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Thursday, February 14, 2013

वेलेन्टाइन-डे ...


रश्में ...

तुम कहो तो .... आओ ... 
वेलेन्टाइन-डे की ... रश्में निभा लें 
कहीं ऐंसा न हो, शाम होते-होते, 
तुम कोई ... 
नया इल्जाम ... 
हमपे ............... मढ़ दो सनम ? 
... 
... 
वेलेन्टाइन-डे ... 

उनके हाँथों में ... 
लाल, पीले, सफ़ेद, गुलाबी ...
रंग-बिरंगे ...
ढेरों ....... गुलाब देख के 
जी मेरा घबरा गया !
बस, ... यूँ समझ लो 
उसी क्षण ... 
वेलेन्टाइन-डे ... मनाने का 
सिर पे चढ़ा भूत ...
अपने आप ...... उतर गया ? 

Friday, April 13, 2012

हाय-तौबा ...

विशेष टीप :- विगत दिनों एक "बोल्ड कविता" पर खूब हाय-तौबा पढ़ने को मिली ... पता नहीं वह "बोल्ड कविता" है भी या डिलीट कर दी गई ... किन्तु कुछेक बुद्धिजीवियों की सोच व विचारधारा / हाय-तौबा ... से भी कुछ सीखने को मिलता है ... मैं तो इतना ही कहूंगा कि जो विरोध हुआ वह जायज नहीं था क्योंकि उससे भी जियादा बोल्डनेस पढ़ने को मिलती रही है, और शायद आगे भी पढ़ने मिले ... मैंने उस "बोल्ड कविता" से भी अधिक "बोल्ड कविता" पढी है जिसकी खूब सराहना भी हुई है ... चूंकि कभी कभी मुझे भी कुछ "भूत जैसा" कुछ सवार हो जाता है तो मैं भी "बोल्ड टाईप" का कुछ लिखता रहा हूँ ... और कभी कभी कुछेक मित्रों के आग्रह / सुझाव पर उसे हटाना भी पडा है किन्तु किसी के विरोध पर कभी कुछ नहीं हटाया ... वजह यह है कि हरेक लेखक में विरोध सहने की शाक्ति भी होना चाहिए ... खैर, प्रवचन बंद करते हुए असल मुद्दे पे आते हैं ... वैसे उस "बोल्ड कविता" में ऐंसा कुछ ख़ास बोल्ड नहीं था जिसका विरोध किया ही जाए क्योंकि आज के वर्त्तमान दौर में कुछ बातें तो इतनी कॉमन हो गई हैं कि उन्हें बच्चे-बच्चे भी समझने लगे हैं ( यहाँ पर बच्चे-बच्चे से तात्पर्य उन बच्चों से नहीं है जो वास्तव में अभी बच्चे हैं ) ... वैसे -
०१ - विस्पर, कंडोम, व अन्य शक्तिवर्धक दबाइयों के विज्ञापनों को देखकर बच्चे जब उनके बारे में सवाल करते हैं तब हम उन सवालों के गोल-मोल जवाब देकर बचने का प्रयास तो कर सकते हैं किन्तु उनके सही जवाबों से हम उन्हें ज्यादा देर दूर नहीं कर सकते !
०२ - टेलीविजन व फिल्मों के चुम्बन, आलिंगन व रात्री मिलन के अर्धनग्न दृश्यों को देख-देख कर वो क्या मतलब समझ रहे हैं, क्या हम इससे इंकार कर सकते हैं ?
०३ - और फिर, फेसबुक व ब्लोग्स पर कोई बच्चे तो हैं नहीं, चलो माना कि भाई, बहन, माँ, बाप, बेटे, बेटियाँ जरुर हैं जो सभी इन शब्दों व भावों से भलीभांति परिचित हैं ... और अगर परिचित नहीं हैं तो उन्हें परिचित होना चाहिए !
०४ - और यदि कोई कविता या लेख में सम्भोग का हू-ब-हू साहित्यिक चित्रण कर भी देता है तो इसमें हाय-तौबा मचाने जैसी क्या बात है ... फिल्मों व टेलीविजन सीरियलों के घोर अश्लील चित्रांकन पर हाय-तौबा क्यों नहीं ? मंदिरों व एतिहासिक स्थलों पर लगी सम्भोग मुद्रा की मूर्तियों पर हाय-तौबा क्यों नहीं ? शिवलिंग पूजन पर हाय-तौबा क्यों नहीं ?
( तो प्रस्तुत है एक और बोल्ड कविता जो विगत दिनों शिकार हुई "बोल्ड कविता" तथा बहुत पहले हिट हुई "महा बोल्ड कविता" के शब्दों के आधार पर रची गई एक और सवालिया कविता ... )

हाय-तौबा ...
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एक दिन, एक कवियित्री ने -
लिंग
हस्तमैथुन
वीर्य
जैसे जटिल शब्दों को पिरोकर
एक रचना रची, और रचते ही -
अमर कर ली !
खूब वाह-वाही भी बटोरी !!
न सिर्फ पुरुषों की वरन महिलाओं की भी !!!
चहूँ ओर
तारीफ़-पे-तारीफ़ होती रही !
क्यों, क्योंकि -
वह रचना कवियित्री ने रची थी !!
ठीक कुछ इसी तरह, एक दिन
हमने भी एक रचना -
चुम्बन
आलिंगन
समागम
जैसे सरल व सहज शब्दों के सांथ रच दी
जो
अश्लील मान ली गई !
और
पूरी की पूरी रचना ... नकार दी गई !!
एक बोल्ड पर जय जयकार
और दूसरी बोल्ड पर हाय-तौबा ...
जय हो ... बुद्धिजीवियों की ... जय हो !!!

Friday, January 13, 2012

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के नाम एक पत्र ...

संस्थापकगण / आयोजकगण
सादर नमस्कार

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के आयोजनों पर समय समय पर मेरी नजर गई है, मैंने देखा व महसूस किया है कि संस्थान के आयोजन अक्सर राष्ट्र स्तरीय हो रहे हैं ( संभव है प्रदेश स्तरीय आयोजन भी हो रहे हों, जो मेरी नजर में न आए हों ) ... इन आयोजनों को देखकर / पढ़कर / सुनकर मुझे ऐंसा जान पड़ता है कि यह संस्थान मुख्य रूप से राष्ट्र स्तरीय आयोजनों को प्राथमिकता दे रही है !

