Saturday, June 25, 2011

चौखट ...

मैं क्या हूँ, कुछ भी नहीं हूँ
मगर तू है, बहुत कुछ है !
फर्क गर है, दोनों में
जमीं और आसमां सा है !

तू डरता है, बुलाने से
मैं आने में, सहमता हूँ !
आने को, तो मैं चला आता
बिना बुलाये, महफ़िल में !

सच ! नहीं डरता मैं आने से
तेरी, ऊंची हवेली में !

चिंता है, तो बस इतनी
कहीं सिर फूट जाए
तेरी चौखट से टकरा कर !!
...
सच ! नहीं डरता मैं आने से, तेरी ऊंची हवेली में
कहीं सिर फूट जाए, तेरी चौखट से टकरा कर !
...

3 comments:

मनोज कुमार said...

सच ! नहीं डरता मैं आने से, तेरी ऊंची हवेली में
कहीं सिर फूट न जाए, तेरी चौखट से टकरा कर !
दिल को छूती पंक्तियां।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

दिल के करीब से गुजरती हुई रचना।

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विलुप्‍त हो जाएगा इंसान?
ब्‍लॉग-मैन हैं पाबला जी...

प्रवीण पाण्डेय said...

यह डर मन में बनाये रहना चाहिये।