"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Thursday, February 14, 2013
वेलेन्टाइन-डे ...
Friday, April 13, 2012
हाय-तौबा ...
Friday, January 13, 2012
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के नाम एक पत्र ...
Wednesday, January 4, 2012
'वटवृक्ष' त्रैमासिक पत्रिका : मेरी नजर में ...
Monday, December 19, 2011
भारतीय संविधान ...
आपके विचार भिन्न हो सकते हैं, आपके विचारों का स्वागत है ...
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कालाधन ...
चच्चू - बेटा ... कालाधन ... बोले तो, जो आम इंसान को दिखाई न दे !
बिट्टू - और सफ़ेद धन ?
चच्चू - बेटा, वह जो आम इंसान के हांथों में आते ही गायब हो जाए !!
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Friday, December 16, 2011
मंहगाई ...
Wednesday, December 14, 2011
कट-पेस्ट अर्थात लेखन की चोरी ...
Friday, November 18, 2011
उलझन ...
... क्या पुस्तक प्रकाशन के लिए लेखक को छपने का खर्च वहन करना पड़ता है ?
विश्व कप क्रिकेट - १९९६ ...
Monday, October 10, 2011
जगजीत सिंह की याद में ...
हार्दिक श्रद्धांजलि ...
उनकी ओर से कुछ पंक्तियाँ ... जो मेरे जेहन में उमड़ पडीं ...
सहेज पाना, नहीं अब मुमकिन
तुम्हारी यादें, यहीं छोड़ जा रहा हूँ !
था ये कैंसा, कारवां जिंदगी का
जिसे छोड़ पीछे, मैं चला जा रहा हूँ !
कभी याद आऊँ, गुनगुना लेना मुझको
गीत सारे, यहीं छोड़ जा रहा हूँ !
Thursday, September 1, 2011
... श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं !!!
विघ्न विनाशक गणपति बप्पा
तेरे-मेरे गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
घर घर विराजे गणपति बप्पा
जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
लडडू लाओ, लडडू चढाओ
खाओ-खिलाओ गणपति बप्पा
आँगन-आँगन ढोल बजाओ
बिराज गए हैं गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा
सबसे आगे गणपति बप्पा
सबके संग-संग गणपति बप्पा
जोर से बोलो गणपति बप्पा
जय जय बोलो गणपति बप्पा
सिद्धि विनायक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा
विघ्न विनाशक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा
जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा !
Monday, July 4, 2011
... वाह ! आमिर ! वाह !!
तुम्हें तो आयेगी नहीं
और आनी भी नहीं चाहिए
क्या ! शर्म
क्या करेगी, आकर, तुम्हें
तुम्हारा तो अधिकार है, जन्म सिद्ध
तुम्हारे से मेरा तात्पर्य
फिल्म कलाकार से है
गर, आने लगी, शर्म, फ़िल्मी कलाकारों को
तो, शायद, फ़िल्में बनना
बंद न हो जाएं, अश्लील, फूहड़, और दोअर्थी
चलो ठीक ही हुआ, तुमको मौक़ा मिला
तुमने भी, सिद्ध कर दी, फूहड़ता
फूहड़ता का स्तर, क्या है, कितना है, क्यों है
ये तो, मैं, फिल्म देखने के बाद
ही बयां कर पाऊँ
पर, जैसा सुन रहा हूँ, लोग बयां कर रहे हैं
एक अनुमान, लग रहा है
तुम चरम पर हो, इस फिल्म में, संग फूहड़ता के
पर तुम, मत करना, शर्म, खुद पर
क्यों, क्योंकि, तुम्हारा तो अधिकार है
फूहड़ता, अश्लीलता, और दोअर्थी संवादों पर
क्यों, क्योंकि ...
तुम एक कलाकार हो, फ़िल्मी कलाकार
वाह वाह ! देल्ही बेली
वाह ! आमिर ! वाह !!
Monday, November 15, 2010
माँ ने कहा था !

