Thursday, April 15, 2010

क्या चिटठा चर्चाएं अंदरुनी विवादों को जन्म दे रही हैं ?

क्या ब्लाग जगत में अशान्ति की जड़ चिट्ठा चर्चाएं हैं? ... क्या चिटठा चर्चाएं अंदरुनी विवादों को जन्म दे रही हैं ? .... इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि ये चर्चाएं किसी--किसी दिन "सिर फ़ुटव्बल" तक की स्थिति पैदा कर सकती हैं .... वो इसलिये, चर्चाओं मे अक्सर ऎसा होता है कि किसी-किसी की पीठ थपथपा दी जाती है और किसी-किसी को नजर अंदाज कर दिया जाता है .... क्या ऎसा संभव है ... हां बिलकुल ... पीठ थपथपा दी यहां तक तो ठीक है अगर किसी को नजर अंदाज कर दिया तो तनाव तो बढना तय है ... तनाव मतलब अंदरुनी विवाद का जन्म ... फ़िर किसी किसी दिन तो तनाव बाहर निकलेगा ही .... जिस दिन बाहर निकलना ... मतलब उठा-पटक... तीन-पांच ... तना-तनी ...आरोप-प्रत्यारोप ..... लट्ठम-लट्ठा .....

.... तो इसका उपाय क्या है कि विवाद हों .... उपाय भी है .... पहले ये तो तय हो कि इन चिट्ठा चर्चाओं मे चिट्ठे शामिल करने का आधार क्या है? ....किन्ही विशिष्ट चिट्ठों की ही चर्चा रोज ... प्रतिदिन ... धडाधड ... क्यों, किसलिये .... क्या इन धडाधड के अलावा और कोई चिट्ठे नहीं हैं जिनकी भी चर्चा की जा सके .... क्या जिनको चर्चा में स्थान मिल रहा है वही लोग सार्थक ब्लागिंग कर रहे हैं ? .... क्या अच्छी व प्रभावशाली पोस्टों की चर्चा नहीं की जा सकती ? .... क्या इन चर्चाओं में पीठ थपथपाने तथा नजर अंदाज करने का भाव परिलक्षित नहीं हो रहा है ? .... क्या अच्छी पोस्टों का हक नहीं है कि उनकी भी चर्चा हो ? .... ऎसा लगता है कि चर्चाओं में सार्थक चर्चा को कम वि्वादों को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जिससे ब्लाग जगत के वातावरण में अशांति फ़ैलती जा रही है .... ऎसा भी देखने में रहा है कि ब्लागवाणी से सीधे लिंक उठाकर चिपका कर "चर्चा" की जा रही है ... यह काम तो एग्रीगेटर भी भलिभांति कर रहे हैं फ़िर ऐसी चर्चा का औचित्य क्या है?

.... अगर ये चर्चाएं बंद हो जाएं या फ़िर दमदार पोस्टों की ही चर्चा की जाये ... तो ये पीठ थपथपाने .... नजर अंदाज करने ... गुटवाजी ... अपना-तुपना ... मनमुटाव ... अंदरुनी खुन्नस ... बगैरह बगैरह का स्वमेव अंत हो जायेगा .... साथ ही साथ यह भी समझ में आने लगेगा कि कौन कितने पानी में है ... "अब आया ऊंठ पहाड के नीचे" इस कहावत का भी चरितार्थ रूप देखने समझने का अवसर मिल जायेगा .... अगर ऎसा होता है तो इसमे बुराई ही क्या है .... यह निर्णय "ब्लागजगत ब्लागरों" के लिये हितकर होगा .... ये जरुर है ऎसा होने से कुछेक लोगों की सेहत पर असर पड सकता है जो फ़रमाईसी कार्यक्रम "बिनाका गीतमाला" में "टापो - टाप" चल रहे हैं !!!

37 comments:

संजय भास्कर said...

mughe to aisa nahi lagata

Suman said...

nice

M VERMA said...

चर्चाओं की अच्छी चर्चा कर दी आपने
विचारणीय

Arvind Mishra said...