संभव है संस्थान का गठन राष्ट्र स्तरीय आयोजनों के लिए ही किया गया हो, अभी तक प्रकाश में आए आयोजनों के लिए निसंदेह संस्थान की प्रसंशा होनी चाहिए, मैं व्यक्तिगत तौर पर संस्थान से जुड़े सभी बुद्धिमान महानुभावों को बधाई देता हूँ तथा भविष्य में आयोजित होने वाले आयोजनों के लिए शुभकामनाएं भी देता हूँ !

किन्तु, मेरा आग्रह है कि - यदि संस्थान छत्तीसगढ़ माटी में जन्में, जुड़े व निवासरत साहित्यिक प्रतिभाओं को भी सराहने, उभारने व पुरुस्कृत करने जैसे आयोजनों को प्राथमिकता दे तो यह अत्यंत ही गौरव की बात होगी ... मुझे आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि संस्थान अपनी आगामी योजनाओं के अंतर्गत प्रदेश स्तर के आयोजनों को भी प्राथमिकता प्रदान करेगी !

एक वृक्ष की छाया पर जितना अधिकार दूर से आ-जा रहे राहगीरों व मुसाफिरों का होता है ठीक उतना ही घरेलू व नजदीकी लोगों का भी होता है, संस्थान के अभी तक के आयोजनों को देखकर / पढ़कर / सुनकर यह तो स्पष्ट है कि राहगीर व मुसाफिर तो लाभान्वित हुए हैं / हो रहे हैं, किन्तु यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि घरेलू व नजदीकी लोग नजर अंदाज हुए हैं / हो रहे हैं !

मैं यह नहीं कहता कि यह दुर्भावना पूर्ण हुआ है या हुआ होगा, संभव है यह आयोजनों के रणनीतिकारों के ध्यान में न आया हो, या प्रदेश स्तरीय आयोजन रणनीति के हिस्सा ही न हों !

इस स्वतन्त्र व खुले पत्र के माध्यम से मेरा व्यक्तिगत तौर पर एक छोटा सा आग्रह व अनुरोध है कि -
१- साल में कम से कम एक साहित्यिक आयोजन प्रदेश स्तरीय अवश्य करें !
२- प्रदेश की साहित्यिक प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान करें !
३- प्रदेश की साहित्यिक प्रतिभाओं को अलग अलग विधाओं के अनुरूप पुरुस्कृत करें !
४- प्रदेश की साहित्यिक प्रतिभाओं को उनके लेखन की श्रेष्ठता के अनुरूप प्रकाशन संबंधी मंच प्रदान करने में सहयोग करें !
५- प्रदेश की साहित्यिक प्रतिभाओं को प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के लिए यथासंभव योजनाएं संचालित करें !
६- प्रदेश की साहित्यिक प्रतिभाओं की झिझक को दूर करने व प्रोत्साहन करने संबंधी आयोजनों को प्राथमिकता दें !
७- इत्यादि !

मेरा यह अनुरोध न सिर्फ प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान से है वरन अन्य स्थापित साहित्यिक संस्थाओं से भी है, सांथ ही सांथ देश के सभी संस्थानों से भी आग्रह है कि वे भी अपने अपने प्रदेशों में इस तरह के आयोजनों की ओर अग्रसर हों !

शुभकामनाएं !

Wednesday, January 4, 2012

'वटवृक्ष' त्रैमासिक पत्रिका : मेरी नजर में ...

'वटवृक्ष' त्रैमासिक पत्रिका का नवंबर-११ विशेषांक प्राप्त हुआ, देखकर व पढ़कर प्रसन्नता हुई, प्रसन्नता की एक छोटी वजह पत्रिका का सम्पादन रश्मि प्रभा के द्वारा किया जाना है वो इसलिए कि एक लम्बे समय से उन्हें ब्लॉग पर पढ़ते आ रहा हूँ उनकी रचनाओं ने मेरे पाठक मन को समय समय पर प्रभावित किया है !

ठीक इसी क्रम में रश्मि प्रभा द्वारा संपादित पत्रिका - वटवृक्ष को भी एक लय में पढ़ने का प्रयास किया है, मुख्य पृष्ठ पर महादेवी वर्मा रचित पंक्तियाँ - "चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम ... तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या ... " पढ़ने मिलीं, इन पंक्तियों ने निसंदेह पत्रिका को पढ़ने के लिए एक ऊर्जा प्रदान की !

फिर हफीज जालंधरी की खून खौला देने वाली रचना - जिसको चाहें चीरें-फाड़ें, खाएं-पिएं आनंद रहें ... पढ़ते ही पुन: एक नई ऊर्जा का संचार महसूस हुआ !

इसके पश्चात सम्पादक की कलम से - पढ़कर बेहद प्रसन्नता हुई खासतौर पर ये पंक्तियाँ - " ... इस स्थिति में / न तुम्हें भूख का एहसास होगा / न भौतिक सुख याद आएंगे / अंधेरे में टकराकर / किसी दर्द का एहसास भी नहीं होगा ... " एक बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय रचना के माध्यम से सम्पादक ने अपनी भावनाओं व विचारों को अभिव्यक्त किया है जो निसंदेह सराहनीय है !

