Saturday, June 12, 2010

... फ़ालोवर ... फ़ालोवर .... फ़ालोवर ...!!!

ब्लागदुनिया की माया सचमुच अपरंपार है ... फ़ालोवर एक ऎसा पात्र जो ब्लागिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा जान पडता है ... वह प्रत्येक ब्लाग की आन-मान-शान है .... कुछ ब्लागर फ़ालोवर की लिस्ट ब्लाग के सबसे ऊपर रखते हैं ... कुछ दाएं-बाएं रख लेते हैं .... कुछ सबसे नीचे स्थान दे देते हैं ... कुछ तो इस लिस्ट के लफ़डे-झपडे में नहीं रहते वे तो फ़ालोवर का सिस्टम ही नहीं रखते ब्लाग पर ....

...खैर ये सब तो ठीक है ... लिस्ट लोग रखें या रखें ... फ़ालोवर बने या बनें ... लोग फ़ालोवर बन जाते हैं और फ़िर ब्लाग को फ़ालो करना भूल जाते हैं ... फ़ालो करना क्यों भूल जाते हैं ? ... या जानबूझ कर ही फ़ालो नहीं करते, फ़िर फ़ालोवर बनने का मकसद क्या रहता है ?

मैं अक्सर देखता हूं किसी किसी ब्लाग के फ़ालोवर १५०, २००, २५० या उससे भी अधिक अधिक हैं ... पर जब उस ब्लाग पर लगी पोस्ट को देखता हूं तो १५,२०,२५ टिप्पणी के भी लाले पडे रहते हैं ... ये अंकगणित समझ नहीं आता ... इतने इतने फ़ालोवर और १०,१० टिप्पणिओं के भी घन्घोर लाले, ऎसा क्यों ?

... कहीं फ़ालोवर बनने का मकसद ब्लागों पर अपनी फ़ोटो चस्पा करना मात्र तो नहीं है ? ... यदि ये मकसद नहीं है तो फ़ालोवर बनने के बाद भी ब्लाग की पोस्ट को पढते क्यों नही, यदि पढते हैं तो टिप्पणी क्यों नहीं करते .... टिप्पणी नकारात्मक या सकारात्मक हो सकती है पर होनी चाहिये .... कुछ बुद्धिजीवी अभी आकर भिड जायेंगे यह कहते हुये कि फ़ालोवर बन गये हैं तो क्या टिप्पणी भी करना जरुरी है ... समय नहीं है पढकर चले जाते हैं ... भाई जी जब समय ही नहीं है तो फ़ोटो लगाने की जरुरत क्या आ गई थी ?

.... ये तो टीका टिप्पणी की बात हुई ... अब और गहन मुद्दे पर भी चर्चा कर लेते हैं ... लगभग ब्लागों पर "विजिटर काऊंटर" भी लगा हुआ है मैं देख रहा था कुछ ब्लागों के विजिट काऊंटर को .... १०० से अधिक फ़ालोवर और विजिटर मात्र १५,२० .... ये क्या माजरा है भाई .... चलो मान लेते हैं कि फ़ालोवर्स के पास टिप्पणी करने का समय नहीं है .... फ़िर जितने फ़ालोवर हैं ... कम से कम ५०% तो विजिटर होना चाहिये ... यदि ऎसा नहीं है तो फ़ालोवर्स होने का क्या औचित्य है ?

कोई बतायेगा .... फ़ालोवर बनते क्यों हैं ?

35 comments:

सूर्यकान्त गुप्ता said...

बहुत सही बात आपने कही है और लगता है इसीलिये आपने हमसे डी लिट की उपाधि पुन: पा ली। आभार!

सूर्यकान्त गुप्ता said...

और ऐसा कुछ नही है फ़ालोवर, मेरी व्यक्तिगत राय के अनुसार रचना पसन्द आ जाती है और ताल मेल सही बैठ जाता है, तो सोचा जाता है अनुसरण्करता बन जाया जावे। दूसरी बात, अपने डेश बोर्ड मे देखने से तत्काल पता चल जाता है कि उन्होने कौन सी पोस्ट अभी लिखा। जैसे अभी अभी मैने यह पोस्ट देखा।

राजीव तनेजा said...

आपने तो गंभीर सोच में डाल दिया बन्धु :-(

सूर्यकान्त गुप्ता said...

