Friday, June 10, 2011

तर-बतर ...

काली घटाओं सी
घनी रात में, चलो गए
सुन पुकार तेरी
हम
घने, घनघोर, बादलों की तरह !

बरसते रहे
रुक रुक कर, थम थम कर
रात भर ...
करते रहे, तुम्हें, तर-बतर
रिमझिम-रिमझिम
बारिश की तरह !

ठहरे, फिर उमड़े
कभी, बादलों सी
गड़-गड़ाहट की तरह
कभी
कौंधती,
बिजली की तरह !

तुम्हें, भिगाते भी रहे
खुद, भीगते भी रहे
रात भर ...
होते रहे, तर-बतर
रिमझिम - रिमझिम
बारिश की तरह !!

5 comments:

संगीता पुरी said...

सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

वन्दना said...

भावभीनी प्रस्तुति।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अच्छी है, लेकिन मुझे आपकी समसामयिक रचनायें और अधिक अच्छी लगती हैं..

Udan Tashtari said...

अच्छी रचना...