Sunday, March 27, 2011

पथरीली राहें ...

मूंड खुजाते बैठ गया था
देख सफ़र की, पथरीली राहें
दरख़्त तले की शीतल छाया
लग रही थी, तपती मुझको !

फिर, चलना था, और
आगे बढ़ना था मुझको
राहें हों पथरीली
या तपती धरती हो
मेरी मंजल तक तो, चलना था मुझको !

कुछ पल सहमा, सहम रहा था
देख सुलगती, पथरीली राहें
फिर हौसले को, मैंने
सोते, सोते से झंकझोर जगाया !

पानी के छींटे, मारे माथे पर अपने
कदम उठाये, रखे धरा पर
पकड़ हौसला, और कदमों को
धीरे धीरे, चल पडा मैं !

पथरीली, तपती, सुलगती राहों पर
कदम, हौसले, धीरे धीरे
संग संग मेरे चल रहे थे
जीवन, और मंजिल की ओर !!

5 comments:

akhtar khan akela said...

kyaa baat he uday bhaai aajkl to mmmblogistan ko apni rchnaaon se lune men lge hm mubark ho bhtrin rchnna he . akhtar khan akela kota rajsthan

कुश्वंश said...

अच्छी कविताये आपके ब्लोग्स पर , संवेदनशील बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

यह हौसला कायम रहे।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

प्रेरणा देते हुये शब्द...

बालकिशन said...

bahot badiya kavita hai