Thursday, September 23, 2010
मैं,मेरी श्रीमतीजी और............. भाग-4 (व्यंग्य)
मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-4 (व्यंग्य)
मैं चुपके से सुन रहा था. उनके रेखा गणित में गणित कहीं नहीं था सिर्फ़ रेखा ही रेखा दिख रही थी. ससुरजी को कैसे समझाया जाये गणित में भी बहकी बातें ही पढाते हैं. वह कभी भी गलत नहीं बोलते लेकिन बच्चों पर तो इसका दुष्प्रभाव ही पङेगा न ?. मैंने सोचा देव-भाषा संस्कृत के साथ छेङखानी नहीं करेंगे.इसलिये मैंने उन्हें टिंकू को संस्कृत पढाने का आग्रह किया.अगले दिन आकर दरबाजे पर ठहर गया. ससुरालवालों ने सुनने की क्षमता तो बढा ही दिया है.सुनने लगा------
"विद्या ददाति लोभम , लोभम ददाति धूर्तताम
धूर्तत्वा धनमाप्नोति,धनात पाप: तत: दुखम.
अर्थ बाद मे बताउंगा पहले श्लोक लिखो.
"उत्तमा कारं ईच्छन्ति , मोटर सायकिलं मध्यमा
अधमा सायकिलं ईच्छान्ति सायकिलं महती धनं.
"असत्यं वद प्रियं वद न वद असत्यं अप्रियं
विना विलम्बे सत्यम प्रियम वद अवश्यम.
अगला श्लोक: नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र नेता ".
तभी मेरे मुंह से निकल गया---"नेता नहीं देवता.". ससुरजी बोलने लगे---" दामादजी मैंने जान-बूझकर मोडिफ़ाइ करके बताया है.आज के बच्चे देवी-देवता के बारे में नहीं जानते और देवता और नेता में अब फ़र्क ही कहां है. अब तो सुर-असुर साथ-साथ बैठकर पक्ष और विपक्ष की भूमिका निबाहते हैं. दोनो मिलकर सत्ता का अमृत पीते हैं. उपर से संसार का विष इतना विषैला हो चुका है कि आज के महादेव विष पीकर कोमा में जा चुके हैं....देखियेगा जल्दी ही कोमा से फ़ुल-स्टोप लग जायेगा ".
ओह कोमा में तो मेरी जिंदगी चली गयी थी. ससुरजी के रहते टिंकू का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था. अंधकार में तो रोशनी डाला जा सकता है लेकिन इसी तरह वह पढाते रहे तो उसका भविष्य गर्त में चला जायेगा.मैंने फ़िर से उस ब्लोगर मित्र से सलाह लिया तो उसने कहा कि उनसे शोपिन्ग-वोपिंग करवाओ.मेरी बात को मानते हुए ससुरजी सायंकाल टिंकू के साथ शोपिंग के लिये चले गये.
अब घर में मैं और श्रीमतीजी ही बच गये थे.कुछ ही देर में मौका देखकर अपने पिता के सेवा और सत्कार में हुई कमी से आहत होकर पानी से भरा हुआ श्रीमतीजी की आंखों का स्टोर हाउस रिसने लगा----"जानते हो जब मेरे पापा शोपिंग के लिये जाने लगे मैंने रुपयों के लिये ड्रावर खोला.उसमे गांधी जी के फ़ोटो वाला एक भी नोट नहीं निकला.मेरी आंखों मे आंसू तैर गये....पापा क्या सोचे होंगे....उन्हें कितना बुरा लगा होगा ".
मैंने कहा---" इसमे बुरा लगनेवाली क्या बात है...मेरे ससुरजी ग्रेट हैं. उन्हें बिल्कुल बुरा नहीं लगा होगा "
" हां..वह कहने लगे कि कोई बात नहीं है, जो लोग आज के जमाने में सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हैं, गांधीजी उनसे दूर ही रहते हैं. आजकल वह भी उन बन्दरों से नफ़रत करते है जो उनके कहे अनुसार जीवन जीते थे. क्योंकि उन्हीं बन्दरों के चलते उन्हें गोली मारा गया था..."
मैंने समझाया----" डार्लिंग कहां से कहां बात ले जा रही हो. नोटों पर गांधीजी की तस्वीर होती है गांधीजी थोङे ही होते हैं.".वह फ़िर रोने लगी----"उनको तो गोडसे मरवाया गया था. अब तो उनकी तस्वीर ही बची है न ? ".
मैंने कहा---" स्वीटहर्ट गांधीजी तो हमारे दिल में रहते हैं ".
वह झला उठी---" मुझे बेवकूफ़ मत बनाओ छोटे से दिल में तो हर अच्छे लोग रहते हैं जिनसे हम प्यार करते हैं. लेकिन इतने महान हैं तो हमारे बङे से पेट में क्यों नहीं समा जाते जो खाली है."