चर्चाओं पर भारी है यह चर्चा

मनोज कुमार said...

चर्चाकारों के लिए प्रेरक चर्चा है यह!

Udan Tashtari said...

नज़रिया है..जैसा बना लें.

बी एस पाबला said...

क्या ब्लाग जगत में अशान्ति की जड़ चिट्ठा चर्चाएं हैं?

धर्मोन्मत्त ब्लॉगिंग की बात अलग कर दी जाए तो यह बात काफी हद तक सही है और यह आज की बात नहीं बहुत दूर तक हैं जड़ें इनकी।

बात यदि ब्लॉग के लेखन तक रहे तो भी चर्चा की सार्थकता बनी रहती है। बिगाड़ तब होता है जब ब्लॉगर को लक्ष्य बना कर व्यंग्य बाण छोड़े जाते हैं

कथित चिट्ठाचर्चायों की संख्या व आवृत्ति बढ़ते जाना भी कुछ असहजता उत्पन्न कर रहा है। इसी संदर्भ में कुछ व्यक्ति बेनामी/ अदृश्य रह कर बहुत सी कारस्तानियाँ कर रहे, यह विभिन्न ब्लॉगों पर किए गए गुप्त विश्लेषण का परिणाम बताता है।

शायद कुछ ज़्यादा ही लिख गया :-)

बी एस पाबला

अरुणेश मिश्र said...

विचारणीय ।

जी.के. अवधिया said...

पाबला जी के विचारों से सहमत।

कविता रावत said...

पाबला जी ka kahana prasangik hai...unki vicharon se sahmat....
bevajah आरोप-प्रत्यारोप se kuch haasil nahi hone wala..... yah baat sabhi bloggers ko khud hi soch leni hogi..
Bahut achhe vichar aur sawal uthaya hain aapne....

रश्मि प्रभा... said...

ye to apni soch hai, koi bigad jata hai, koi sahajta se leta hai

sangeeta swarup said...

बहुत विचारणीय मुद्दा ...ब्लोगिंग करने वाले चर्चाओं पर निर्भर ना रहें.....चर्चाओं से कुछ लिंक तो अच्छे मिल जाते हैं...पर हमेशा एक ही ब्लॉग की चर्चा हो सकता है किसी में कुंठा पैदा कर दे....पर ये बात सब पर लागू नहीं होती...हर बात के हमेशा दो पहलू होते हैं....अच्छा और बुरा...आप किस दृष्टि से लेते हैं ये स्वयं पर निर्भर करता है...उम्मीदें हमेशा तनाव को जन्म देती हैं....सिर फुटौवल वही करेंगे जो ज्यादा उम्मीद करते हैं....

वैसे आपकी इस पोस्ट में काफी दम है....चर्चाकारों के लिए ...

RAJNISH PARIHAR said...

[1]मुझे तो आज तक इन चर्चाओं का गणित समझ में नहीं आया.!चिटठा चर्चा के नाम पर उन्ही गिनेचुने लोगों को दोहराया जाता है!हर जगह उन्ही ब्लोगों को उपस्थित भी पता हूँ!आखिर इन चर्चाओं में शामिल होने की शर्त क्या है?[2]पाबला जी के विचारों से सहमत।

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
arvind said...

main aapke vicaaron se sahamat hun lekin damadaar post ki pehchan ka paimaanaa kya hoga?, itne saare posto me se damadaar chunana sambhav nahi hai.sthiti to vaisi ban hi rahi hai jaisa aapne likha hai, lekin samaadhan kya hai?...han chittha carcha kamse se kam sabhi poston ko ek platform par to laa hi rahi hai.

वन्दना said...

प्रश्न उत्तम है मगर उत्तर नदारद है………………कोई भी बिल्ली के गले मे घंटी बाँधने को तैयार नही होगा………………यहाँ तो जिसका बोलबाला उसका ही राज होता है कौन किसी की सुनता है ………जब साधारण बातों के गलत मतलब निकाल लिये जाते है तो ये तो बात ही अलग है।

श्याम कोरी 'उदय' said...

