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Monday, April 8, 2013

बेझिझक ...


हर घड़ी, यूँ ही गुमसुम मत रहा कीजे 
दिल की बातें भी तो, कुछ कहा कीजे ?

इक तेरी दीद को हम तरशते हैं सुबह-औ-शाम 
देख के हमको, तनिक मुस्कुरा दिया कीजे ??

हमारे लव तो सिल दिए हैं जहां के दस्तूरों ने 
तुम तो दिल की, बेझिझक कह दिया कीजे ? 

सच ! मिलेगा क्या तुम्हें, दूर रहकर हमसे 
तनिक सिमट के भी तो मिल लिया कीजे ?

किसने रोका है तुम्हें राह में दिलवर 
तुम तो बेधड़क आया-जाया कीजे ? 

रखा है क्या, मिलेगा क्या तुम्हें परछाइयों में 
कभी दिल खोल के भी तो मिल लिया कीजे ?

Thursday, June 21, 2012

तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ??


प्रीत लिखूँ, या मीत लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ?

भूख लिखूँ, या प्यास लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ?

धरम लिखूँ, या करम लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ?

धूप लिखूँ, या छाँव लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ?

मिलन लिखूँ, या विरह लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ?

प्रीत लिखूँ, या मीत लिखूँ 
तुम बोलो कैसा गीत लिखूँ ??

Sunday, June 17, 2012

होश-बेहोश ...


शाम होती नहीं कि - टुन्न हो जाता हूँ मैं 
तेरी यादों के मद में होश खो जाता हूँ मैं !

कभी पीता नहीं हूँ शराब के दो घूँट भी मैं 
गर न देखूं तुझे तो बेहोश हो जाता हूँ मैं !!

Saturday, February 18, 2012

तेरी आँखों की भाषा ...

तेरी आँखों की भाषा पढ़ते पढ़ते पढ़ नहीं पाए
तुझसे बिछड़ के फिर किसी से मिल नहीं पाए !

बदला कुछ भी नहीं है
सिर्फ वक्त की घड़ियाँ ही बदली हैं !
अभी भी तुम उधर से
खामोश बनकर, मुझसे कुछ कह रहे हो
और कल की तरह ही
हम इधर चुप-चाप तुमको सुन रहे हैं !

सिर्फ दो कदम का फासला था मेरे यारा
उधर से तुम, इधर से हम
जिसे, अब तक, तय कर नहीं पाए !

तेरी आँखों की भाषा पढ़ते पढ़ते पढ़ नहीं पाए
तुझसे बिछड़ के फिर किसी से मिल नहीं पाए !!

Wednesday, February 8, 2012

बहुत खाली थी, बंद मुट्ठी मेरी ...

नहीं मिला उसे कुछ, दिल तोड़ कर मेरा
कितना तड़फा हूँ, ये उसे आजमाना था !

रंज करता, तो करता कब तक
जाके उसे, मुझे ही मनाना था !

सच ! कहाँ था जोर, मेरा मुझ पर
वक्त के हांथों, मैं एक खिलौना था !

मेरी फ़रियाद पे भी खामोश ही रहा
वो 'खुदा' है उसे ये, मुझे बताना था !

बहुत खाली थी, बंद मुट्ठी मेरी
मगर उसको, तो आजमाना था !!

Monday, January 30, 2012

रण है ! विजय हैं हम !!

हर घड़ी, हैं मोर्चे पे हम
रण है ! विजय हैं हम !!

दिलों में धडकनें हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

खौफ का नाम हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

आख़िरी आस भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

जुनूं हैं, जान भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

विश्वास के प्रतीक हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

फक्र का दौर भी हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

वतन
की आन हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

वतन की शान हैं हम
रण है ! विजय हैं हम !!

Sunday, January 29, 2012

हम हैं, विजय है !!

नक्सली खौफ़ है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

आतंकी दौर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

बारूदी
ढेर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

पहाडी डगर है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

ठंड, गर्म, बरसात है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

दहशत का माहौल है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

नक्सली खौफ़ है तो क्या ?
हम हैं, विजय है !!

Saturday, January 14, 2012

लग रहा है अब मकां मिल जाएगा !

आज फिर तन्हाई राहों में दिखे है
दिल कहे है कोई तो मिल जाएगा !

भोर की किरणें सुहानी लग रही हैं
लग रहा है जी मचल ही जाएगा !

