पड़ता है ... बढ़िया ... बहुत बढ़िया !

तो चलें महाराज ... रावण मारने !
नहीं भईय्या ... आप ही जाओ ... मुझे तो डर ही लगता है कि कहीं देखा-देखी के चक्कर में ... वहां रावण जल तो जाए पर उसकी आत्मा मेरे संग - संग जाए !

ठीक है हम ही चले जाते हैं ... जैसी आपकी मर्जी !
पर जाते जाते ये तो बता जाओ कि तुमने खुद के अन्दर रावण को कैसे पाल कर रखा हुआ है ?

बहुत लम्बी कहानी है भईय्या ... आजकल गाय, बकरी, कुत्ता, बिल्ली, तोता बगैरह को पाल कर रखने में ही पसीना छूट जाता है फिर ये तो रावण है !
बताओ भईय्या बताओ ... आखिर रावण की कहानी जो है ... रावण !

एक दिन हम बहुत दुखी बैठे थे तब अचानक रावण की आत्मा हमारे सामने प्रगट हो गई ... कहने लगी तुम्हारे सारे दुख-दर्द ख़त्म कर दूंगा बस तुम्हें अपने अन्दर रहने के लिए मुझे जगह देना पडेगा ... मैंने पूछा क्या मतलब है तुम्हारा ? ... अरे डरो मत मैं सिर्फ मांस-मदिरा ग्रहण करूंगा और तुम्हारे सब काम करता रहूँगा ! ... बस, फिर क्या था मैंने उसे उसी दिन उसे मांस-मदिरा का भोग लगवा दिया ... वह दिन है की आज का दिन है रावण मेरे अन्दर मेरे साथ ही रहता है !
भईय्या रावण को पालने से आपको फ़ायदा क्या है ? तुम्हारी हालत तो ज्यों की त्यों है ?

मेरी हालत पर मत जाओ भईय्या, मैं जो सुख भोग रहा हूँ उसका अलग ही मजा है ... कुछ भी काम बेधड़क कर लेता हूँ और कोई रोकने वाला भी नहीं रहता है ! ... बस अच्छे काम ही नहीं कर पाता हूँ क्योंकि रावण करने नहीं देता है ... अब भला आज के कलयुग में अच्छे काम करने से फ़ायदा भी क्या है ?
अच्छा ये बात है, मतलब मौजे-ही-मौजे हैं ! भईय्या जब रावण तुम्हारे ही अन्दर है फिर रावण मारने, मेरा मतलब देखने क्यों जा रहे हो ?

भईय्या ये अन्दर की बात है अब पूछ रहे हो तो सुन लो ... आजकल रावण मारने ( जलाने ) की होड़ रहती है, शहर का जो सबसे बड़ा रावण होता है अर्थात जो सर्वाधिक पावरफुल रावण प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है वह ही रावण को जलाता है ... उसके चहरे पर रावण फूंकते समय जो मुस्कान होती है, यूं समझ लो बस वही देखने जाता हूँ ... चलो आपको दिखाता हूँ !
नहीं भईय्या ... आपको ही रावण और उसकी मुस्कान मुबारक हो ... आप ही देखो कैसे एक रावण को दूसरा रावण मारता है ... जय श्रीराम ... जय जय श्रीराम !!!

Saturday, October 16, 2010

मैं रावण हूँ ... अमर हूँ ... हा हा हा ... !!

मैं रावण हूँ ... मरा नहीं ... कौन मार सकता है मुझे ... मैं अमर हूँ ... याद है मुझे, पर शायद आप लोग भूल रहे हो कि मैंने घोर-अघोर तप से एक नहीं अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थी ... क्या तुम भूल रहे हो कि वह मैं ही हूँ जिसने सिर्फ देवताओं को पराजित किया था वरन समस्त ग्रहों के स्वामियों को भी अपना दास बनाया था ... हा हा हा ... आप लोग जल्दी ही भूल जाते हो, पर मुझे सब याद है ... मेरी अमरत्व शक्ति कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं थी, याद है या सब भूल गए ... साक्षात राम को भी मुझे हराने के लिए ऐडी-चोटी का दम लगाना पडा था वो तो विभीषण था जो घर का भेदी निकल गया जिसने मेरी मृत्यु का राज बता दिया, नहीं तो राम को भी पराजित कर देता ... खैर छोडो अब पुरानी बातों में कुछ नहीं रक्खा है, जाने दो ...