अरविंद जी
अच्छी पोस्ट से तात्पर्य उस पोस्ट से है जो पोस्ट सकारात्मक, रचनात्मक, प्रेरणास्पद भाव लिये हुये हो, जो शिक्षाप्रद हो ... चर्चा में फ़ालतु की गचर-पचर का कोई महत्व नहीं है !!!

बी एस पाबला said...

अरविन्द जी की इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि इतनी सारी पोस्टों में दमदार चुनना संभव नहीं है
यह इकलौते व्यक्ति के लिए श्रमसाध्य हो सकता है।

लेकिन जहाँ 20-25-30 समर्पित व्यक्तियों का समूह चिट्ठाचर्चा करता हो वहाँ यह कतई मुश्किल नहीं है।

बी एस पाबला

Suresh Chiplunkar said...

@ पाबला जी - कृपया "धर्मोन्मत्त ब्लॉगिंग" का अर्थ स्पष्ट करें… :)
@ श्याम भाई - "रचनात्मक" और "प्रेरणास्पद" की परिभाषा, चर्चाकार to चर्चाकार बदल भी तो सकती है :)

चर्चाकार की व्यक्तिगत पसन्दगी और नापसन्दगी भी तो एक पैमाना है, और आज तक की दसियों चर्चाओं में यही होता आया है। जब एक ही चर्चा होती थी तब भी नहीं पढ़ते थे, अब दसियों होती हैं तब भी नहीं पढ़ते… क्योंकि अधिकतर चर्चाओं में से हमारा चिठ्ठा तो गायब ही रहता है… क्योंकि हम कभी "रचनात्मक"(?) लिखते ही नहीं… सिर्फ़ विध्वंसात्मक लिखते हैं (हा हा हा हा हा हा)

डॉ टी एस दराल said...

आपकी बात से सहमत हूँ। खाली पोस्ट का लिंक देने से कोई कोई फायदा नहीं । ये तो वैसे ही उपलब्ध होता है। यदि सार्थक , विश्लेषात्मक charcha की जाये तो कोई बात है।

डॉ टी एस दराल said...

आपकी बात से सहमत हूँ। खाली पोस्ट का लिंक देने से कोई कोई फायदा नहीं । ये तो वैसे ही उपलब्ध होता है। यदि सार्थक , विश्लेषात्मक charcha की जाये तो कोई बात है।

अजय कुमार झा said...

ओह सुबह जब पोस्ट को पढा देखा था , तो सोचा कि सभी चर्चाकार आपके प्रश्नों को पढने के बाद छोटी बडी ही सही , अपनी अपनी राय तो रखेंगे ही । मगर अब देखा तो निराशा ही हुई । खैर चूंकि आपने चर्चाकारों के लिए मंथन भरी पोस्ट लिखी है तो इतना दायित्व तो बनता ही है कि पिछले कुछ समय में चर्चा करने वालों , हालांकि मैं अब तक किसी भी रूप में चिट्ठाचर्चा नहीं कर पाया हूं , मगर फ़िर भी , अपना नाम गिने जाने के कारण कम से कम अपना मत तो रख ही दूं । पहले भी ये बात बहुत बार कह चुका हूं कि जब तक चिट्ठाचर्चा के लिए यहां मौजूद ब्लोग्गर्स को ही ये जिम्मा मिलता रहेगा तब तक उन पर पक्षपाती होने , पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने जैसे आरोप लगते ही रहेंगे । तो फ़िर किया क्या जाए ..बाहर से कोई ऐसा चर्चाकार लाया जाए, उसे वेतन देकर ये काम सौंप दिया जाए , गडबड करे तो नया तलाश लिया जाए। और सच कहूं तो कुछ ऐसे ही आरोपों ने नई चिट्ठाचर्चाओं की उत्पत्ति कर दी थी , देखता हूं तो आज उन पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं

अब बात करते हैं सार्थक पोस्टों की चर्चा की तो , ये तय कौन करेगा कि आखिर पोस्ट कौन सी निरर्थक है । मेरी नज़र में तो स्माईली भर की टिप्पणी भी निरर्थक नहीं है तो ऐसे में कुछ शब्दों या महज चित्र या कुछ और से सज्जित पोस्ट को कैसे निरर्थक मान लूं । इसी कोशिश में , लगभग दस एग्रीगेटर्स , जाने कितनी ही वेबसाईटस और अब तो बज भी उठा के लिंक्स देकर सबको बताया दिखाया । ये भी कह दिया कि भाई , मैं इनके चयन का कोई पैमाना नहीं बता सकता , क्योंकि है ही नहीं कोई पैमाना , बस ये समझें कि मैंने ये पोस्टें देखी भर हैं । मुझे नहीं लगता कि चर्चा में पोस्टों का शामिल होना किसी भी रूप में पोस्ट की गुणवत्ता से संबंधित होता है । सच कहूं तो मुझे तो लगता है कि सभी लोग लिंक्स पकड के उन पोस्टों तक जाते भी नहीं हैं असलियत में , जो पसंद आई उन्हें चटका कर पहुंचते हैं वहां । पहले ये बातें चोट पहुंचाती थीं और हम फ़ट से टंकी पर चढ के एलान कर दिया करते थे कि जाओ अब हम नहीं करते । अब मुस्कुराता हूं और सोचता हूं कि यार कल क्या नया किया जाए कि सब कहें .....वाह झाजी ..आनंद आ गया ..अच्छी मेहनत की आपने....बस यही उद्देश्य होता है । आपने इत्ती लंबी टिप्पणी करवा दी देखिए । सब चर्चाकारों के बदले मैं ही आ गया टीपने । शुभकामनाएं , संवाद से निखार आता है ...अभिव्यक्ति में

अजय कुमार झा

श्याम कोरी 'उदय' said...

सुरेश जी
"रचनात्मक" और "प्रेरणास्पद" की परिभाषा ... क्यों मजाक कर रहे हो,आप बुद्धिमान हैं इसमे कोई दो राय नहीं है ।
... विध्वंसात्मक लेख/अभिव्यक्ति भी सकारात्मक व शिक्षाप्रद हो सकती है इसमे भी दो राय नहीं है।
... चर्चाकार एक समीक्षक होता है अगर वह चापलूसी व पंदौली देने की भावना न रखे तो साहित्य की द्रष्टिकोण से सकारात्मक समीक्षा मानी जायेगी, अन्यथा ... !!!

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 17.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

श्यामजी, सबसे पहले तो मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और अपनी महत्वपूर्ण टिपण्णी छोड़ने के लिए शुक्रिया ! आपका यह लेख पढ़कर अच्छा भी लगा और विचलित भी हुआ । आपके ब्लॉग का नाम ही कडुवा सच है तो ज़ाहिर है कि आप सच, चाहे वो अप्रिय ही क्यूँ न हो, बोलने से कतराते नहीं हैं । इस बार भी आपने एक विवादस्पद विषय पर लिख दिया है । ब्लॉग जगत में मेरी उम्र बहुत कम है । इसलिए ज्यादा जानता भी नहीं हूँ । और कुछ उट-पटांग न कह जाऊं इस बात की फ़िक्र है । यदि आप जो लिखे हैं वह सच है वाकई यह कोई अच्छी बात नहीं है । किसी भी चर्चा में शामिल होने का मापदंड उस पोस्ट कि अच्छाई होनी चाहिए ना कि आपसी सम्बन्ध, रंजिश या इर्ष्या । पर यह तय करना भी तो मुश्किल है कि कौन सा पोस्ट अच्छा है, और कौन सा नहीं । चर्चा ज़रूरी भी है, और अच्छी भी यदि सकारात्मक तरीके से किया जाये । कोई भी काम अगर गलत तरीके से किया जाये तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है । पर किसीने कोई काम गलत तरीके से किया है, इसलिए हर कोई वो काम करना ही छोड़ दे ये बात भी कुछ सही नहीं लग रही है । इसका एक हल ये हो सकता है कि अच्छे ब्लॉग ढूँढने के लिए हम केवल चर्चाओं का सहारा न लें बल्कि खुद भी कुछ इधर-उधर देखें । और मैं तो यही कहूँगा कि अच्छी रचनाएँ कोई चर्चा की मोहताज नहीं होती हैं । यदि मेरी रचनाएँ अच्छी हैं, तो मुझे यकीन है कि लोग उसे ज़रूर पसंद करेंगे । शुभकामनायें !

