Thursday, December 2, 2010

मैं दलाल नहीं हूँ !

हाँ भई, मैं खबरीलाल ही हूँ
नहीं, मैं दलाल नहीं हूँ
और ही बिचौलिया हूँ
हाँ, अगर आप चाहें तो
मुझे एक गुड मैनेजर
एक्सपर्ट, या को-आर्डीनेटर
कह, या सोच सकते हैं !

हाँ, अब मैं भी लिखते-पढ़ते
झूठ-सच बयां करते करते
खिलाडियों का खिलाड़ी हो गया हूँ
कब, किसको पटकनी देना
और किसको पंदौली दे उठाना है
इशारों ही इशारों में समझ कर
शह-मात की चालें चल रहा हूँ !

क्यों ..... क्योंकि मैं भी
कभी कभी मंत्रियों-अफसरों
और उद्योगपतियों के साथ
उठ-बैठ सांठ-गांठ कर
छोटे-मोटे काम बेख़ौफ़
निपटा-सुलझा-उलझा रहा हूँ
और मैनेजमेंट गुरु बन गया हूँ !

भला इसमें बुराई ही क्या है
नेता-अफसर-मंत्री सभी तो
यही सब कुछ कर रहे हैं
छोटे-बड़ों को मैनेज कर रहे हैं
मुझे भी लगा, मौक़ा मिला
मैं भी कूद पडा मैदान में
अब गुरुओं का गुरु बन गया हूँ !!!

19 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गुरु-घंटालों का ही जमाना है..

संजय भास्कर said...

आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

संजय भास्कर said...

Guru ji,
namaskar
hume bhi apni sharan me le lo

संजय भास्कर said...

Guru ji,
namaskar
hume bhi apni sharan me le lo
अब गुरुओं का गुरु बन गया हूँ !!!

M VERMA said...

जय हो मैनेजमेंट गुरू की

deepak saini said...

मेनेजमेंट गुरू, वाह क्या बात है
दलालो का नया नाम

arvind said...

shandaar our jaandaar lekhan...bahut badhiya likha hai...system par teekhaa kataks.

'उदय' said...

@ संजय भास्कर
... saare guru raajdhaanee men viraaje huye hain ... !!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बढ़िया है ..सभी मैनेज कर रहे हैं ...अच्छा व्यंग

वन्दना said...

ये भी खूब रही…………बढिया व्यंग्य्।

प्रवीण पाण्डेय said...

शानदार व जानदार प्रस्तुति।

वाणी गीत said...

बहुत बढ़िया !

Amrita Tanmay said...

बहुत सुन्दर ,करारा व्यंग .....

kshama said...

क्यों ..... क्योंकि मैं भी
कभी कभी मंत्रियों-अफसरों
और उद्योगपतियों के साथ
उठ-बैठ व सांठ-गांठ कर
छोटे-मोटे काम बेख़ौफ़
निपटा-सुलझा-उलझा रहा हूँ
और मैनेजमेंट गुरु बन गया हूँ !
Mubarak..mubarak...ha,ha! Warna aur kya kahun??

honesty project democracy said...

शानदार प्रस्तुती.....और एकबात उदय जी ऐसे गुरु घंटाल तो हर गांव हर शहर में मिल जायेंगे आपको इस तरह का गुरु बनना अब जीने की मजबूरी बनती जा रही है ....हर कोई अपने बुद्धि का दुरूपयोग करने को ही जिन्दगी जीने का आधार मानने लगा है मनमोहन सिंह और प्रतिभा पाटिल जैसे गुरु घंटालों को देखकर .........इन लोगों के निकम्मेपन की वजह से शर्मनाक हालात हैं इस देश और समाज की.....

मनोज कुमार said...

संसार में न कुछ भला है न बुरा, केवल विचार ही उसे भला-बुरा बना देते हैं। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद - भारतीयता के प्रतीक

सुनीता शानू said...

वैसे तो आपकी चर्चा हर जगह हैं फ़िर भी कोशिश की है देखियेगा आपकी उत्कृष्ट रचना के साथ प्रस्तुत है आज कीनई पुरानी हलचल

अजय कुमार said...

यथार्थ है ,ये लोग समाज के आवश्यक अंग हो गये हैं और इज्जतदार भी ।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत बढ़िया...
सादर....