उदय भाई, नाराजगी नही, ये हमारे लिये सदमे जैसा लगता है जब कोई अपने मे से अचानक गायब हो जाय। अपनी बोली मे जिसे हदरहा कहते हैं। अब "मन सन्तोष सुनत तव बानी" वाली बात हुई याने तसल्ली हो गई। पर आचार्य जी हमारे आदरणीय स्वामी ललितानन्द जी कहाँ हैं आजकल्। हम जैसे शिष्यों को आशीर्वचन प्रदान नही कर रहे हैं?

ललित शर्मा said...

विचारणीय पोस्ट
आपने सोचने को मजबूर कर दिया।
सार्थक चिंतन

आभार

संगीता पुरी said...

कुछ तो इस लिस्ट के लफ़डे-झपडे में नहीं रहते वे तो फ़ालोवर का सिस्टम ही नहीं रखते ब्लाग पर ....
आप भी शायद इसी श्रेणी में आते है .. फोलोवर बनना चाह रही थी .. पर आॅप्‍शन नहीं दिखा !!

संगीता पुरी said...

मिल गया !!

दिलीप said...

sahi kaha sirji....sankhya badhani ho follower ki to pehle doosron ko follow karna padega...yahi reet hai...bas dono ne ek dosre ko follow kiya aur kaam khatm ab nahi jaante ek doosre ko...

दीपक 'मशाल' said...

सच कह रहे हैं.. मेरे पास ज्यादा समय नहीं, इसलिए बेहतर है बोरिया-बिस्तर सिमेट लूं.. यानी फोलोअर लिस्ट छोड़ दूँ.. पर क्या करें तरीका भी तो नहीं पता..चक्रव्यूह में घुसना आता है निकालना नहीं..ऐसे ही कई अभिमन्यु हैं यहाँ..

Sanjeet Tripathi said...

bhai sahab chhota muh badi baat kah raha hu, kabhi google reader pe account banyenge to is followw karne ka meaning samajh me aa jayega....sorry agar bura laga ho to......

'उदय' said...

@Sanjeet Tripathi
... इसमें बुरी लगने वाली कोई बात नहीं है ... अगर आप स्वयं ही स्पष्ट कर देते तो हम नौसिखिये लोगों के लिये ज्यादा अच्छा हो जाता ... अब इस गूगल रीडर पर अकाउंट ... ये क्या नई बला दे दिये संजीत जी!!!!

ajit gupta said...

यह प्रश्‍न मेरे दिमाग में भी कई बार आ चुका है। हम भी कइयों के फोलोवर हैं और नियमित भी सभी पर नहीं जा पाते। लेकिन सोच समझकर ही फोलोवर पर टिक किया था और यदि लगता है कि अब इस बंदे की पोस्‍ट और नहीं पढ़ी जा रही तो उसे डिलिट भी कर दिया था।

Suman said...

nice

आचार्य जी said...

आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

नई करन कमेंट, जा! तुमन ह कईसे अकेल्‍ले अकेल्‍ला मीट-सीट कर लेथव. :)

राजकुमार ग्वालानी said...

फालोअर केवल फालो करते हैं कमेंट नहीं

Mrs. Asha Joglekar said...

हम तो मन के णौजी हैं मन हुआ टिप्पणी की नही हुआ नही की । हम फॉलोअर भी नही बनते ।

जी.के. अवधिया said...

हिन्दी ब्लोगिंग में फॉलोवर बनने का एक चलन है इसलिये लोग बन जाते हैं, फॉलो करना कोई जरूरी थोड़े ही है।

डॉ टी एस दराल said...

ब्लॉग पर लिखने , पढने , कमेन्ट करने , पसंद या नापसंद करने आदि की पूर्ण स्वतंत्रता है । कोई बंधन नहीं । यही तो ब्लोगिंग की खूबसूरती है ।
यह कतई ज़रूरी नहीं कि आप फोलोवर हैं तो लेख अवश्य पढेंगे और टिप्पणी अवश्य करेंगे । आखिर सबकी अपनी पसंद होती है।

निर्मला कपिला said...

जब भी कोई नया ब्लागर आता है तो उसे उमीद होती है कि कोई हमारा भी फालोयर बने और टिप्पणी करे इस लिये वहाँ टिपाणे कर फालोयर बन जाती हूँ मगर धीरे धीर पता चलता है कि पढने वाले ब्लाग कि लिस्ट इतनी लम्बी हो गयी है कि समय नही मिल पाता सभी को कमेन्ट करने का। धीरे धीरे सब कुछ समझ भी आ जायेगा और सुधर भी जायेगा
शुभकामनायें

ब्लाग बाबू said...