ठीक इसी क्रम में मनु की रचना की ये पंक्तियाँ ... मैंने तुम्हारे हांथों को / हांथों में मिलाया / दूर भविष्य में बजने लगी / शहनाई ... आशा शैली की रचना की पंक्तियाँ - ... आज उसकी शाख शाख / हमको हवा देने लगी / कब गिरें हम टूटकर ... अमृता तन्मय की रचना की पंक्तियाँ - ... मैंने बनाया / अपने विचारों का / एक बहुत बड़ा / मजबूत हथौड़ा ... वन्दना गुप्ता की रचना की पंक्तियाँ - ... मगर कभी सोचना जरुर / क्या तुम कभी / बनना चाहोगे / शक्ति, धरणी / एक नारी ... सुमन मीत की रचना की पंक्तियाँ - ... लघु चिंतन में / सिमट जाता / पूरा स्वरूप / बन जाता / फिर / एक रेट का महल ... संजय मिश्र 'हबीब' की रचना की पंक्तियाँ - ... मेरे ख़्वाबों का / सारा समंदर पीकर भी / वह ना खिला ... भारत तिवारी की रचना की पंक्तियाँ - ... समय हारता नहीं है / सुना था उसने / फिर भी लड़ता रहा ... अरुण चन्द्र राय की रचना की पंक्तियाँ - ... इस शोर को / अपने काँधे पर लादे / चला जा रहा हूँ मैं ... कैलाश सी शर्मा की रचना की पंक्तियाँ - ... किस्मत पर रोने / या हथेली की लकीरों को / दोष देने से / क्या होगा ? ... जयप्रकाश मानस की रचना की पंक्तियाँ - कि जैसे युद्ध से लौटता हो कोई / या आवाजों के ऐनवक्त / सधे कदमों के इंतज़ार में हैं ... उपरोक्त रचनाकारों की रचनाओं की पंक्तियों ने भी प्रभावित किया, रचनाकार लेखन व सम्पादक चयन के लिए बधाई के पात्र हैं, सभी को बधाई !

इसी क्रम में मीनाक्षी का कविताओं पर केन्द्रित लेख - 'चर्चा-परिचर्चा', डा. सुभाष राय का लेख - प्रगतिशील लेखक संघ का हीरक जयन्ती समारोह, डा. विनय दास की अभिव्यक्ति - हिन्दी का सुपर स्टार अब नहीं रहा, ... इस अंक के पठनीय व प्रभावशाली लेख हैं, सांथ ही सांथ इस अंक की ख़ास बात ये है कि यह अंक ब्लॉग और ब्लॉगर की लेखनी पर केन्द्रित है जो निसंदेह बेहद प्रसंशनीय है, इस प्रयास के लिए सम्पादक की बौद्धिकता व दूरदर्शिता बेहद प्रसंशनीय है ... वटवृक्ष के आगामी अंकों व उज्जवल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएं !!

Monday, December 19, 2011

भारतीय संविधान ...

"भारतीय संविधान प्रत्येक इंसान को स्वर्गरूपी जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त व पर्याप्त है किन्तु क्रियान्वयन में लचरता व असफलता के परिणाम स्वरूप ज्यादातर लोगों को नारकीय जीवन जीना पड़ रहा है ... अफसोसजनक !"

आपके विचार भिन्न हो सकते हैं, आपके विचारों का स्वागत है ...
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कालाधन ...

बिट्टू - चच्चू, काला धन क्या होता है ?
चच्चू - बेटा ... कालाधन ... बोले तो, जो आम इंसान को दिखाई न दे !

बिट्टू - और सफ़ेद धन ?
चच्चू - बेटा, वह जो आम इंसान के हांथों में आते ही गायब हो जाए !!
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Friday, December 16, 2011

मंहगाई ...

मंहगाई बढाने में क्रिकेट व टेलीविजन चैनल्स के प्रायोजक प्रोडक्ट्स की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यदि इन दोनों के प्रायोजक प्रोडक्ट्स की लिस्ट बना कर इन प्रोडक्ट्स का घोर / घनघोर विरोध किया जाए अर्थात इन्हें खरीदना बिलकुल ही बंद कर दिया जाए तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मंहगाई गिर कर ज़मीन पर आ जायेगी ...

तात्पर्य यह है कि इन्हीं प्रोडक्ट्स के कारण क्रिकेट व टेलीविजन चैनल्स से जुड़े सभी प्रकार के कच्चे-पक्के लोगों का गुजर हो रहा है, सब सिलेब्रेटी बने हुए हैं ...

इन प्रोडक्ट्स के कारण दैनिक उपभोग की सभी बस्तुओं के दाम भी आसमान छू रहे हैं, यदि यह कहा जाए कि नमक-मिर्च की बढ़ती कीमतों में भी इनका प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष तौर पर योगदान है तो यह अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा ...

इस दिशा में भी एक विशाल जनजागृति / जनआन्दोलन की जरुरत है !!
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Wednesday, December 14, 2011

कट-पेस्ट अर्थात लेखन की चोरी ...

यह देखने में आ रहा है फेसबुक / ब्लॉग से कुछ लेखकगण, कुछेक फेस्बुकिया / ब्लॉग मित्रों की "कट-पेस्ट" की हरकतों के कारण लेखन से दूर हो रहे हैं, या यूँ कहा जाए कि वे महत्वपूर्ण लेखन के पोस्ट से बच रहे हैं ...

यह बेहद दुखद व शर्मनाक ही कहा जा सकता है कि जो लोग "कट-पेस्ट" का इस्तमाल कर रहे हैं वे मूल लेखक का नाम तक का उल्लेख नहीं कर रहे हैं जबकि उन्हें चाहिए की मूल लेखक के नाम का उल्लेख करें या संबंधित लिंक का उल्लेख करें ...

जहां तक मेरा आंकलन है कि कुछेक फेस्बुकिया / ब्लॉगर मित्र यह कार्य दुर्भावना वश नहीं कर रहे हैं मैंने खुद ही महसूस किया है कि कुछेक मित्रों को कुछ लेखन पसंद आता है तो वे उसे तत्काल "कट-पेस्ट" कर दे रहे हैं जबकि उन्हें ऐंसा नहीं करना चाहिए ...

लेकिन इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि कुछेक लोग दुर्भावनापूर्ण ही यह कार्य कर रहे हैं, ऐंसे लोग जो दुर्भावनापूर्ण ढंग से यह कार्य कर रहे हैं वे यह न भूलें की उनके विरुद्ध कानूनी दंडात्मक कार्यवाही भी की जा सकती है ...

क्योंकि फेसबुक / ब्लॉग पर प्रथम पोस्टिंग के टाईम के आधार पर यह प्रमाणित किया जाना बहुत ही सरल है कि चोरी अर्थात कट-पेस्ट किसने किया है ... सांथ ही सांथ तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुती भी प्रमाणित किया जाना सरल है ... अत: सभी सांथियों से आग्रह है कि वे चोरी अर्थात कट-पेस्ट से बचें अन्यथा किसी दिन उन्हें कानूनी पचड़ों से गुजरना पड़ सकता है ...