मैं उछल पङा----" ब्लोग पे डालुंगा...डार्लिंग तुमने ऐसी बात कह दी जो आजतक बङे से बङे नेता भी नहीं कह पाये....मैं लिखुंगा कि जिसका पेट खाली है उसके पेट को भरो सिर्फ़ उसके दिल में ही जगह बनाने से क्या होगा.सबसे बङा सत्य तो ये है कि आज भी लोगों का पेट खाली है और सबसे बङी अहिंसा यह है कि भूखे पेट रहकर भी जिससे प्यार होता है हम उसे दिल में जगह दे देते हैं. जिसने हमारे लिये वस्त्र तक का त्याग कर दिया उसे हम दिल में जगह क्यों न दें चाहे वह महात्मा गांधी हों या मल्लिका शेरावत ".
( शुरु के तीन भाग krantidut.blogspot.com पर देख सकते हैं)
( नोट :- यह पोस्ट हमारे प्रिय अरविंद झा जी द्वारा लिखी गई है, तकनीकी कारणों से वे इसे स्वयं के ब्लॉग - क्रांतिदूत पर पोस्ट नहीं कर पा रहे हैं इसलिए यहाँ प्रकाशित है .... आपकी प्रतिक्रया अपेक्षित है, धन्यवाद )
Thursday, May 20, 2010
अर्जुन व कर्ण ... बलशाली कौन ???
महाभारत काल में रणभूमि में कौरव व पाण्डवों के बीच युद्द चल रहा था .... आमने-सामने अर्जुन व कर्ण ... अर्जुन व कर्ण जब एक-दूसरे पर वाण चलाते तो वार तो कट जा रहा था ... पर अर्जुन के वार से कर्ण का रथ चार कदम पीछे चला जाता था और कर्ण के वार से अर्जुन का रथ दो कदम पीछे जाता था ... इसी बात पर विश्राम के समय में अर्जुन इठलाते हुये श्रीकृष्ण से कहते हैं कि देखिये आप कहते हैं कि कर्ण मुझसे भी ज्यादा बल शाली है, देखा आपने आज मेरे आक्रमण से कर्ण का रथ चार कदम पीछे और उसके आक्रमण पर अपना रथ मात्र दो कदम पीछे जा रहा था यह प्रमाणित हो रहा है कि मैं कर्ण से ज्यादा बलशाली हूं ... श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुये कहते हैं ... हे वत्स अर्जुन ये तुम्हारा अहं बोल रहा है मैं अब भी कहता हूं कर्ण ज्यादा बलशाली है वो इसलिये जब तुम्हारे रथ पर हनुमान जी का ध्वजारूपी जो झंडा लगा है उस पर उनका आशिर्वाद है और साक्षात मैं तुम्हारा सारथी हूं फ़िर भी तुम्हारा रथ पीछे चला जा रहा है इससे अब तुम स्वयं अंदाजा लगा सकते हो कि कौन ज्यादा बलशाली है .... यह तो अधर्म के विरुद्ध धर्म की लडाई है तुम तो अपना कर्म जारी रखो ..... !!!!
Tuesday, May 18, 2010
यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट-३)
यौन शोषण की एक बृहद परिभाषा है किंतु यहां पर बच्चों के यौन शोषण पर प्रकाश डालना आवश्यक है, सामान्य तौर पर लडके व लडकियों दोनो को ही यौन शोषण का सामान्य ज्ञान दिया जाना चाहिये क्योंकि इसके शिकार दोनों ही हो सकते हैं।
यौन शोषण से तात्पर्य बच्चों के गुप्तांगों से छेडछाड करना, बेवजह चिपकना,चूमना, गले लगा लेना, अश्लील बातें करना या फ़िर उन्हें अपने गुप्तांगों के संपर्क में लाना, इत्यादि।
लडकियों का यौन शोषण बडे उम्र के पुरुष या महिला द्वारा किया जा सकता है और लडकों का यौन शोषण सामान्यतौर पर बडे उम्र के पुरुषों द्वारा या न्यूली मैच्योर लडकी द्वारा किये जाने की संभावना रहती है।
यौन शोषण को विकृत मांसिकता का धोतक मान सकते हैं किंतु कभी कभी तत्कालीन उपजी सेक्सुल उत्तेजनाओं के कारण भी यौन शोषण की घटनाएं हो जाती हैं।
यौन शोषण एक दण्डनीय अपराध है बालिग व नाबालिग दोनों ही अपराध के लिये दोषी हो सकते है।
यौन विकास, यौन शोषण, यौन अपराध का सामान्य ज्ञान ग्रोईंग बच्चों को दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।
Monday, May 10, 2010
यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट - २)
... यह संभव है कि यौन शिक्षा के कारण हमें आधुनिकता का शिकार होना पड सकता है जैसा कि पश्चिमी देशों में हो रहा है ... पर जो पश्चिमी देशों में हो रहा है वह जरुरी तो नहीं कि "यौन शिक्षा" के कारण ही हो रहा हो ... हम यह कैसे कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों में जो समस्याएं सामने परिलक्षित हो रही हैं उसका कारण "यौन शिक्षा" ही है ... यह भी तो संभव है कि इन समस्याओं की जडें वहां के पारिवारिक परिवेश के कारण जन्म ले रही हैं !!