... हाँ पर एक बात जरुर याद रखना कि मैं अब तक मरा नहीं हूँ क्योंकि मैं अमर हूँ ... अमर हूँ तो अमर हूँ ... चलो आज मैं तुम्हें मेरी अमरता का असल राज बताता हूँ जो बहुत ही गोपनीय है ... गोपनीय इसलिए कि उस राज को सिर्फ मैं जानता हूँ नहीं तो विभीषण जैसे गद्दार ... खैर जाने दो, आज मैं उस राज को इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आज सब जान कर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे क्योंकि इस दौरान मैंने इस अमरत्व को इतना अमर बना दिया है कि जब तक यह संसार रहेगा तब तक, अब कोई मुझे मारने की चेष्ठा भी नहीं कर पायेगा ... मारना तो बहुत दूर की बात है ...

... तो चलो सुनो आज वह राज ... मैंने जिस अमरत्व को नाभी में छिपा कर रखा था वह तो मेरे शरीर को अमर बना कर रखे हुए था अर्थात मेरा शरीर नश्वर था किन्तु विभीषण की मेहरवानी से ... चलो जाने दो वह तो आप सभी जानते हैं, नहीं जानते हैं तो वह राज नहीं जानते जो मैं अब तुम्हें सुना रहा हूँ ... मैंने एक बार घोर तप कर "ब्रम्हा-विष्णु-महेश" तीनों से संयुक्तरूप से यह वरदान प्राप्त किया था कि यदि विशेष परिस्थितियों में मुझे शरीर त्यागना भी पड़े तो मेरी आत्मा अमर रहेगी, और जिस समय मैं अर्थात साक्षात रावण शरीर त्यागूंगा ठीक उस समय सम्पूर्ण संसार में जितनी भी राक्षस प्रवृत्ति की आत्माएं अर्थात मांस-मदिरा का सेवन कर रही आत्माएं जीवित होंगी उन सभी आत्माओं में मेरी आत्मा समाहित होकर जीवित रहेगी अर्थात मैं मरने के बाद भी अमर रहूँगा ... किन्तु यह वरदान देते समय तीनों देवताओं ने मुझसे यह वचन ले लिया था कि मैं अमर तो रहूँगा, पर मेरी संपूर्ण शक्तियां शरीर के साथ नष्ट हो जायेंगी ... उस समय मुझे यह घमंड था कि मुझे तो कोई मार ही नहीं सकता है इसलिए मैंने वचन दे दिया ...

... लेकिन मैं आज सोचता हूँ कि मैंने वचन देकर बहुत बड़ी भूल की थी वरना आज मैं ... खैर जाने दो, पर आज भी मैं खुश हूँ बहुत खुश हूँ ... मेरी वो शक्तियां नहीं हैं तो क्या हुआ ! पर मैं तो आज अमर हूँ और खूब मजे ले रहा हूँ ... ऐसे ऐसे मजे ले रहा हूँ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी ... मांस-मदिरा का सेवन कर रही जीवित आत्माओं के शरीर व मन में जीवत रहकर मैं ... मांस - मदिरा के मजे, अपहरण - बलात्कार के मौजे, लूट - डकैती के कारनामे, कालाबाजारी - भ्रष्टाचारी के फार्मूले, बम - धमाके, ह्त्या - मारकाट ये सब मेरे ही कारनामे हैं ... हा हा हा ... अमर भी किसी एक-दो शरीर में नहीं, वरन संपूर्ण संसार में गिने-चुने कुछेक प्राणियों को छोड़ कर शेष सभी प्राणियों में मैं ज़िंदा हूँ ... हा हा हा ... आज सम्पूर्ण संसार में मेरा ही राज है ... मैं ही राज कर रहा हूँ, मजे कर रहा हूँ, मौज कर रहा हूँ ... क्यों, क्योंकि मैं रावण हूँ ... रावण ... मुझे अब कोई नहीं मार सकता क्योंकि अब मैं तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!