Sunday, September 12, 2010

अयोध्या विवाद ... देश वासियों से एक मार्मिक अपील !!!


अयोध्या ... राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवादास्पद स्थल के स्वामित्व विवाद पर आगामी २४ सितम्बर को हाईकोर्ट लखनऊ द्वारा अपना फैसला सुनाये जाने की पूर्ण संभावना है

दावे-प्रतिदावे, तर्क-वितर्क का अपना-अपना महत्त्व है पर यहाँ पर मेरा मानना है कि कभी कभी सब निर्थक से जान पड़ते हैं, प्रश्न यहाँ सार्थकता निर्थकता का नहीं है, प्रश्न है मानवीय संवेदनाओं तत्कालीन परिस्थितियों का

एक तरफ दावे-प्रतिदावे, तर्क-वितर्क हों और दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाएं वर्त्तमान परिस्थितियाँ हों, ऐसी स्थिति में हमारी मानवीय व्यवहारिक सोच क्या जवाब देती है यह भी विचारणीय है

एक प्रश्न धार्मिक आस्था विश्वास का भी है, यहाँ मेरा मानना है कि धर्म मानवीय जीवन के अंग हैं इन्हें हम मानवीय जीवन के साथ मान सकते हैं बढ़कर नहीं, यदि धार्मिक आस्थाएं विश्वास शान्ति सौहार्द्र का प्रतीक बनें तो अनुकरणीय सराहनीय हैं

जहां स्थिति विवाद की हो ... विवादास्पद हो ... वहां प्रश्न राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद का नहीं होना चाहिए, और ही हिन्दू मुसलमानों की धार्मिक आस्थाओं का ... प्रश्न होना चाहिए हिन्दुओं मुसलमानों की भावनाओं संवेदनाओं का ... यह वह घड़ी है जब हिन्दुओं मुसलमानों को अपनी अपनी सार्थक सकारात्मक सोच व्यवहार का प्रदर्शन करते हुए मानवीय हित देश हित में एक मिशाल पेश करना है

मेरा मानना तो यह है कि अब हिन्दुओं मुसलमानों को मानवीय हित, सौहार्द्र शान्ति का पक्षधर होते हुए यह निश्चय कर लेना चाहिए कि अदालत तो अपना फैसला सुनाएगी ही, फैसला पक्ष में हो या विपक्ष में, पर हमारा - हम सबका फैसला शान्ति सौहार्द्र के पक्ष में है, देश हित में है

इस विवादास्पद मुद्दे पर मेरी अपील सिर्फ हन्दू-मुसलमानों से नहीं है वरन उन धार्मिक संघठनों राजनैतिक पार्टियों से भी है जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस मुद्दे से जुड़े हुए हैं, हम सभी शान्ति सौहार्द्र के पक्ष में सोचें कदम बढाएं

साथ ही साथ मेरा यह भी मानना है कि हिन्दू, मुसलमान, धार्मिक संघठन, राजनैतिक पार्टियां ... सभी औपचारिकता अनौपचारिकता के दायरे से बाहर निकलें तथा मानवीय हित, शान्ति सौहार्द्र के पक्षधर बनें

अयोध्या विवाद ... कोई चुनावी, राजनैतिक, खेल, हार-जीत जैसा प्रतिस्पर्धात्मक मुद्दा नहीं है और ही हो सकता है ... इसलिए इस पहलू पर हम सब की सोच व्यवहार सिर्फ ... सिर्फ ... और सिर्फ शान्ति सौहार्द्र की पक्षधर होनी चाहिए ... जय हिंद !!!

13 comments:

गजेन्द्र सिंह said...

अच्छे विचार है लेकिन मानेंगे कितने लोग ...

मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
(क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
(क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

Majaal said...

इस विषय की मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है बस इतना पता है की काफी समय से चल रहा है ये मुद्दा... जहाँ तक बात है शांति की तो मनुष्य मूलतः शांतिप्रिय ही है.. कुछ लोग जिनकी तादाद बहुत ही कम है, मूलतः पगलाए किस्म के होते है, उनको बस पगलाने से ही मतलब होता है, मुद्दा चाहे जो हो. फिर होते है राजनीतिज्ञ जो पेशेवर रूप से लफ्फाज़ होतें है, और इन पगालों का भरपूर फायदा उठाते है. मीडिया की भी रूचि जिंदा लोगो से ज्यादा कौन कितने मरे में ज्यादा होती है, इसलिए इनको तवज्जो दिया जाता है..
तो आम आदमी तो शांति ही चाहेगा फैसला कुछ भी हो, और जिनको पगलाना है उनको तो रोकना वैसे भी मुश्किल ही है...

