Friday, November 18, 2011

छपास रोग ...

दफ्तर पहुंचते ही बड़े साहब
सुबह सुबह -
अपने पी.ए. पर भड़क गए !

खरी-खोटी सुन, पी.ए. सन्न रह गया
भड़कने का सबब जानने को
वह बड़ा बेचैन हो गया !

हुआ क्या है, कहाँ से ये तूफ़ान आया है
आया तो आया, ठीक है
पर मुझ पे ही क्यूँ ?

पूरा जिला साहब का है
किसी को भी बुला कर भड़क लेते !

पी.ए. बेचारा क्या कहता
आखिर, साहब तो साहब होते हैं !

वह दिमाग ठंडा होने का इंतज़ार करने लगा
आखिर, पी.ए. और साहब का
सुबह से शाम तक -
चोली-दामन सा सांथ जो होता है !

मौक़ा मिलते ही पी.ए.
नाक-मुंह सिकोड़ते हुए पहुंचा !

साहब देखते ही समझ गए, बोले -
तुझपे गुस्सा न होऊँ
तो तू ही बता किस पे होऊँ !

मेरा क्या कुसूर हुआ माई-बाप, जो
सुबह सुबह आप मुझपे बरस पड़े
फोन कर देते, हिंट दे देते
दो-चार अफसरों को बुला के रख लेता !

कम से कम इस नाचीज को तो बख्श देते
पी.ए. हूँ साहब, कोई ऐरा-खैरा नहीं हूँ !

साहब बोले - न्यूज पेपर्स उठा के ला
दिखा - किसी भी फ्रंट पेज पे
कहीं भी, मेरा नाम या फोटो है ?
जी, नहीं है हुजूर !

अब अन्दर देख -
क्या वहां कुछ अपना नामो-निशान है ?
जी, नहीं है हुजूर !

तो अब ये बता, तुझपे भडकूँ
या किसी और पे भडकूँ ?

जी, हुजूर, माई-बाप, समझ गया
भूल गया था, आपका मर्ज -
और दबा-दारु भी !

पर, अब आईन्दा से ...
मुझसे, ये गुस्ताखी नहीं होगी
जिले में कुछ हो या न हो
पर आपके -
छपने में कोई ढील नहीं होगी !!

2 comments:

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" said...

vaah mza a gyaa jnaab .akhtar khan akela kota rajshtan

प्रवीण पाण्डेय said...

तो आग इसलिये लगी थी।