डा० अमर कुमार said...


यदि कोई स्वाँतः सुखाय लिख रहा है, तो उसे एकला चोलो रे की नीति अपनानी चाहिये !
महापुरुषों के कार्यों की सराहना, उनके जाने के पश्चात ही होती है, सो अपने को महापुरुष मान कर ब्लॉगिंग करते रहिये ।
कोई भी पोस्ट अच्छी या बुरी नहीं होती, नज़रिया उसे अच्छा या बुरा साबित करता है । चर्चाकार का नज़रिया एकाँगी सही, पर आप उसके नज़रिये को चुनौती कैसे दे सकते हैं, क्योंकि यहाँ कोई भी एक दूसरे का वेतनभोगी नहीं है ।
मेरी कई शुरुआती पोस्ट आज तक बिना टिप्पणी के पड़ी हैं, तो मैं क्या ख़त्म हो गया ?
ब्लॉगिंग आरँभ करने के दो वर्षों के उपराँत कुछ लोगों ने मेरा सँज्ञान लिया, तो क्या मैं इसके पहले अस्तित्व में था ही नहीं ?
यह बेकार का मुद्दा है, शामिल किये जाने और न किये जाने पर कुछ ख़ास लोग ही नाराज़ दिखते हैं, यह उनके अहम का मुद्दा है ।




पुनःश्च :
मॉडरेशन से आप स्वयँ ही अपने को एक सुविधापूर्ण स्थिति में सुरक्षित रखे हुये हैं, इसका क्या ?
फिर भी मैं टिप्पणी एक अनिश्चय की स्थिति में प्रेषित कर रहा हूँ कि नहीं ?
जरा विचार करें प्रमाद ही विवाद की जड़ हुआ करती है ।

श्याम कोरी 'उदय' said...

डा.अमर कुमार जी
सर्वप्रथम तो मैं आपकी तरह महापुरुष नहीं हूं जो खुद को महापुरुष मान लूं जैसा आपने कहा - "... सो अपने को महापुरुष मान कर ब्लॉगिंग करते रहिये ...." !!!!!
... ये बिलकुल सही है कि कोई एक-दूसरे का वेतनभोगी नहीं है पर चर्चा में "नजरिया" परिलक्षित होता है ... अगर चर्चा का नजरिया चापलूसी व पंदौली देने का हो, जो स्पष्ट रूप से दिखाई दे, तब आप क्या कहेंगे ... !!!
....आपका कहना है कि - "...यह बेकार का मुद्दा है ..." तब तो संभवत: ब्लागिंग पर भी प्रश्न चिन्ह उठ रहा है ... !!!
... अब बात करते हैं "मॉडरेशन" पर ... यह इसलिये आवश्यक है कि मै चौबीसों घंटे नेट पर तो बैठा हुआ नहीं हूं जो यह देख सकूं कि किस महाशय ने क्या कहा .... और मुझे क्या जवाब देना चाहिये .... अगर कोई "अंड-संड" लिख कर चला जाये और मैं जवाब न दूं तो लोग तो यही समझेंगे कि जो बात लोग "अंड-संड" बोल रहे हैं वही सही है तब मैं किस किस को स्पष्ट करते रहूंगा .... जरा सोचो जब कोई आपकी अनुपस्थिति में आपके घर पे पत्थर फ़ेंक के चला जाये तब आप क्या करेंगे ... किसी से डर कर माडरेसन नहीं लगाया हूं ... जब लिखने की हिम्मत करता हूं तो जवाब देने का भी दमखम रखता हूं ... जय हिंद !!!!