जो सांथी "कट-पेस्ट" अर्थात लेखन के चोरी होने के भय से दूर हो रहे हैं वे कतई न घवराएं ... लेखन व पोस्टिंग जारी रखें, क्योंकि कट-पेस्ट करने वाले का टाइमिंग आपकी पोस्टिंग की टाइमिंग के बाद का रहेगा ...

नोट :- कट-पेस्ट अर्थात लेखन की चोरी करने वालों के विरुद्ध भारतीय दंड विधान व अन्य विधानों के तहत कठोर दंडात्मक कार्यवाही संभव है अत: ऐंसी गलतियों से बचने का प्रयास करें, धन्यवाद !!

Friday, November 18, 2011

उलझन ...

कल एक फ्रेंड का फोन आया, बधाई दी नवरचित पुस्तक के लिए, फिर बोला श्याम भाई किसी पब्लिशर से बात करूँ प्रकाशन के लिए, मैंने कहा हाँ कर सकते हो, उसने कहा - खर्च आयेगा ... मैंने कहा - समझा नहीं ... बोला - छपने पर जो भी खर्च आयेगा वह देना पडेगा ... मैं कुछ देर शांत रहा फिर धीरे से बोला - यार कुछ दिन रुक जाओ, फिर बताता हूँ ... काफी देर सोचता-विचारता रहा कुछ समझ से परे लग रहा था फिर सोचा दिमाग में उलझन रखने से बेहतर है अन्य मित्रों से समझ व जान लिया जाए, सांथ ही सांथ सामान्य ज्ञान भी बढ़ जाएगा ...

... क्या पुस्तक प्रकाशन के लिए लेखक को छपने का खर्च वहन करना पड़ता है ?

विश्व कप क्रिकेट - १९९६ ...

विश्व कप क्रिकेट - १९९६ ... भारत-श्रीलंका सेमी फायनल मैच ... इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि विनोद काम्बली सही कह रहा है, ... अजहरुद्दीन व अजय जडेजा का "शून्य" पर आऊट हो जाना इस बात का प्रमाण है की मैच "फिक्स" था क्योंकि इन दोनों खिलाड़ियों पर मैच फिक्सिंग के आरोप पूर्व में प्रमाणित हो चुके हैं ...

Monday, October 10, 2011

जगजीत सिंह की याद में ...

जगजीत सिंह की याद में ...
हार्दिक श्रद्धांजलि ...
उनकी ओर से कुछ पंक्तियाँ ... जो मेरे जेहन में उमड़ पडीं ...

सहेज पाना, नहीं अब मुमकिन
तुम्हारी यादें, यहीं
छोड़ जा रहा हूँ !

था ये कैंसा, कारवां जिंदगी का
जिसे छोड़ पीछे, मैं चला जा रहा हूँ !

कभी याद आऊँ, गुनगुना लेना मुझको
गीत सारे, यहीं छोड़ जा रहा हूँ !

Thursday, September 1, 2011

... श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

बप्पा बप्पा गणपति बप्पा
विघ्न विनाशक गणपति बप्पा

तेरे-मेरे गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा

गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
घर घर विराजे गणपति बप्पा

जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा

लडडू लाओ, लडडू चढाओ
खाओ-खिलाओ गणपति बप्पा

आँगन-आँगन ढोल बजाओ
बिराज गए हैं गणपति बप्पा

गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा

सबसे आगे गणपति बप्पा
सबके संग-संग गणपति बप्पा

जोर से बोलो गणपति बप्पा
जय जय बोलो गणपति बप्पा

सिद्धि विनायक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा

विघ्न विनाशक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा

जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा !

Monday, July 4, 2011

... वाह ! आमिर ! वाह !!

वाह ! आमिर ! वाह
तुम्हें तो आयेगी नहीं
और आनी भी नहीं चाहिए
क्या ! शर्म
क्या करेगी, आकर, तुम्हें
तुम्हारा तो अधिकार है, जन्म सिद्ध
तुम्हारे से मेरा तात्पर्य
फिल्म कलाकार से है
गर, आने लगी, शर्म, फ़िल्मी कलाकारों को
तो, शायद, फ़िल्में बनना
बंद न हो जाएं, अश्लील, फूहड़, और दोअर्थी
चलो ठीक ही हुआ, तुमको मौक़ा मिला
तुमने भी, सिद्ध कर दी, फूहड़ता
फूहड़ता का स्तर, क्या है, कितना है, क्यों है
ये तो, मैं, फिल्म देखने के बाद
ही बयां कर पाऊँ
पर, जैसा सुन रहा हूँ, लोग बयां कर रहे हैं
एक अनुमान, लग रहा है
तुम चरम पर हो, इस फिल्म में, संग फूहड़ता के
पर तुम, मत करना, शर्म, खुद पर
क्यों, क्योंकि, तुम्हारा तो अधिकार है
फूहड़ता, अश्लीलता, और दोअर्थी संवादों पर
क्यों, क्योंकि ...
तुम एक कलाकार हो, फ़िल्मी कलाकार
वाह वाह ! देल्ही बेली
वाह ! आमिर ! वाह !!

Monday, November 15, 2010

माँ ने कहा था !


हमारे जाने-मानें चर्चित ब्लॉगर साथी अरविंद झा (contact no- 09752475481) की कलम की प्रस्तुति - माँ ने कहा था ... समीक्षा अगली पोस्ट पर ... बधाई शुभकामनाएं !

