Monday, January 18, 2010

कंजूस खोपड़ी

एक दिन ट्रैन में यात्रा के दौरान सामने वाली सीट पर एक महाशय को सूट-बूट मे आस-पास बैठे यात्रियों के साथ टाईमपास करते देखा, वह देखने से धनवान और बातों से धनाढय जान पड रहा था, तभी एक फ़ल्ली बेचने वाला आया, कुछ यात्रियों ने ५-५ रुपये की फ़ल्लियां खरीद लीं तभी उस धनाढय महाशय ने भी फ़ल्ली वाले से २ रुपये की फ़ल्ली मांगी, फ़ल्ली वाले ने उसे सिर से पांव तक देखा और २ रु. की फ़ल्ली चौंगा मे निकाल कर देने लगा तभी महाशय ने व्याकुलतापूर्वक कहा बहुत कम फ़ल्ली दे रहे हो तब उसने कहा - सहाब मै कम से कम ५ रु. की फ़ल्ली बेचता हूं वो तो आपके सूट-बूट को देखकर २ रु. की फ़ल्ली देने तैयार हुआ हूं कोई गरीब आदमी मांगता तो मना कर देता।
वह महाशय अन्दर ही अन्दर भूख से तिलमिला रहे थे फ़िर भी कंजूसी के कारण मात्र २ रु. की ही फ़ल्ली मांग रहे थे फ़ल्ली से भरा चौंगा हाथ मे लेकर २ रु देने के लिये पेंट की जेब मे हाथ डाला तो ५००-५००, १००-१०० के नोट निकले, अन्दर रखकर दूसरी जेब मे हाथ डाला तो ५०-५०,२०-२०,१०-१० के नोट निकले, उन्हे भी अन्दर रखकर शर्ट की जेब मे हाथ डाला तो ५-५ के दो नोट निकले, एक ५ रु का नोट हाथ मे रखकर सोचने लगे तभी फ़ल्ली वाले ने कहा सहाब पैसे दो मुझे आगे जाना है, तब महाशय ने जोर से गहरी सांस ली और नोट को पुन: अपनी जेब मे रख लिया और चौंगा से दो फ़ल्ली निकाल कर चौंगा फ़ल्ली सहित वापस करते हुये बोले- ले जा तेरी फ़ल्ली नही लेना है, फ़ल्ली बाला भौंचक रह गया गुस्से भरी आंखों से महाशय को देखा और आगे चला गया।
महाशय ने हाथ मे ली हुईं दोनो फ़ल्लियों को बडे चाव से चबा-चबा कर खाया और मुस्कुरा कर चैन की सांस ली, ये नजारा देख कर त्वरित ही मेरे मन में ये बिचार बिजली की तरह कौंधा "क्या गजब का 'लम्पट बाबू' है, ..... पेट मे भूख - जेब मे नोट - क्या गजब कंजूस ....... मुफ़्त की दो फ़ल्ली खूब चबा-चबा कर ....... वा भई वाह ..... क्या कंजूस खोपडी है" तभी अचानक उस "लम्पट बाबू" की नजर मुझ पर पडी थोडा सहमते हुये वह खुद मुझसे बोला - देखो न भाई साहब २ रु खर्च होते-होते बच गये एक घंटे बाद घर पहुंच कर खाना ही तो खाना है!!! तब मुझसे भी रहा नही गया और बोल पडा - वा भई वाह क्या ख्याल है ...... लगता है सारी धन-दौलत पीठ पर बांध कर ले जाने का भरपूर इरादा है ।

28 comments:

मनोज कुमार said...

पक्के मकान वालों के खुलते कहां हैं राज़
बेपर्दा हो ही जाती है कच्चे घरों की बात
ये तो आप बहुत ही कड़बा सच सामने लाए हैं।

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! मजेदार किस्सा।
फिल्म दिल देखकर पहली बार कंजूस -मक्खी चूस की परिभाषा समझ में आई थी।

राज भाटिय़ा said...

बहुत मिलते है ऎसे लोग ओर फ़िर इन की जमा की ज्यादाद पर, इन के मरने के बाद दुसरे ऎश करते है

shama said...

Ajeebo 'gareeb' aadmeee hoga!

दिगम्बर नासवा said...