अविनाश वाचस्पति said...

लो जी श्‍याम भाई मैं भी आ गया हूं। कड़वे सच को मीठा बनाने के लिए जबकि मुझे मधुमेह है। कड़वा ही रुचिकर और स्‍वास्‍थ्‍यतर्द्धक है मेरे लिए। परन्‍तु अगर यह चिट्ठाकार ऐसी ऐसी चिट्ठाचर्चाएं नहीं करते तो आपको इतनी सार्थक और उपयोगी पोस्‍ट लिखने की प्रेरणा कैसे मिलती और मिलती भी तो तब यह पोस्‍ट उतनी सार्थक नहीं होती। इससे यह साबित होता है कि जो हो रहा है, वो होना ही है, क्‍योंकि हर होने से, प्रत्‍येक नेक और अनेक होना और होनी जुड़े हुए हैं।
मेरे विचार से मेरा इतना लिखना ही इस सब होने और करने को समग्रता में समझने के लिए पर्याप्‍त है। वैसे मैं चाहता तो इस पर भी एक पोस्‍ट लिख सकता था परन्‍तु टिप्‍पणी लिखकर इसलिए संतोष कर रहा हूं क्‍योंकि और विषय बहुत हैं अर्थक और बेअर्थक लिखने के लिए। इसलिए विवश हूं परन्‍तु आपने लिखा, सबका ध्‍यान दिलाया इसके लिए आभारी हूं। सबकी तरफ से। जो चर्चा कर रहे हैं, जिनकी चर्चा हो रही है और जिनकी चर्चा नहीं हो रही है उनकी तरफ से भी।

डा० अमर कुमार said...


मेरे ( बकौल आपके प्रोफ़ाइल )संघर्षरत मित्र, आपके महापुरुष न होने की स्वीकारोक्ति का मैं कायल हुआ ।
गोकि मुझमें वक्रोक्ति लिखने की ताब नहीं है, न ही पोएट या राइटर होने का दँभ रखता हूँ ।
पर, यह भी एक कड़वा सच है कि, दुर्भाग्यवश इस पोस्ट के प्रकाशित होने के फौरन बाद ही इस पोस्ट की टिप्पणियाँ प्रार्थी ने सब्सक्राइब कर ली थीं । क्या मुझे स्री रज़नीश परिहार की टिप्पणी के बाद लगे Comment deleted / This post has been removed by a blog administrator. / April 16, 2010 3:45 AM के ठप्पे के कड़वे सच को सार्वज़निक करने की आवश्यकता है ?
विदित हो कि, मैं अपनी टिप्पणी पर कायम हूँ ।

PD said...

सबसे पहले तो हिंदी में लोगों को और मैच्योर बनना पड़ेगा और इन सब बेतुकी बातों से बाहर निकलना पड़ेगा.. यहाँ कई चर्चा मंच बने हुए हैं.. कुछ पर मेरी चर्चा होती है और कुछ पर नहीं होती है.. मैं तो अब किसी भी चर्चा मंच पर आना जाना भी कम कर दिया हूँ.. और मुझे तो नहीं लगता है कि मेरे पाठकों कि संख्या कम हुई हो!! आप माने या ना माने मगर यह भी एक कड़वा सच ही है..

अखिल कुमार said...

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श्याम कोरी 'उदय' said...

डा.अमर कुमार जी
"...यह भी एक कड़वा सच है कि, दुर्भाग्यवश इस पोस्ट के प्रकाशित होने के फौरन बाद ही इस पोस्ट की टिप्पणियाँ प्रार्थी ने सब्सक्राइब कर ली थीं ..." ... यह तो बहुत खुशी की बात है, शायद टिप्पणियों पर शोध संभव हो ... !! ...एक बात यहां स्पष्ट करना चाहूंगा वह "डिलिटेड टिप्पणी" इस पोस्ट के समर्थन में थी तथा सकारात्मक भी थी (मेरे पास सुरक्षित पेस्ट कर रखी गई है) लेकिन फ़िर भी मैंने उसे "डिलिट" करना उचित समझा क्योंकि वह बेनामी टिप्पणी थी !!
... शौक से न सिर्फ़ उस टिप्पणी को वरन इस ब्लाग की सभी टिप्पणियों को आप सार्वजनिक कर सकते हैं ... मैं तो कहूंगा की इस पोस्ट पर आई सभी टिप्पणियों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये, जिसके नतीजे ब्लागजगत के हित में ही होगें !!