Thursday, September 23, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और............. भाग-4 (व्यंग्य)

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-4 (व्यंग्य)

मैं चुपके से सुन रहा था. उनके रेखा गणित में गणित कहीं नहीं था सिर्फ़ रेखा ही रेखा दिख रही थी. ससुरजी को कैसे समझाया जाये गणित में भी बहकी बातें ही पढाते हैं. वह कभी भी गलत नहीं बोलते लेकिन बच्चों पर तो इसका दुष्प्रभाव ही पङेगा न ?. मैंने सोचा देव-भाषा संस्कृत के साथ छेङखानी नहीं करेंगे.इसलिये मैंने उन्हें टिंकू को संस्कृत पढाने का आग्रह किया.अगले दिन आकर दरबाजे पर ठहर गया. ससुरालवालों ने सुनने की क्षमता तो बढा ही दिया है.सुनने लगा------

"विद्या ददाति लोभम , लोभम ददाति धूर्तताम

धूर्तत्वा धनमाप्नोति,धनात पाप: तत: दुखम.

अर्थ बाद मे बताउंगा पहले श्लोक लिखो.

"उत्तमा कारं ईच्छन्ति , मोटर सायकिलं मध्यमा

अधमा सायकिलं ईच्छान्ति सायकिलं महती धनं.

"असत्यं वद प्रियं वद न वद असत्यं अप्रियं

विना विलम्बे सत्यम प्रियम वद अवश्यम.

अगला श्लोक: नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र नेता ".

तभी मेरे मुंह से निकल गया---"नेता नहीं देवता.". ससुरजी बोलने लगे---" दामादजी मैंने जान-बूझकर मोडिफ़ाइ करके बताया है.आज के बच्चे देवी-देवता के बारे में नहीं जानते और देवता और नेता में अब फ़र्क ही कहां है. अब तो सुर-असुर साथ-साथ बैठकर पक्ष और विपक्ष की भूमिका निबाहते हैं. दोनो मिलकर सत्ता का अमृत पीते हैं. उपर से संसार का विष इतना विषैला हो चुका है कि आज के महादेव विष पीकर कोमा में जा चुके हैं....देखियेगा जल्दी ही कोमा से फ़ुल-स्टोप लग जायेगा ".

ओह कोमा में तो मेरी जिंदगी चली गयी थी. ससुरजी के रहते टिंकू का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था. अंधकार में तो रोशनी डाला जा सकता है लेकिन इसी तरह वह पढाते रहे तो उसका भविष्य गर्त में चला जायेगा.मैंने फ़िर से उस ब्लोगर मित्र से सलाह लिया तो उसने कहा कि उनसे शोपिन्ग-वोपिंग करवाओ.मेरी बात को मानते हुए ससुरजी सायंकाल टिंकू के साथ शोपिंग के लिये चले गये.

अब घर में मैं और श्रीमतीजी ही बच गये थे.कुछ ही देर में मौका देखकर अपने पिता के सेवा और सत्कार में हुई कमी से आहत होकर पानी से भरा हुआ श्रीमतीजी की आंखों का स्टोर हाउस रिसने लगा----"जानते हो जब मेरे पापा शोपिंग के लिये जाने लगे मैंने रुपयों के लिये ड्रावर खोला.उसमे गांधी जी के फ़ोटो वाला एक भी नोट नहीं निकला.मेरी आंखों मे आंसू तैर गये....पापा क्या सोचे होंगे....उन्हें कितना बुरा लगा होगा ".

मैंने कहा---" इसमे बुरा लगनेवाली क्या बात है...मेरे ससुरजी ग्रेट हैं. उन्हें बिल्कुल बुरा नहीं लगा होगा "

" हां..वह कहने लगे कि कोई बात नहीं है, जो लोग आज के जमाने में सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हैं, गांधीजी उनसे दूर ही रहते हैं. आजकल वह भी उन बन्दरों से नफ़रत करते है जो उनके कहे अनुसार जीवन जीते थे. क्योंकि उन्हीं बन्दरों के चलते उन्हें गोली मारा गया था..."

मैंने समझाया----" डार्लिंग कहां से कहां बात ले जा रही हो. नोटों पर गांधीजी की तस्वीर होती है गांधीजी थोङे ही होते हैं.".वह फ़िर रोने लगी----"उनको तो गोडसे मरवाया गया था. अब तो उनकी तस्वीर ही बची है न ? ".

मैंने कहा---" स्वीटहर्ट गांधीजी तो हमारे दिल में रहते हैं ".

वह झला उठी---" मुझे बेवकूफ़ मत बनाओ छोटे से दिल में तो हर अच्छे लोग रहते हैं जिनसे हम प्यार करते हैं. लेकिन इतने महान हैं तो हमारे बङे से पेट में क्यों नहीं समा जाते जो खाली है."

मैं उछल पङा----" ब्लोग पे डालुंगा...डार्लिंग तुमने ऐसी बात कह दी जो आजतक बङे से बङे नेता भी नहीं कह पाये....मैं लिखुंगा कि जिसका पेट खाली है उसके पेट को भरो सिर्फ़ उसके दिल में ही जगह बनाने से क्या होगा.सबसे बङा सत्य तो ये है कि आज भी लोगों का पेट खाली है और सबसे बङी अहिंसा यह है कि भूखे पेट रहकर भी जिससे प्यार होता है हम उसे दिल में जगह दे देते हैं. जिसने हमारे लिये वस्त्र तक का त्याग कर दिया उसे हम दिल में जगह क्यों न दें चाहे वह महात्मा गांधी हों या मल्लिका शेरावत ".

( शुरु के तीन भाग krantidut.blogspot.com पर देख सकते हैं)

( नोट :- यह पोस्ट हमारे प्रिय अरविंद झा जी द्वारा लिखी गई है, तकनीकी कारणों से वे इसे स्वयं के ब्लॉग - क्रांतिदूत पर पोस्ट नहीं कर पा रहे हैं इसलिए यहाँ प्रकाशित है .... आपकी प्रतिक्रया अपेक्षित है, धन्यवाद )

Thursday, May 20, 2010

अर्जुन व कर्ण ... बलशाली कौन ???