... क्या कोई है जो यह कह सकता है कि वहां का पारिवारिक परिवेश ऎसा नहीं है कि "यौन शिक्षा" को भी विफ़ल कर रहा है ... क्या वहां पारिवारिक संस्कार ऎसे नही हैं कि "यौन शिक्षा" भी बच्चों को बिगडने से रोक सके ... जब परिवार कि महिलाएं व पुरुष खुले रूप से व्यावहारिक आधुनिक जीवन जी रहे हों तब क्या संभव है कि कोई भी "शिक्षा" वहां असर कारक हो सकती है ...
... फ़िर क्यॊं हम या वहां के बुद्धिजीवी लोग विकृतियों को "यौन शिक्षा" की कमजोरी मान सकते हैं ... क्या हम यह नहीं कह सकते कि जहां का पारिवारिक व सामाजिक वातारण ही ऎसा हो गया हो कि वहां कोई "शिक्षा" असर कारक हो ही नही सकती !! ... फ़िर हम किसी "यौन संबंधी अनहोनी" को "यौन शिक्षा" के कारण उपजी घटना कैसे मान सकते हैं !!
... जब वहां पति-पत्नी ... माता-पिता ... भाई-वहन ... दादा-दादी ... नाना-नानी जैसे रिश्तों को कोई तबज्जो नहीं दिया जा रहा हो तो बच्चों को स्वछंद रूप से जीने से कोई कैसे रोक सकता है ... जब स्वछंदता की कोई सीमा नही रहेगी तो "यौन संबंधी अपराधों" को जन्म लेने से कैसे रोका जा सकता है ... इन हालात में जब "यौन अपराध" होना तय है तो हम "यौन शिक्षा" को इसका दोषी कैसे मान सकते हैं ???
Sunday, May 9, 2010
यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट - १)
सर्वप्रथम तो मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि "यौन शिक्षा" से तात्पर्य "शिक्षा" से है न कि "कामक्रीडा" से ... इसलिये इसमे इतनी भयभीत होने वाली बात नहीं है ... यदि बच्चों को समय रहते शिक्षित नहीं किया जाता है तो भी नासमझी में उठे किसी प्रायोगिक कदम के कारण समस्याओं से जूझना पड सकता है जो अक्सर व्यवहारिक रूप में हमें सुनने मिल जाती हैं ... अक्सर ऎसा देखा व सुना जाता है कि अज्ञानता के कारण भी बच्चे यौन संबंधी ऎसे प्रयोग कर बैठते हैं जिसके परिणाम अहितकार ही होते हैं ।
यहां पर "यौन शिक्षा" से मेरा सीधा-सीधा तात्पर्य सामान्य व्यवहारिक ज्ञान से है जो बच्चों के लिये बेहद जरूरी है जिसका ज्ञान उन्हें होना ही चाहिये ... यह ज्ञान न सिर्फ़ लडकियों को वरन लडकों को भी होना चाहिये वो इसलिये कि "यौन संबंधी समस्याओं" का शिकार कोई भी हो सकता है ... यह ज्ञान "यौन शोषण" से बचाव के लिये ही जरुरी नहीं है वरन यौन संबंधी अपराध बोध के लिये भी आवश्यक है ... शिक्षा व ज्ञान के परिणाम देर-सबेर हितकर ही होते हैं ... यहां पर यह भी स्पष्ट कर देना मैं आवश्यक समझता हूं कि "यौन शिक्षा" अर्थात यौन संबंधी सामान्य व्यवहारिक ज्ञान एक "चाकू" की तरह है जिसका सही इस्तमाल सब्जी काटने या आपरेशन के रूप में किया जाये तो हितकर है और प्रयोग के तौर पर किसी के हाथ या गला काटने में किया जाये तो अहितकर है ।
Friday, May 7, 2010
यौन शिक्षा की पाठशाला
... हुआ ये कि कल की हमारी समसामयिक पोस्ट पर लगे फ़ोटो को देखकर माननीय रचना जी व माननीय फ़िरदौस खान जी ने तीखी टिप्पणी व्यक्त की ... स्वागत है ... टिप्पणी पढने के बाद हम रचना जी के ब्लाग "नारी" पर पहुंचे ... वहां रचना जी ने "कुछ प्रश्न या मोनोलोग" पोस्ट प्रकाशित की है जो मात्र चार लाईन की है तथा यौन शिक्षा को लेकर है ... वहां पर मैंने एक टिप्पणी दर्ज की है जो इस प्रकार है :-
रचना जी