अंकल अंकल लो हम आ गये
आपने क्यों बुलाया हमको
अब हम एक गिलास दूध पीकर ही जायेगे
हमको पिलाओ दूध
मै भी आपका पंखा हूं
हम जा रहे है
बाय बाय अंकल

संजय भास्कर said...

विचारणीय पोस्ट
आपने सोचने को मजबूर कर दिया।

संजय भास्कर said...

आखिर सबकी अपनी पसंद होती है।

ajay saxena said...

देखा आपने भगवान के घर देर है अंधेर नहीं....आपने ... फ़ालोवर ... फ़ालोवर .... फ़ालोवर ...!!! लिखी और आपको 24 कमेंट मिल गए..और ब्लागवाणी की हिट लिस्ट में सातवें नंबर पर भी आ गए ...एकाध-दो घंटे में टाप पर आ जाएंगे...बधाई आपको

Shekhar Kumawat said...

शानदार पोस्ट है...

अजय कुमार झा said...

उदय जी ,
फ़ालोवर यानि अनुसरणकर्ता बनने या न बनने की पीछे कहीं से भी उस ब्लोग को पढने और टीपने का मनोविज्ञान काम नहीं करता है शायद । अपनी बात कहूं तो कई बार तो मैं ब्लोग के कलेवर से ही इतना प्रभावित हो जाता हूं कि उसका फ़ालोवर बन बैठता हूं । कई बार किसी ब्लोग का पहला फ़ालोवर बनना ही रोचकता प्रदान करता है मन को । लेकिन इसकी सबसे अधिक उपयोगिता ये होती है कि आपको अपने डैशबोर्ड ही वो सभी ब्लोग्स और उनकी ताजी पोस्टों की झलकियां देखने को मिल जाती हैं । पढें न पढें आपकी मर्जी ..टीपें न टीपें आपकी मर्जी । वैसे सबका अपना अपना क्राईटेरिया तो होगी ही अलग अलग ।

Udan Tashtari said...

शायद ब्लॉगवाणी की जगह अपने डेशबोर्ड पर लिंक देखते हों लोग..

जनक said...

use below link and see what is follower

http://www.google.com/support/blogger/bin/answer.py?hl=en&answer=104226

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बड़ी गहन बातें हैं भई

Mired Mirage said...

जिन्हें आप फ़ौलो करते हों उन्हें आप गुगल रीडर पर पढ़ सकते हैं। गुगल रीडर पर पढ़ने से आप ब्लॉग एग्रीगेटर्स पर निर्भर नहीं रहते। फ़ौलोअर बनने से भी आपको अपने डैशबोर्ड ही वो सभी ब्लॉग्स और उनकी ताजी पोस्टों की झलकियां देखने को मिल जाती हैं ।
घुघूती बासूती

'उदय' said...

@जनक
... कहां पे जन्म हुआ और कहां पर हो ... पहले तुम यह सुनिश्चित कर लो .... फ़िर बैठ कर बात कर लेंगें ...!!!!

'उदय' said...

@Udan Tashtari
...आप मेरे ब्लाग के फ़ालोवर नहीं हैं ... फ़िर भी आप अपने डैशबोर्ड पर मेरे ब्लाग का लिंक देख लेते हैं ... यह बताने व समझाने की जरुरत न आपको है और न ही मुझे है ... यह कैसे सम्भव है आप और मैं दोनो जानते हैं !!!!

'उदय' said...

@जनक
...तुमने जो लिंक दिया है उसको पढ व समझ लो ...फ़िर बात करना !!!!!

परमजीत सिँह बाली said...

हम तो फालोवर इस लिए बनें हैं कि अपनी पसंद के ब्लॉग अपने डेशबोर्ड से पढ़ सके। क्योकि ब्लॉगवाणी या चिट्ठाजगत पर पोस्टे ज्यादा देर तक नही रहती...

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

हमरे अड़ोसी पड़ोसी सब हमरे फालोअर है लेकिन उनका ब्लॉगिंग या हमरी साइट देखन से कोइ मतलब नाही है, हमरा सच तो ये है.. अब कोई और बताए