चलो आज एक सुनी-सुनाई प्रस्तुत है : -

महाभारत काल में रणभूमि में कौरव व पाण्डवों के बीच युद्द चल रहा था .... आमने-सामने अर्जुन व कर्ण ... अर्जुन व कर्ण जब एक-दूसरे पर वाण चलाते तो वार तो कट जा रहा था ... पर अर्जुन के वार से कर्ण का रथ चार कदम पीछे चला जाता था और कर्ण के वार से अर्जुन का रथ दो कदम पीछे जाता था ... इसी बात पर विश्राम के समय में अर्जुन इठलाते हुये श्रीकृष्ण से कहते हैं कि देखिये आप कहते हैं कि कर्ण मुझसे भी ज्यादा बल शाली है, देखा आपने आज मेरे आक्रमण से कर्ण का रथ चार कदम पीछे और उसके आक्रमण पर अपना रथ मात्र दो कदम पीछे जा रहा था यह प्रमाणित हो रहा है कि मैं कर्ण से ज्यादा बलशाली हूं ... श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुये कहते हैं ... हे वत्स अर्जुन ये तुम्हारा अहं बोल रहा है मैं अब भी कहता हूं कर्ण ज्यादा बलशाली है वो इसलिये जब तुम्हारे रथ पर हनुमान जी का ध्वजारूपी जो झंडा लगा है उस पर उनका आशिर्वाद है और साक्षात मैं तुम्हारा सारथी हूं फ़िर भी तुम्हारा रथ पीछे चला जा रहा है इससे अब तुम स्वयं अंदाजा लगा सकते हो कि कौन ज्यादा बलशाली है .... यह तो अधर्म के विरुद्ध धर्म की लडाई है तुम तो अपना कर्म जारी रखो ..... !!!!

Tuesday, May 18, 2010

यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट-३)

यौन शोषण क्या है ?

यौन शोषण की एक बृहद परिभाषा है किंतु यहां पर बच्चों के यौन शोषण पर प्रकाश डालना आवश्यक है, सामान्य तौर पर लडके व लडकियों दोनो को ही यौन शोषण का सामान्य ज्ञान दिया जाना चाहिये क्योंकि इसके शिकार दोनों ही हो सकते हैं।

यौन शोषण से तात्पर्य बच्चों के गुप्तांगों से छेडछाड करना, बेवजह चिपकना,चूमना, गले लगा लेना, अश्लील बातें करना या फ़िर उन्हें अपने गुप्तांगों के संपर्क में लाना, इत्यादि।

लडकियों का यौन शोषण बडे उम्र के पुरुष या महिला द्वारा किया जा सकता है और लडकों का यौन शोषण सामान्यतौर पर बडे उम्र के पुरुषों द्वारा या न्यूली मैच्योर लडकी द्वारा किये जाने की संभावना रहती है।

यौन शोषण को विकृत मांसिकता का धोतक मान सकते हैं किंतु कभी कभी तत्कालीन उपजी सेक्सुल उत्तेजनाओं के कारण भी यौन शोषण की घटनाएं हो जाती हैं।

यौन शोषण एक दण्डनीय अपराध है बालिग व नाबालिग दोनों ही अपराध के लिये दोषी हो सकते है।

यौन विकास, यौन शोषण, यौन अपराध का सामान्य ज्ञान ग्रोईंग बच्चों को दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।

Monday, May 10, 2010

यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट - २)

यौन शिक्षा का मतलब समझना व समझा पाना उतना ही कठिन है जितना इस शिक्षा के अभाव के कारण जन्म लेने वाली समस्याओं से जूझना कठिन है ... मैं नहीं कहता कि यौन शिक्षा अत्यंत आवश्यक है पर इसे नजर-अंदाज करना भी बुद्धिमानी नहीं है !!

... यह संभव है कि यौन शिक्षा के कारण हमें आधुनिकता का शिकार होना पड सकता है जैसा कि पश्चिमी देशों में हो रहा है ... पर जो पश्चिमी देशों में हो रहा है वह जरुरी तो नहीं कि "यौन शिक्षा" के कारण ही हो रहा हो ... हम यह कैसे कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों में जो समस्याएं सामने परिलक्षित हो रही हैं उसका कारण "यौन शिक्षा" ही है ... यह भी तो संभव है कि इन समस्याओं की जडें वहां के पारिवारिक परिवेश के कारण जन्म ले रही हैं !!

... क्या कोई है जो यह कह सकता है कि वहां का पारिवारिक परिवेश ऎसा नहीं है कि "यौन शिक्षा" को भी विफ़ल कर रहा है ... क्या वहां पारिवारिक संस्कार ऎसे नही हैं कि "यौन शिक्षा" भी बच्चों को बिगडने से रोक सके ... जब परिवार कि महिलाएं व पुरुष खुले रूप से व्यावहारिक आधुनिक जीवन जी रहे हों तब क्या संभव है कि कोई भी "शिक्षा" वहां असर कारक हो सकती है ...

... फ़िर क्यॊं हम या वहां के बुद्धिजीवी लोग विकृतियों को "यौन शिक्षा" की कमजोरी मान सकते हैं ... क्या हम यह नहीं कह सकते कि जहां का पारिवारिक व सामाजिक वातारण ही ऎसा हो गया हो कि वहां कोई "शिक्षा" असर कारक हो ही नही सकती !! ... फ़िर हम किसी "यौन संबंधी अनहोनी" को "यौन शिक्षा" के कारण उपजी घटना कैसे मान सकते हैं !!

... जब वहां पति-पत्नी ... माता-पिता ... भाई-वहन ... दादा-दादी ... नाना-नानी जैसे रिश्तों को कोई तबज्जो नहीं दिया जा रहा हो तो बच्चों को स्वछंद रूप से जीने से कोई कैसे रोक सकता है ... जब स्वछंदता की कोई सीमा नही रहेगी तो "यौन संबंधी अपराधों" को जन्म लेने से कैसे रोका जा सकता है ... इन हालात में जब "यौन अपराध" होना तय है तो हम "यौन शिक्षा" को इसका दोषी कैसे मान सकते हैं ???