आप सही कह रही हैं कि शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक संबंध बनाना अपराध है !
यह भी सही कहा कि लडके नहीं जानते कि लडकी से शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार हो सकता है !
यह कहना भी सही है कि सेक्स की सही शिक्षा के खिलाफ़ समाज उठ खडा होता है !
... सेक्स की सही शिक्षा से आपका तात्पर्य क्या है विस्तार रूप से अभिव्यक्त क्यूं नहीं करतीं ?
... क्या ऊपर आपकी पोस्ट पर लिखीं चार लाईनें जो अपराध व बलात्कार को परिभाषित कर रहीं हैं आपकी नजर में यही सेक्स शिक्षा है ?
...यौन शोषण क्या है,बलात्कार क्या है,अपराध क्या है, ... क्या यही आपकी नजर में यौन शिक्षा है?
.... रचना जी यौन शिक्षा की बात तो कर रही हैं पर पोस्ट पर यौन शिक्षा के नाम पर कुछ नहीं है वहीं पर फ़िरदौस खान जी ने भी सहमती दर्ज की है ... मैं सोचता हूं कि जब दोनों मेरी समसामयिक पोस्ट पर व लगे फ़ोटो पर तीखी टिप्पणी दर्ज कर रही हैं तो क्या यौन शिक्षा के गूढ रहस्यों पर प्रकाश डाल पायेंगी ???
... चलो हम ही शुरु करते हैं यौन शिक्षा की पाठशाला .... आपकी टिप्पणी/अभिव्यक्ति के साथ .... ब्रेक के बाद ....!!!!
पार्ट - १
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सर्वप्रथम तो मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि "यौन शिक्षा" से तात्पर्य "शिक्षा" से है न कि "कामक्रीडा" से ... इसलिये इसमे इतनी भयभीत होने वाली बात नहीं है ... यदि बच्चों को समय रहते शिक्षित नहीं किया जाता है तो भी नासमझी में उठे किसी प्रायोगिक कदम के कारण समस्याओं से जूझना पड सकता है जो अक्सर व्यवहारिक रूप में हमें सुनने मिल जाती हैं ... अक्सर ऎसा देखा व सुना जाता है कि अज्ञानता के कारण भी बच्चे यौन संबंधी ऎसे प्रयोग कर बैठते हैं जिसके परिणाम अहितकार ही होते हैं ।
यहां पर "यौन शिक्षा" से मेरा सीधा-सीधा तात्पर्य सामान्य व्यवहारिक ज्ञान से है जो बच्चों के लिये बेहद जरूरी है जिसका ज्ञान उन्हें होना ही चाहिये ... यह ज्ञान न सिर्फ़ लडकियों को वरन लडकों को भी होना चाहिये वो इसलिये कि "यौन संबंधी समस्याओं" का शिकार कोई भी हो सकता है ... यह ज्ञान "यौन शोषण" से बचाव के लिये ही जरुरी नहीं है वरन यौन संबंधी अपराध बोध के लिये भी आवश्यक है ... शिक्षा व ज्ञान के परिणाम देर-सबेर हितकर ही होते हैं ... यहां पर यह भी स्पष्ट कर देना मैं आवश्यक समझता हूं कि "यौन शिक्षा" अर्थात यौन संबंधी सामान्य व्यवहारिक ज्ञान एक "चाकू" की तरह है जिसका सही इस्तमाल सब्जी काटने या आपरेशन के रूप में किया जाये तो हितकर है और प्रयोग के तौर पर किसी के हाथ या गला काटने में किया जाये तो अहितकर है ।
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... यह संभव है कि यौन शिक्षा के कारण हमें आधुनिकता का शिकार होना पड सकता है जैसा कि पश्चिमी देशों में हो रहा है ... पर जो पश्चिमी देशों में हो रहा है वह जरुरी तो नहीं कि "यौन शिक्षा" के कारण ही हो रहा हो ... हम यह कैसे कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों में जो समस्याएं सामने परिलक्षित हो रही हैं उसका कारण "यौन शिक्षा" ही है ... यह भी तो संभव है कि इन समस्याओं की जडें वहां के पारिवारिक परिवेश के कारण जन्म ले रही हैं !!