ओस की बूँदें भी मन को छू रही हैं
लग रहा है तन पावन हो जाएगा !

धड़क रहा है, दिल मेरा, नाम तेरे
अब कहाँ, वो मेरा रह पायेगा !

चल पड़े हैं, पग मेरे, तेरी डगर को
लग रहा है अब मकां मिल जाएगा !!

Wednesday, January 11, 2012

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का ...

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !

क्या मिलेगा अब, बन के अंधड़ किसी को
अब कहाँ तिनका रहा मैं, जो तू उड़ाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं सारे जहां का
क्या मिलेगा अब तुझे, जो तू मेरा होना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं खारा समंदर
भला क्यूँ, अब मुझमें तू डुबकी लगाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं वटवृक्ष यारा
भला क्यूँ, अब मुझे तू बहारों की कहानी सुनाना चाहता है !

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !!

Friday, December 23, 2011

ए वतन मेरे वतन ...

ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

जमीं से आसमां तक
तुझको है मेरा नमन
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

भूख से, मंहगाई से
जीना हुआ दुश्वार है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

भ्रष्ट हैं, भ्रष्टाचार है
धोखे-घुटालों की भरमार है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

मद है, मदमस्त हैं
खौफ है, दहशत भी है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

भूख है, गरीबी है
सेठ हैं, साहूकार हैं
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

अफसरों की शान है
मंत्रियों का मान है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

आज गम के साए में
चल रहा मेरा वतन
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !

ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !!

Tuesday, December 20, 2011

एक नई इंकलाबी चाहिए !!

रोज हो रही हैं पार, हदें और सरहदें
ऐंसे बेलगाम दरिंदों के सिर कलम होने चाहिए !

सरेआम जो खुद का सौदा हैं कर रहे
ऐंसे बेईमानों को दोजख नसीब होना चाहिए !

भूल जाओ उनको, जो भूल गए हैं तुम्हें
ऐंसे मौकापरस्तों को, गद्दार कहना चाहिए !

सिर पे कफ़न बाँध, जो घर से निकलते रोज हों
आज मेरे मुल्क को, ऐंसे ही मसीहा चाहिए !

कब तलक जीते रहें, हम झूठें दिलासों पर 'उदय'
अब मेरे मुल्क में एक नई इंकलाबी चाहिए !!

Saturday, December 3, 2011

हम इतना डरते क्यों हैं ?

आज नहीं तो कल, हम सबको मिट्टी में मिल जाना है
आज टूट जाने से ... हम इतना डरते क्यों हैं ?

तिनका तिनका, इधर उधर, हम इतना बिखरे क्यूँ हैं
गठरी बन जाने से ... हम इतना डरते क्यों हैं ?

लूट - डकैती मकसद जिनका, वो बैठे हैं सिंहासन पर
उनको धक्का देने से ... हम इतना डरते क्यों हैं ?

फिजाओं में जहर घुल रहा है, इन जहरीले दरख्तों से
इनको दफ़नाने से ... हम इतना डरते क्यों हैं ?

आग लग रही मुल्क में सारे, अपने घर के ही चिरागों से
ऐंसे चिराग बुझाने से ... हम इतना डरते क्यों हैं ?

Tuesday, November 29, 2011

मुझे ही गुनगुनाना चाहता है ...

गीत-गजल तो मैं हूँ नहीं 'उदय', फिर भी
वो मुझे ही गुनगुनाना चाहता है !

गर्म साँसें रोक पाना मुमकिन नहीं उससे, फिर भी
वो मुझसे सिमट के राह चलना चाहता है !

दुश्मन कहते थकता नहीं मुझको, फिर भी
वो मेरे संग ही कदम बढ़ाना चाहता है !

कल सब, बिछड़ के दूर हो जाऊंगा उससे, फिर भी
वो मुझे ही आजमाना चाहता है !

जिंदगी के सफ़र में उसे यकीं नहीं है मुझपे, फिर भी
वो मेरी यादों को सफ़र में चाहता है !

दिन के उजालों में उसे परहेज है मुझसे, फिर भी
वो अंधेरों में मुझे ही हमसफ़र चाहता है !

दो घड़ी का सांथ भी गंवारा नहीं उसको, फिर भी
वो मेरे ही संग जिंदगी बिताना चाहता है !