अखिल कुमार said...

एक बात जो खूल कर कोई कहना नहीं चाह रहा वह है अनूप शुक्ल वाली चिट्टाचर्चा पर होने वाला सरकस
अपने चहेतों के ब्लोगो को बार बार आगे लाना,नए लोगों पर उपकार जैसा करते हुये उनके ब्लोग का नाम देना,अपनी खुन्नस उतारते हुये विचारो से सहमत न होने वाले ब्लोगरो का मजाक उदाना,जो चीज अपने ब्लोग पर कही जा सकती है उसे किसी बहाने से चिट्टाचर्चा पर ला पटकना,भारतीया भासायों वाले ब्लोग की चर्चा करेन्गे कहते हुये किसी की बात न करना,एक लाईना के बहाने छीटाकशी करना, ये सब क्या अच्चे दिमाग वालो का काम है?
यही काम कोई दूसरा करे तो इनकी हवा खिसक रही है,बहाना बनाया जा रहा है कि ये तो सिर्फ कोपी पेस्त है।ये कभ्ही नही मानेगे कि लिन्क तो लिन्क है जिसे कैसे भी दिया जाये इनके पेट में क्यों दर्द होता है।कहने वाले कह जाते हैं कि सभी ब्लोग तो ब्लोगवानी और चिट्टाजगत पर मिल जाते हैं फिर यहां ही क्यों ब्लोग लिन्क देना?तो फिर आपति करने वाले ब्लोगिन्ग का बेसिक क्यों भूल जाते हैं कि हरेक को छूत है कि वह अपने ब्लोग पर क्या लिखे
ललित शर्मा जी की धुआंदार चर्चा से परेशान हो कर कुछ लोगों ने ऐसा खेल खेला कि अनिल पुसादकर भी खलनायक बन गये।मतलब शिकार करने वालो ने एक वार मे दो को निपटा दिया।बहाना चाहे जो भी बनाया हो।
इससे पहले भी चिट्टाचर्चा डोट कोम वाले मामले में इनकी असी हवा खिसकी कि आदार्नीय पाबला जी पर चारो तरफ़ से हमला बोल दिया गया।वो तो समझदार थे जो तगडा जवाब दिया और सबकी बोल्ती बंद हो गयी
तकलीफ सिर्फ अनूप शुक्ल वाले चिट्टाचर्चा से होती है,क्योकि तकलीफ अनूप शुक्ला को हो चुकी होती है

बेचैन आत्मा said...

अच्छी चर्चा।

ठहरे पानी में एक कंकड़ फेंकने भर की देर थी लहरें उठने लगीं.........
..बात निकली है तो दूर तक जाएगी।

वैसे एक सच यह भी है कि अब ब्लाग चर्चा भी बहुत से लोग करने लगे। सार्थक चर्चा न हुई तो लोग खुद ही नहीं पढ़ेगे।

sudha prajapti said...

ललित शर्मा जी की धुआंदार चर्चा से परेशान हो कर कुछ लोगों ने ऐसा खेल खेला कि अनिल पुसादकर भी खलनायक बन गये।मतलब शिकार करने वालो ने एक वार मे दो को निपटा दिया।

आदार्नीय पाबला जी पर चारो तरफ़ से हमला बोल दिया गया।

इतना घिनौना खेल!-ब्लाग जगत को समृध्द करने की तथा हिंदी को आगे ले जाने की दुहाई देने वालो के द्वारा।

दिगम्बर नासवा said...

Chittha charchaaon ki lajawaab charcha kar di aapne yahaan .... aapka andaaz bahut pasand aaya ...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कर्मयोगियों को क्या चर्चाओं से.