Saturday, October 16, 2010

मैं रावण हूँ ... अमर हूँ ... हा हा हा ... !!

मैं रावण हूँ ... मरा नहीं ... कौन मार सकता है मुझे ... मैं अमर हूँ ... याद है मुझे, पर शायद आप लोग भूल रहे हो कि मैंने घोर-अघोर तप से एक नहीं अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थी ... क्या तुम भूल रहे हो कि वह मैं ही हूँ जिसने सिर्फ देवताओं को पराजित किया था वरन समस्त ग्रहों के स्वामियों को भी अपना दास बनाया था ... हा हा हा ... आप लोग जल्दी ही भूल जाते हो, पर मुझे सब याद है ... मेरी अमरत्व शक्ति कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं थी, याद है या सब भूल गए ... साक्षात राम को भी मुझे हराने के लिए ऐडी-चोटी का दम लगाना पडा था वो तो विभीषण था जो घर का भेदी निकल गया जिसने मेरी मृत्यु का राज बता दिया, नहीं तो राम को भी पराजित कर देता ... खैर छोडो अब पुरानी बातों में कुछ नहीं रक्खा है, जाने दो ...

... हाँ पर एक बात जरुर याद रखना कि मैं अब तक मरा नहीं हूँ क्योंकि मैं अमर हूँ ... अमर हूँ तो अमर हूँ ... चलो आज मैं तुम्हें मेरी अमरता का असल राज बताता हूँ जो बहुत ही गोपनीय है ... गोपनीय इसलिए कि उस राज को सिर्फ मैं जानता हूँ नहीं तो विभीषण जैसे गद्दार ... खैर जाने दो, आज मैं उस राज को इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आज सब जान कर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे क्योंकि इस दौरान मैंने इस अमरत्व को इतना अमर बना दिया है कि जब तक यह संसार रहेगा तब तक, अब कोई मुझे मारने की चेष्ठा भी नहीं कर पायेगा ... मारना तो बहुत दूर की बात है ...

... तो चलो सुनो आज वह राज ... मैंने जिस अमरत्व को नाभी में छिपा कर रखा था वह तो मेरे शरीर को अमर बना कर रखे हुए था अर्थात मेरा शरीर नश्वर था किन्तु विभीषण की मेहरवानी से ... चलो जाने दो वह तो आप सभी जानते हैं, नहीं जानते हैं तो वह राज नहीं जानते जो मैं अब तुम्हें सुना रहा हूँ ... मैंने एक बार घोर तप कर "ब्रम्हा-विष्णु-महेश" तीनों से संयुक्तरूप से यह वरदान प्राप्त किया था कि यदि विशेष परिस्थितियों में मुझे शरीर त्यागना भी पड़े तो मेरी आत्मा अमर रहेगी, और जिस समय मैं अर्थात साक्षात रावण शरीर त्यागूंगा ठीक उस समय सम्पूर्ण संसार में जितनी भी राक्षस प्रवृत्ति की आत्माएं अर्थात मांस-मदिरा का सेवन कर रही आत्माएं जीवित होंगी उन सभी आत्माओं में मेरी आत्मा समाहित होकर जीवित रहेगी अर्थात मैं मरने के बाद भी अमर रहूँगा ... किन्तु यह वरदान देते समय तीनों देवताओं ने मुझसे यह वचन ले लिया था कि मैं अमर तो रहूँगा, पर मेरी संपूर्ण शक्तियां शरीर के साथ नष्ट हो जायेंगी ... उस समय मुझे यह घमंड था कि मुझे तो कोई मार ही नहीं सकता है इसलिए मैंने वचन दे दिया ...

... लेकिन मैं आज सोचता हूँ कि मैंने वचन देकर बहुत बड़ी भूल की थी वरना आज मैं ... खैर जाने दो, पर आज भी मैं खुश हूँ बहुत खुश हूँ ... मेरी वो शक्तियां नहीं हैं तो क्या हुआ ! पर मैं तो आज अमर हूँ और खूब मजे ले रहा हूँ ... ऐसे ऐसे मजे ले रहा हूँ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी ... मांस-मदिरा का सेवन कर रही जीवित आत्माओं के शरीर व मन में जीवत रहकर मैं ... मांस - मदिरा के मजे, अपहरण - बलात्कार के मौजे, लूट - डकैती के कारनामे, कालाबाजारी - भ्रष्टाचारी के फार्मूले, बम - धमाके, ह्त्या - मारकाट ये सब मेरे ही कारनामे हैं ... हा हा हा ... अमर भी किसी एक-दो शरीर में नहीं, वरन संपूर्ण संसार में गिने-चुने कुछेक प्राणियों को छोड़ कर शेष सभी प्राणियों में मैं ज़िंदा हूँ ... हा हा हा ... आज सम्पूर्ण संसार में मेरा ही राज है ... मैं ही राज कर रहा हूँ, मजे कर रहा हूँ, मौज कर रहा हूँ ... क्यों, क्योंकि मैं रावण हूँ ... रावण ... मुझे अब कोई नहीं मार सकता क्योंकि अब मैं तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!