डॉ. मोनिका शर्मा said...

Bahut hi sarthak apeel hai....
kash sab is soch ko samajh saken.
bahut prasangik aur umda post....badhai

arvind said...

aapke vichaar achhe hai...mujhe lagta hai adaalat in baato ko dhyaan me rakhkar hi faisalaa degi.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!

S.M.MAsum said...

शान्ति व सौहार्द्र की पक्षधर होनी चाहिए यह सत्य है. बाबरी मस्जिद का इस्तेमाल राजतिनिज्ञों ने किया उसको तोड़ के मुसलमानों के जज्बातों को ठेस पहुंचा के. अब कई सालों से उस जगह से हिन्दू धर्म के लोगों के जज़्बात रामजन्म भूमि के कारण जुड़ गए. फैसला कुछ भी हो किसी एक धर्म के लोगों को ढेस पहुंचना है. जबकि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के पहले, उस जगह की केवल एक हिस्टोरिकल अहमियत थी.
हिन्दुओं व मुसलमानों को अपनी अपनी सार्थक व सकारात्मक सोच व व्यवहार का प्रदर्शन करते हुए मानवीय हित व देश हित में एक मिसाल पेश करना है।
इस देश के हिन्दू मुसलमान तो शायद ऐसा कर भी लें, अगर नेता लोग ऐसा करने दें. वोट बैंक ही इन सब नफरतों की देन है.

दिगम्बर नासवा said...

लिखने जितना आसान नही है इस बात को मानना .... देखें क्या होता है ...

राज भाटिय़ा said...

आओ मिल कर हम इस झगडे को खत्म करे, ना मंदिर बने यहां ना मस्जिद... यहां बने कोई अस्पताल या कोई नेशनल पार्क या कोई ऎसी जगह जहां सब आ जा सके,
आप क्ला संदेश बहुत सुंदर है, धन्यवाद

S.M.HABIB said...

आपकी अपील हर भारतीय की अपील है उदय जी,
"बहुत हुए मंदिर-मस्जिद के फसाद
मिला क्या हमें? केवल अवसाद!!!
इबादत कहीं हो, दुआ यही हो
रहे इंसानियत सदा आबाद."

sidheshwer said...

* हम सब मानवीय हित, शान्ति व सौहार्द्र के पक्षधर बनें ।
....ऐसा ही ..ऐसा ही..

ali said...

आपकी नियत अच्छी है पर वे मानेंगे ?

kumarbharat758 said...

नही दोस्त तुमरी सोच गलत है भगवान राम का मन्दीर बना के हम हिन्दु भगवान राम राम की पुजा करना साहते है पुजा तो हम कीसी भी मन्दीर मै कर सकते है पर सवाल ये है हिन्दुस्थान मै 90% हिन्दु फिर भी हम अगर हमारे ईस्ट देव का मन्दीर भी नही बना सकते तो थु है हम पर हिन्दु समाज के आस्तीत्व का सवाल ये चार लाख हिन्दु की बली दी है हमने क्या उन्का बलीदान वीयर्थ जायेगा बात अब सिर्फ मन्दीर की नही रही है बात हिन्दुतव की है एक राम मन्दीर बना के हम एकता का शन्देश देन्गे की हम हिन्दु एक है आज मन्दीर की अगर छोड भी दो तो क्या ये बात यहा ही खतम हो जायेगा आज हम मन्दीर छोड देन्गी कल कश्मीर पर अपना हक जामयेन्गे फिर क्या उसे भी छोड दोगे कल कहेन्गे हिन्दुस्थान छोड दो काहा जा ओ गे इस पुरी दुनिया मै हिन्दु के लिये एक ही स्थान है ओर वो सिर्फ हिन्दुस्थान है राम मन्दीर ना बनना मतलब हिन्दु की हार है सर झुका के जीने से अछा है सर कट जाये