Sunday, October 10, 2010

राहुल गांधी परिपक्व या अपरिपक्व !

हिन्दुस्तान में धर्म जातिगत राजनीति कोई नया मुद्दा नहीं है आम बात है ! विगत दिनों मध्यप्रदेश दौरे पर टीकमगढ़ में कांग्रेस पार्टी के युवा सेनापति राहुल गांधी का यह स्टेटमेंट कि सिमी और आरएसएस दोनों एक जैसी विचारधारा के कट्टरवादी संघठन हैं, दोनों में वैचारिक तौर पर कट्टरता में कोई फर्क नहीं है, राहुल बाबा ने स्पष्ट तौर पर अपने समर्थकों के समक्ष यह कह दिया कि संघ सिमी जैसी विचारधारा रखने वालों की कांग्रेस पार्टी में कोई जगह नहीं है हालांकि राहुल गांधी के भाषाई तेवर देखकर यह स्पष्ट झलक रहा था कि वे मध्यप्रदेश में दिग्विजयसिंह की बोली बोल रहे हैं संघ की सिमी से तुलना करना निसंदेह एक विवादास्पद वक्तव्य कहा जा सकता है क्योंकि सिमी एक प्रतिबंधित संघठन है, और जो संघठन प्रतिबंधित हो उससे किसी जनसामान्य से जुड़े किसी संघठन की तुलना करना अपने आप में विवाद को जन्म देता है, खैर तुलनात्मक स्टेटमेंट, नासमझी, समझदारी, समर्थन, विरोध, परिपक्वता, अपरिपक्वता, ये अलग मुद्दे हैं इन मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा के लिए राजनैतिक दल सक्रीय क्रियाशील हैं हालांकि यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं है कि इस पर चर्चा की जाए, लेकिन इस मुद्दे अर्थात राहुल गांधी के सिमी आरएसएस के संबंध में दिए गए कथन के अन्दर छिपे रहस्यात्मक कूटनीतिक भाव पर चर्चा करना लाजिमी है, यहाँ पर रहस्यात्मक भाव से मेरा तात्पर्य जातिगत धर्मगत राजनीति से परे है

जी हाँ, राहुल गांधी का यह विवादास्पद कथन ठीक उस समय आना जब अयोध्या स्थित रामजन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहावाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसला आने के फलस्वरूप कुछेक राजनैतिक दल फैसले के पक्ष अथवा विपक्ष में अपने अपने कथन जारी कर वोट की राजनीति कर रहे थे, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को अयोध्या फैसले पर रोटी सेंकने का प्रयास करते हुए शान्ति सौहार्द्र बनाए रखने को तबज्जो देना चाहिए था जो परिलक्षित नहीं हुआ ! यहाँ विचारणीय बात यह है कि अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पहले ही बहुत राजनैतिक पैंतरेवाजी हो चुकी थी जो अब नहीं होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा होते हुए लोगों ने पुन: इस मुद्दे को भुनाने की कसर नहीं छोडी यह स्पष्ट तौर पर झलक रहा था कि अयोध्या मुद्दे के फैसले से कांग्रेस पार्टी को तो कोई राजनैतिक लाभ था और ही हानि, लेकिन दूसरे दलों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ कुछ लाभ जरुर था, इस राजनैतिक लाभ-हानि के द्रष्ट्रीकोण से ही राहुल गांधी के स्टेटमेंट को आंका जा सकता है हुआ दरअसल यह कि जब जातिगत धर्मगत राजनीति अर्थात वोट की नीति की बात हो तथा कुछेक राजनैतिक दल मुद्दे को भुनाने की कोशिश करें तब कांग्रेस कैसे चुप रह सकती है, और चुप रहना राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से लाजिमी भी नहीं है !

अब हम राहुल गांधी के स्टेटमेंट में छिपे रहस्यात्मक भाव पर चर्चा करते हैं, अपने देश में हिन्दू हों या मुस्लिम हों दोनों ही भावनात्मक व्यवहारिक रूप से दो हिस्सों में बंटे हुए हैं कुछ मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म की राजनीति के पक्षधर हैं तो कुछ घोर विरोधी भी हैं, ठीक यह स्थिति हिन्दू मुस्लिम वर्ग में आरएसएस व् सिमी को लेकर भी है ! मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि हिन्दू वर्ग में ही कुछेक कट्टरपंथ विचारधारा के समर्थक हैं तो कुछ विरोधी भी हैं ठीक उसी प्रकार मुस्लिम वर्ग में भी समर्थन विरोध की स्थिति है, कहने का तात्पर्य यह है कि मुस्लिम वर्ग में ही कुछेक सिमी का समर्थन करते हैं तो कुछ विरोध भी करते हैं, ठीक इसी तरह हिन्दू वर्ग में भी आरएसएस का समर्थन विरोध दोनों है ! राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिन्दू वर्ग मुस्लिम वर्ग में साफ्ट कार्नर रखने वाला वह हिस्सा जिसे जातिगत धर्मगत वोट की राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, तो वह किसी के समर्थन में है और ही किसी के विरोध में है, अब सवाल यह है कि इस वर्ग अर्थात हिस्से को कौन व् कैसे भावनात्मक रहस्यात्मक ढंग से अपनी ओर खींचे !! यह वह वर्ग अर्थात हिस्सा है जिसे मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम युक्त कट्टर राजनीति से कोई लेना-देना होकर शान्ति सौहार्द्र से लेना-देना है, इस वर्ग को देश में एक ऐसी राजनैतिक पार्टी की जरुरत है जो अमन-चैन शान्ति-सौहार्द्र की पक्षधर हो ! कहीं ऐसा तो नहीं राहुल गांधी के इस स्टेटमेंट में यही रहस्यात्मक भाव छिपा हुआ है तथा इस स्टेटमेंट के माध्यम से इस वर्ग विशेष का समर्थन जुटाने का भरपूर प्रयास किया है !!