कंजूस लोग ऐसे ही होते हैं .......... कोई कुछ नही कर सकता ........

kshama said...

Yebhee kamal shaksh hoga!

रश्मि प्रभा... said...

एक से बढ़कर एक लोग मिलेंगे दुनिया में

अल्पना वर्मा said...

रोचक!
कैसे कैसे लोग हैं इस जहाँ में!

psingh said...

बहुत सुन्दर यात्रा वृतांत
बहुत बहुत आभार

हरकीरत ' हीर' said...

समझ सकती हूँ इस कहानी में झूठ का पुट जरा भी नहीं है .....मैंने तो अपने आस पास ही कई ऐसे लोग देखे हैं .....ऐसे लोगों को सिर्फ नरक मिलता है क्योंकि इन्होने दान कभी किया ही नहीं होता .....!!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

श्याम कोरी जी, आदाब
अब 'चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाये' वाली कहावत
ज़िन्दा रखने के लिये
कुछ 'नमूने' तो मौजूद होने चाहिये ना
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Babli said...

आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन की हार्दिक शुभकामनायें!
वाह बहुत बढ़िया लगा! बहुत खूब !

संजीव गौतम said...

मजा आ गया गुरू.उस महान आत्मा को मेरा नमन.

BrijmohanShrivastava said...

क्या बात है भाई, तुम्हे दे रहा हूं कोई गरीब मांगता तो न देता ।गनीमत है जो उन्होने दो फ़ल्ली निकाल ली थी उनमे से एक आपको देते हुए नही कहा कि "लो खाओ एश करो ,अपने साथ यात्रा करोगे तो यही मजे करोगे "

शोभना चौरे said...

bahut sahi kha hai trh trh ke log hote haiduniya me.

Devendra said...

झकास!

इससे अच्छा शब्द तारीफ़ के लिए नहीं मिला.

ट्रेन कि यात्रा ने साहित्यकारों को अद्भुत साहित्य की सौगात दी है.कोई उसे सहेज कर संस्मरण बना देता है कोई कविता या कहानी. बड़ी बात तो महसूस करने और सहेजने की है.

प्रेरक संस्मरण लिखने के लिए बधाई.

Apanatva said...

aisa bhee hota hai aise hee log shayad makheechoos bhee kahlate hai. kash ye ehsaas ho jaye ki sath kuch nahee jana .

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मज़ेदार किस्सा. होते हैं ऐसे लोग भी.

Roshani said...

संवेदनशील घटना की बढ़िया प्रस्तुति .....
श्याम जी यह दृश्य लगभग हर जगह देखने को मिल जाती है कई महिलाओं को देखा है सब्जीवाले, मोचियों,और गरीब रिक्शेवालों,रद्दी पेपर वालों और घर में काम करने वाली बाइयों से महज
एक- दो रुपये के बहस करती हैं और बेचारा गरीब जब हार मन जाता है तो वे अपने पर गर्व महसूस करती हैं.और वहीं दूसरी तरफ जब बड़े शो रूम जाती हैं तो उनको कई हजारों का चूना लगता है वहां वे बहस करना अपने झूठे शान के खिलाफ समझती हैं ....
लोगों की ऐसी संकीर्ण मानसिकता समझ से परे है....

संजय भास्कर said...

behtreen ...

शहरोज़ said...

भाई अच्छा लिख रहे हैं.किस्सा-गोई खूब!!!

दुआ है, जोर कलम और ज्यादा!

अनामिका की सदाये...... said...

kissa majedaar raha...duniya ka ek aur rang...kisse ne ant tak bandhe rakha.

arvind said...

rochak, behtareen..........,dunia me aise logon ki kamee nahi jo doulat peeth par baandhkar le jaana chahte hain.

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

एक उम्दा प्रस्तुति....शुभकामनायें....

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

एक उम्दा प्रस्तुति....शुभकामनायें....

Aacharya Ranjan said...

श्याम जी हमें तो यह लगता है कि इनके घर के सदस्यों पर क्या बीतती होगी , खासकर तब जब कोई परिवार का सदस्य मुसीबत में आता होगा या बीमार पड़ जाता होगा ! - आचार्य रंजन

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बेचारा बदनसीब! सब कुछ होते हुए भी बेकार!