Thursday, July 1, 2010

आग का शोला ...

है पवित्र मन उसका
तन है रेशमी कोमल
दिलों में शंख बजते हैं
हंसे तो फ़ूल झडते हैं !

नहीं बेचा कभी मन
न किया ईमान का सौदा
है हालात से मजबूर
खडी बाजार में है वो !

उसने कभी हंसकर
सौदा, किया नहीं तन का
पर है गर्व उसको
कि - वो तन बेचती है !

करे तो क्या करे ?
रुह को कचोटती है, मन को नौंचती है
बदन को -
आग का शोला बनाकर बेचती है !!

14 comments:

राज भाटिय़ा said...

दुनिया मै कोई भी मजबुरी ऎसी नही की जो नारी को उस का तन बेचने पर मजबूर करे....

वन्दना said...

bahut hi gahan abhivyakti.

महेन्द्र मिश्र said...

ऐसी नारियों की कुछ तो मजबूरी होती होगी... बेहतरीन रचना... बेहद भावपूर्ण ....

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

गहरी अभिव्‍यक्ति, धन्‍यवाद.

मै नीर भरी said...

usake badan ka hi toh soshan hota hai .. gaharee samvedana

girish pankaj said...

dheere-dheere aur nikharataa jaraha hai chintan.. yah kavitaa bhi theek hai.

सत्य गौतम said...

जय भीम क्या आपने अम्बेडकर साहित्य पढ़ा है

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

जीवन का कटु सत्य।
………….
दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

kshama said...

Bhatiya ji se sahmat hun.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुंदर

दिगम्बर नासवा said...

झंझोड़ती है आपकी यह रचना ... गहरा आक्रोश ...

दिगम्बर नासवा said...

झंझोड़ती है आपकी यह रचना ... गहरा आक्रोश ...

संजय भास्कर said...

शोला बनाकर बेचती है !
गहरी अभिव्‍यक्ति........ धन्‍यवाद.

sanjay said...

'Sheela' bankar bikti hai naari,
paisa ban baitha hai bada anari.
shabo roj hoti hai munni badnaam,
fir bhi dekh rahi dunia dekho sari.

(savji chaudhari- 99980 43238, A-men media & creation, A'bad.)