24 comments:

मनोज कुमार said...

आलेख का विश्लेषण अच्छा लगा। बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

ललित शर्मा said...

राजनीति कर रहे हैं राहुल

ZEAL said...

Time will tell the truth !

Udan Tashtari said...

समय अपनी कहनी खुद कहेगा...

अजय कुमार झा said...

जी हां ये तो सच में ही आने वाले वक्त बताएगा वैसे जितना समय उन्होंने राजनीति में अब तक बिताया है उससे कम से कम इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि संगठनों और राजनीतिक दलों के बारे में उनकी जानकारी स्पष्ट हो

Ratan Singh Shekhawat said...

राहुल तो अपरिपक्व है पर उन परिपक्व राजनेताओं का क्या करें जिन्होंने राहुल को ऐसे वकतव्य देने के लिए प्रेरित किया है |
ये राजनीती है यहाँ हमेशा बेसिर पैर के वक्तव्य दिए जाते है | एसा ही राहुल ने कर दिया |

Shah Nawaz said...

क्या कहें.... अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग!

Umra Quaidi said...

सार्थक लेखन के लिये आभार एवं "उम्र कैदी" की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव भी जीते हैं, लेकिन इस मसाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये यह मानव जीवन अभिशाप बना जाता है। आज मैं यह सब झेल रहा हूँ। जब तक मुझ जैसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यही बडा कारण है। भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस षडयन्त्र का शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल दो मिनट का समय हो तो कृपया मुझ उम्र-कैदी का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आप के अनुभवों से मुझे कोई मार्ग या दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये।
http://umraquaidi.blogspot.com/

आपका शुभचिन्तक
"उम्र कैदी"

KK Yadava said...

राजनीति जो न कराये...कभी 'शब्द- सृजन की ओर' भी आयें.

"अभियान भारतीय" said...

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विचार की आवश्यकता है...........सार्थक एवं प्रभावी लेखन के लिए सदर बधाई !!

Suresh Chiplunkar said...

राहुल तो (राजनीति और समझ में) बच्चे हैं लेकिन उन्हें पढ़ाने वाले तो बच्चे नहीं हैं… :) उन्हें पक्का पता है कि "राहुल बाबा" के मुखारविन्द से क्या-कब-कैसे बुलवाया जाये ताकि "सेकुलरिज़्म" में वोटों की बन्दरबाँट में अधिकतम हिस्सा हासिल किया जा सके…।

इतने जूते खाने के बाद भी "दोनों हाथों में लड्डू रखने" की कांग्रेस की चाहत जाती नहीं… हैरानी है

arun c roy said...

आलेख का विश्लेषण अच्छा लगा।

राज भाटिय़ा said...

४० साल का हो गया अभी भी नादान हे:) वाह, उसे मालूम हे वो क्या बोल रहा हे, ओर लोगो को बेवकुफ़ बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहा हे, ओर देख लेना यही जनता उसे मुकुट भी पहनाऎ गी.उसे उस गद्दी पर भी बिठायेगी जिस की इच्छा उसे हे

kshama said...

Isme koyi shak nahi ki,Rahul Gandhi behad aparipakv hain! Aisa bhashy unhon ne karnahi nahi chahiye tha!

kshama said...

Isme koyi shak nahi ki,Rahul Gandhi behad aparipakv hain! Aisa bhashy unhon ne karnahi nahi chahiye tha!

सुधीर said...

बहुत ही सटीक विश्लेषण। कट्टरपंथी राजनीतिक हाशिए पर आएं तो यह समाज के लिए ठीक होगा। समाज में बेवजह के तनाव नहीं पैदा होंगे।

अशोक बजाज said...

अच्छा पोस्ट ,बधाई .

अरुणेश मिश्र said...

स्वार्थ के वशीभूत वक्तव्य ।

दिगम्बर नासवा said...

राहुल का ये वैचारिक दिवालियापन है ....

रचना दीक्षित said...

अच्छा विश्लेषण है

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

राहुल बाबा ही रहेगा ...यह राजनीति है

राम त्यागी said...

Aparipakw

mukes agrawal said...

राहुल गांधी में यही रहस्यात्मक भाव छिपा हुआ है