... क्या कोई है जो यह कह सकता है कि वहां का पारिवारिक परिवेश ऎसा नहीं है कि "यौन शिक्षा" को भी विफ़ल कर रहा है ... क्या वहां पारिवारिक संस्कार ऎसे नही हैं कि "यौन शिक्षा" भी बच्चों को बिगडने से रोक सके ... जब परिवार कि महिलाएं व पुरुष खुले रूप से व्यावहारिक आधुनिक जीवन जी रहे हों तब क्या संभव है कि कोई भी "शिक्षा" वहां असर कारक हो सकती है ...
... फ़िर क्यॊं हम या वहां के बुद्धिजीवी लोग विकृतियों को "यौन शिक्षा" की कमजोरी मान सकते हैं ... क्या हम यह नहीं कह सकते कि जहां का पारिवारिक व सामाजिक वातारण ही ऎसा हो गया हो कि वहां कोई "शिक्षा" असर कारक हो ही नही सकती !! ... फ़िर हम किसी "यौन संबंधी अनहोनी" को "यौन शिक्षा" के कारण उपजी घटना कैसे मान सकते हैं !!
... जब वहां पति-पत्नी ... माता-पिता ... भाई-वहन ... दादा-दादी ... नाना-नानी जैसे रिश्तों को कोई तबज्जो नहीं दिया जा रहा हो तो बच्चों को स्वछंद रूप से जीने से कोई कैसे रोक सकता है ... जब स्वछंदता की कोई सीमा नही रहेगी तो "यौन संबंधी अपराधों" को जन्म लेने से कैसे रोका जा सकता है ... इन हालात में जब "यौन अपराध" होना तय है तो हम "यौन शिक्षा" को इसका दोषी कैसे मान सकते हैं ???
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यौन शोषण की एक बृहद परिभाषा है किंतु यहां पर बच्चों के यौन शोषण पर प्रकाश डालना आवश्यक है, सामान्य तौर पर लडके व लडकियों दोनो को ही यौन शोषण का सामान्य ज्ञान दिया जाना चाहिये क्योंकि इसके शिकार दोनों ही हो सकते हैं।
यौन शोषण से तात्पर्य बच्चों के गुप्तांगों से छेडछाड करना, बेवजह चिपकना,चूमना, गले लगा लेना, अश्लील बातें करना या फ़िर उन्हें अपने गुप्तांगों के संपर्क में लाना, इत्यादि।
लडकियों का यौन शोषण बडे उम्र के पुरुष या महिला द्वारा किया जा सकता है और लडकों का यौन शोषण सामान्यतौर पर बडे उम्र के पुरुषों द्वारा या न्यूली मैच्योर लडकी द्वारा किये जाने की संभावना रहती है।
यौन शोषण को विकृत मांसिकता का धोतक मान सकते हैं किंतु कभी कभी तत्कालीन उपजी सेक्सुल उत्तेजनाओं के कारण भी यौन शोषण की घटनाएं हो जाती हैं।
यौन शोषण एक दण्डनीय अपराध है बालिग व नाबालिग दोनों ही अपराध के लिये दोषी हो सकते है।
यौन विकास, यौन शोषण, यौन अपराध का सामान्य ज्ञान ग्रोईंग बच्चों को दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।