Sunday, May 9, 2010

यौन शिक्षा की पाठशाला (पार्ट - १)

"यौन शिक्षा" एक ऎसा विषय जिस पर अभी भी मतभेद जारी हैं, कुछ बुद्धिजीवी वर्ग इसके पक्षधर हैं तो कुछ निसंदेह इसके विरोधी भी हैं ... विरोध भी जायज है क्योंकि ये विषय ही ऎसा है कि कोई भी नहीं चाहेगा कि उसके बच्चों को अनावश्यक रूप से समय पूर्व ही "यौन शिक्षा" से अवगत कराया जाये ... वो इसलिये भी यदि उन्हें समय पूर्व ही "यौन शिक्षा" से शिक्षित करने का प्रयास किया जायेगा तो वे उसे प्रेक्टीकल तौर पर व्यवहारिक जीवन में अमल भी कर सकते हैं जिसके दुष्परिणामों से भी इंकार नहीं किया जा सकता ... यह भी स्वभाविक है कि यह विषय पढने और पढाने दोनों ही द्रष्टिकोण से असहजता को जन्म देता है।

सर्वप्रथम तो मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि "यौन शिक्षा" से तात्पर्य "शिक्षा" से है कि "कामक्रीडा" से ... इसलिये इसमे इतनी भयभीत होने वाली बात नहीं है ... यदि बच्चों को समय रहते शिक्षित नहीं किया जाता है तो भी नासमझी में उठे किसी प्रायोगिक कदम के कारण समस्याओं से जूझना पड सकता है जो अक्सर व्यवहारिक रूप में हमें सुनने मिल जाती हैं ... अक्सर ऎसा देखा सुना जाता है कि अज्ञानता के कारण भी बच्चे यौन संबंधी ऎसे प्रयोग कर बैठते हैं जिसके परिणाम अहितकार ही होते हैं

यहां पर "यौन शिक्षा" से मेरा सीधा-सीधा तात्पर्य सामान्य व्यवहारिक ज्ञान से है जो बच्चों के लिये बेहद जरूरी है जिसका ज्ञान उन्हें होना ही चाहिये ... यह ज्ञान सिर्फ़ लडकियों को वरन लडकों को भी होना चाहिये वो इसलिये कि "यौन संबंधी समस्याओं" का शिकार कोई भी हो सकता है ... यह ज्ञान "यौन शोषण" से बचाव के लिये ही जरुरी नहीं है वरन यौन संबंधी अपराध बोध के लिये भी आवश्यक है ... शिक्षा ज्ञान के परिणाम देर-सबेर हितकर ही होते हैं ... यहां पर यह भी स्पष्ट कर देना मैं आवश्यक समझता हूं कि "यौन शिक्षा" अर्थात यौन संबंधी सामान्य व्यवहारिक ज्ञान एक "चाकू" की तरह है जिसका सही इस्तमाल सब्जी काटने या आपरेशन के रूप में किया जाये तो हितकर है और प्रयोग के तौर पर किसी के हाथ या गला काटने में किया जाये तो अहितकर है

Friday, May 7, 2010

यौन शिक्षा की पाठशाला

यौन शिक्षा क्या है ? ... यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है ? ... चलो इस विषय पर हम ही चर्चा शुरु कर देते हैं ... चर्चा शुरु करने का कारण भी बता देते हैं :-

... हुआ ये कि कल की हमारी समसामयिक पोस्ट पर लगे फ़ोटो को देखकर माननीय रचना जी व माननीय फ़िरदौस खान जी ने तीखी टिप्पणी व्यक्त की ... स्वागत है ... टिप्पणी पढने के बाद हम रचना जी के ब्लाग "नारी" पर पहुंचे ... वहां रचना जी ने "कुछ प्रश्न या मोनोलोग" पोस्ट प्रकाशित की है जो मात्र चार लाईन की है तथा यौन शिक्षा को लेकर है ... वहां पर मैंने एक टिप्पणी दर्ज की है जो इस प्रकार है :-

रचना जी
आप सही कह रही हैं कि शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक संबंध बनाना अपराध है !

यह भी सही कहा कि लडके नहीं जानते कि लडकी से शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार हो सकता है !

यह कहना भी सही है कि सेक्स की सही शिक्षा के खिलाफ़ समाज उठ खडा होता है !

... सेक्स की सही शिक्षा से आपका तात्पर्य क्या है विस्तार रूप से अभिव्यक्त क्यूं नहीं करतीं ?
... क्या ऊपर आपकी पोस्ट पर लिखीं चार लाईनें जो अपराध व बलात्कार को परिभाषित कर रहीं हैं आपकी नजर में यही सेक्स शिक्षा है ?

...यौन शोषण क्या है,बलात्कार क्या है,अपराध क्या है, ... क्या यही आपकी नजर में यौन शिक्षा है?

.... रचना जी यौन शिक्षा की बात तो कर रही हैं पर पोस्ट पर यौन शिक्षा के नाम पर कुछ नहीं है वहीं पर फ़िरदौस खान जी ने भी सहमती दर्ज की है ... मैं सोचता हूं कि जब दोनों मेरी समसामयिक पोस्ट पर व लगे फ़ोटो पर तीखी टिप्पणी दर्ज कर रही हैं तो क्या यौन शिक्षा के गूढ रहस्यों पर प्रकाश डाल पायेंगी ???

... चलो हम ही शुरु करते हैं यौन शिक्षा की पाठशाला .... आपकी टिप्पणी/अभिव्यक्ति के साथ .... ब्रेक के बाद ....!!!!

पार्ट -
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"यौन शिक्षा" एक ऎसा विषय जिस पर अभी भी मतभेद जारी हैं, कुछ बुद्धिजीवी वर्ग इसके पक्षधर हैं तो कुछ निसंदेह इसके विरोधी भी हैं ... विरोध भी जायज है क्योंकि ये विषय ही ऎसा है कि कोई भी नहीं चाहेगा कि उसके बच्चों को अनावश्यक रूप से समय पूर्व ही "यौन शिक्षा" से अवगत कराया जाये ... वो इसलिये भी यदि उन्हें समय पूर्व ही "यौन शिक्षा" से शिक्षित करने का प्रयास किया जायेगा तो वे उसे प्रेक्टीकल तौर पर व्यवहारिक जीवन में अमल भी कर सकते हैं जिसके दुष्परिणामों से भी इंकार नहीं किया जा सकता ... यह भी स्वभाविक है कि यह विषय पढने और पढाने दोनों ही द्रष्टिकोण से असहजता को जन्म देता है।