26 comments:

वन्दना said...

गज़ब की प्रस्तुति ……॥ऐसा लगा जैसे साक्षात रावण ही ये कह रहा हो।

संजय भास्कर said...

अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!
अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!
अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!
अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!
अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!

सुंदर प्रस्तुति....
आपको
दशहरा पर शुभकामनाएँ ..

संजय भास्कर said...

@ आदरणीय'उदय'जी
आपकी लेखनी को नमन बधाई

M VERMA said...

रावण किसी से डरता नहीं है
मारो, भ्रम पाल लो मारने का
पर रावण फिर भी मरता नहीं है

DEEPAK BABA said...

आपने रावन की अमरता सिद्ध कर दी.
साधुवाद आपके लेखन को.




“दीपक बाबा की बक बक”
आज अमृतयुक्त नाभि न भेदो

सूर्यकान्त गुप्ता said...

आज हम सभी रावण की ही भूमिका निभा रहे हैं। बढ़िया प्रस्तुति।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक रावण हम सबके अन्दर छिपा है।

डॉ टी एस दराल said...

रावण आज कई रूपों में जिन्दा है । इंतजार है उस दिन का , जब हम अपने ही पैदा किये रावणों को मार पाएंगे ।

"अभियान भारतीय" said...

सार्थक एवं प्रभावी पोस्ट के साथ ही दशहरा के पवन पर्व की हार्दिक बधाई स्वीकार करें ........

राज भाटिय़ा said...

जिस दिन यह रावण मरे गा उस दिन यह धरती स्वर्ग समान हो जायेगी,लेकिन कोन मारेगा अपने आप को? अपने अंदर के रावण को??

अशोक बजाज said...

न नत्था मरेगा ,ना ...........!

काफी ज्ञानवर्धक पोस्ट . धन्यवाद !!

विजयादशमी पर्व की बधाई !!!

मनोज कुमार said...

मुझे अब कोई नहीं मार सकता क्योंकि अब मैं तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... अमर हूँ ...
सहमत हूं आपसे। हम सब के अंदर रावण ज़िन्दा है। इस पर विजय पाना ही सच्ची विजय।
हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें!
तभी हम सही अर्थों में विजया दशमी मनाने के हक़दार होंगे।

Sunil Kumar said...

रावण ज़िन्दा, हम सबके अन्दर छिपा है
दशहरा पर शुभकामनाएँ

गिरीश बिल्लोरे said...

vo कब मरेगा राम जाने

Apanatva said...

bahut acchee abhivykti...........

happy dashahra to ypu and family.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रामराज्य का प्रणेता महापंडित तो अमर रहेगा ही।

ललित शर्मा said...


रावणी प्रवृति अमर है
विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

दशहरा में चलें गाँव की ओर-प्यासा पनघट

गिरीश बिल्लोरे said...


विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

S.M.HABIB said...

सच तो यह है की रावन ने "अमृत घट" अपनी नाभी से हटाकर हम सभी की नाभी में छिपा दिया है, और यह तय है कि हमें स्वयं अपने भीतर जाकर उस अमृत घट को सुखा कर रावन का वध करना होगा तभी रावन के अमरता के वरदान का निवारण संभव हो सकेगा. उदय भाई, सटीक, बेहतरीन और सामयिक अभिव्यक्ति के लिए आपको साधुवाद. साथ ही आपको एवं आपके परिवार, इष्ट मित्रो सहित समस्त सम्माननीय पाठकों को विजयोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं.
यह भी पढ़ें: "रावन रहित हो हर ह्रदय" http://smhabib1408.blogspot.com/

Chinmayee said...

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं

_______________
मेरा जन्मदिवस - २ (My Birthday II)

girish pankaj said...

sundar magar dhardaar abhivyakti. isi tarah likh kar sahity ko smriddha karate raho. shubhkamanaye..

babanpandey said...

उदय जी ...लगता है ....रावन अमर ही रहेगा ...अगर रावन मर गया ....तो हमलोग क्या करेगे ..शानदार प्रस्तुति

Mishra Pankaj said...

as talk with you -
rago.pankajit.com
anand.pankajit.com

अशोक बजाज said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति .
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं .

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
बेटी .......प्यारी सी धुन

manohar saraf said...

RAVAN BAHUT GYANI V VIDHDVAN THA.Ravan ki bahan ShurpanKhan ne Laxaman ke samane parinay prastav rakha tha jo lxman ne enkar kar ke Shurpankhan ki nak kat di thi,jisase Ravan apmanit hu usne badala lene ke liye Sita ka apharan kiya pahale galati RAM Ki or se hue thi.Ravan ne Sita ko samman se rakha tha, usaki echchh ke bina chuaa tak nahin. Ravan ko burae se jod kar badanam kiya gaya. Ravan men koe Burae nahin thi.Har bat ke do pahlu hote hain Achchhae or Burae, Jo hamesh bani jahegi.