सर्वप्रथम तो मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि "यौन शिक्षा" से तात्पर्य "शिक्षा" से है कि "कामक्रीडा" से ... इसलिये इसमे इतनी भयभीत होने वाली बात नहीं है ... यदि बच्चों को समय रहते शिक्षित नहीं किया जाता है तो भी नासमझी में उठे किसी प्रायोगिक कदम के कारण समस्याओं से जूझना पड सकता है जो अक्सर व्यवहारिक रूप में हमें सुनने मिल जाती हैं ... अक्सर ऎसा देखा सुना जाता है कि अज्ञानता के कारण भी बच्चे यौन संबंधी ऎसे प्रयोग कर बैठते हैं जिसके परिणाम अहितकार ही होते हैं

यहां पर "यौन शिक्षा" से मेरा सीधा-सीधा तात्पर्य सामान्य व्यवहारिक ज्ञान से है जो बच्चों के लिये बेहद जरूरी है जिसका ज्ञान उन्हें होना ही चाहिये ... यह ज्ञान सिर्फ़ लडकियों को वरन लडकों को भी होना चाहिये वो इसलिये कि "यौन संबंधी समस्याओं" का शिकार कोई भी हो सकता है ... यह ज्ञान "यौन शोषण" से बचाव के लिये ही जरुरी नहीं है वरन यौन संबंधी अपराध बोध के लिये भी आवश्यक है ... शिक्षा ज्ञान के परिणाम देर-सबेर हितकर ही होते हैं ... यहां पर यह भी स्पष्ट कर देना मैं आवश्यक समझता हूं कि "यौन शिक्षा" अर्थात यौन संबंधी सामान्य व्यवहारिक ज्ञान एक "चाकू" की तरह है जिसका सही इस्तमाल सब्जी काटने या आपरेशन के रूप में किया जाये तो हितकर है और प्रयोग के तौर पर किसी के हाथ या गला काटने में किया जाये तो अहितकर है ।

पार्ट -
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यौन शिक्षा का मतलब समझना व समझा पाना उतना ही कठिन है जितना इस शिक्षा के अभाव के कारण जन्म लेने वाली समस्याओं से जूझना कठिन है ... मैं नहीं कहता कि यौन शिक्षा अत्यंत आवश्यक है पर इसे नजर-अंदाज करना भी बुद्धिमानी नहीं है !!

... यह संभव है कि यौन शिक्षा के कारण हमें आधुनिकता का शिकार होना पड सकता है जैसा कि पश्चिमी देशों में हो रहा है ... पर जो पश्चिमी देशों में हो रहा है वह जरुरी तो नहीं कि "यौन शिक्षा" के कारण ही हो रहा हो ... हम यह कैसे कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों में जो समस्याएं सामने परिलक्षित हो रही हैं उसका कारण "यौन शिक्षा" ही है ... यह भी तो संभव है कि इन समस्याओं की जडें वहां के पारिवारिक परिवेश के कारण जन्म ले रही हैं !!

... क्या कोई है जो यह कह सकता है कि वहां का पारिवारिक परिवेश ऎसा नहीं है कि "यौन शिक्षा" को भी विफ़ल कर रहा है ... क्या वहां पारिवारिक संस्कार ऎसे नही हैं कि "यौन शिक्षा" भी बच्चों को बिगडने से रोक सके ... जब परिवार कि महिलाएं व पुरुष खुले रूप से व्यावहारिक आधुनिक जीवन जी रहे हों तब क्या संभव है कि कोई भी "शिक्षा" वहां असर कारक हो सकती है ...

... फ़िर क्यॊं हम या वहां के बुद्धिजीवी लोग विकृतियों को "यौन शिक्षा" की कमजोरी मान सकते हैं ... क्या हम यह नहीं कह सकते कि जहां का पारिवारिक व सामाजिक वातारण ही ऎसा हो गया हो कि वहां कोई "शिक्षा" असर कारक हो ही नही सकती !! ... फ़िर हम किसी "यौन संबंधी अनहोनी" को "यौन शिक्षा" के कारण उपजी घटना कैसे मान सकते हैं !!

... जब वहां पति-पत्नी ... माता-पिता ... भाई-वहन ... दादा-दादी ... नाना-नानी जैसे रिश्तों को कोई तबज्जो नहीं दिया जा रहा हो तो बच्चों को स्वछंद रूप से जीने से कोई कैसे रोक सकता है ... जब स्वछंदता की कोई सीमा नही रहेगी तो "यौन संबंधी अपराधों" को जन्म लेने से कैसे रोका जा सकता है ... इन हालात में जब "यौन अपराध" होना तय है तो हम "यौन शिक्षा" को इसका दोषी कैसे मान सकते हैं ???

पार्ट -
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यौन शोषण क्या है ?

यौन शोषण की एक बृहद परिभाषा है किंतु यहां पर बच्चों के यौन शोषण पर प्रकाश डालना आवश्यक है, सामान्य तौर पर लडके व लडकियों दोनो को ही यौन शोषण का सामान्य ज्ञान दिया जाना चाहिये क्योंकि इसके शिकार दोनों ही हो सकते हैं।

यौन शोषण से तात्पर्य बच्चों के गुप्तांगों से छेडछाड करना, बेवजह चिपकना,चूमना, गले लगा लेना, अश्लील बातें करना या फ़िर उन्हें अपने गुप्तांगों के संपर्क में लाना, इत्यादि।

लडकियों का यौन शोषण बडे उम्र के पुरुष या महिला द्वारा किया जा सकता है और लडकों का यौन शोषण सामान्यतौर पर बडे उम्र के पुरुषों द्वारा या न्यूली मैच्योर लडकी द्वारा किये जाने की संभावना रहती है।

यौन शोषण को विकृत मांसिकता का धोतक मान सकते हैं किंतु कभी कभी तत्कालीन उपजी सेक्सुल उत्तेजनाओं के कारण भी यौन शोषण की घटनाएं हो जाती हैं।

यौन शोषण एक दण्डनीय अपराध है बालिग व नाबालिग दोनों ही अपराध के लिये दोषी हो सकते है।

यौन विकास, यौन शोषण, यौन अपराध का सामान्य ज्ञान ग्रोईंग बच्चों को दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।

............. जारी है ............