पत्थर दिल हूँ मैं, यह कहता फिरे है, फिर भी
वो इबादत में मुझे ही चाहता है !

गीत-गजल तो मैं हूँ नहीं 'उदय', फिर भी
वो मुझे ही गुनगुनाना चाहता है !!

Wednesday, October 19, 2011

चलो चलें, कहीं दूर चलें ...

चलो चलें, कहीं दूर चलें
दूर गगन के पार चलें
तुम चलो, हम चलें
एक नया संसार गढ़ें
जहां प्यार के फूल खिलें
खुशियों के जहां ढोल बजें
तुम चलो, हम चलें
मीत बनें, हम गीत बनें
चलो चलें, कहीं दूर चलें
दूर गगन के पार चलें !!

Monday, October 17, 2011

बहुत बूढा तो है लेकिन ...

कभी भूखा, कभी प्यासा, समर में आगे बढ़ता है
कभी खामोश रहता है, कभी चिंघाड़ पड़ता है !

सफ़र छोटा या लंबा हो, कभी परवाह नहीं करता
दिलों में आरजू रखकर, कदम मजबूत रखता है !

नहीं रुकता, नहीं थमता, नहीं हटता, वो पीछे है
अदब से बात करता है, गजब की शान रखता है !

तेरी, मेरी, इसकी, उसकी, वो बातें नहीं करता
वतन की आन, मान, शान, पे कुर्बान होता है !

नहीं डरता फिसलने से, संभल के पैर रखता है
बहुत बूढा तो है लेकिन, जवानी जोश रखता है !!

Tuesday, October 11, 2011

जगजीत सिंह ... एक लम्बे सफ़र के लिए !!

मुसाफिर था, तेरी गलियों में,
घड़ी-दो-घड़ी के लिए
अब चल पडा हूँ, एक लम्बे सफ़र के लिए !

तेरी यादों में, रहेगा अब बसर मेरा
सदा सदा के लिए !

गुनगुनाते फिरा, सदा सदा
मैं गीत तेरे लिए
अब चल पडा हूँ, एक लम्बे सफ़र के लिए !

याद आऊँ, तो तुम
गुनगुना लेना
गीत बन गया हूँ, अब मैं तुम्हारे लिए !

सदा सदा के लिए
अब चल पडा हूँ, एक लम्बे सफ़र के लिए !!

Monday, October 10, 2011

जगजीत सिंह की याद में ...

जगजीत सिंह की याद में ...
हार्दिक श्रद्धांजलि ...
उनकी ओर से कुछ पंक्तियाँ ... जो मेरे जेहन में उमड़ पडीं ...

सहेज पाना, नहीं अब मुमकिन
तुम्हारी यादें, यहीं
छोड़ जा रहा हूँ !

था ये कैंसा, कारवां जिंदगी का
जिसे छोड़ पीछे, मैं चला जा रहा हूँ !

कभी याद आऊँ, गुनगुना लेना मुझको
गीत सारे, यहीं छोड़ जा रहा हूँ !

Saturday, September 24, 2011

दास्ताँ-ए-मोहब्बत ...

मरने को तो मर गए हैं लेकिन
फिर भी हम जिए जा रहे हैं !

बुझ तो गई हैं लकडियाँ सारी लेकिन
अंगार अब भी दहके जा रहे हैं !

जर्रा जर्रा जिस्म का जल गया है लेकिन
रूह वहीं पे खड़ी मुस्काये जा रही है !

भुलाना चाहा है तुमने हमको लेकिन
फिर भी हम याद आ रहे हैं !

ये कैसी मुहब्बत की थी तुमने हमसे
जो मर कर भी हम तुम्हें याद आ रहे हैं !

जर्रा जर्रा तुमने है भुलाना चाहा लेकिन
जर्रा जर्रा हम याद आ रहे हैं !!

Tuesday, September 20, 2011

मोहब्बत के चिराग ...

वो खामोशी में गुस्सा जता रहे थे
बात दिल की दिल में छिपा रहे थे !

हमने जब पूंछा सबब उनसे
तो रूठे-रूठे ही मुस्कुरा रहे थे !

हम इतने नादां थे, फिर भी
उनके दर को खट-खटा रहे थे !

रोज दे देकर तसल्ली दिल को
हम खुद को आजमा रहे थे !

कैसे टूटेगी अब ये उलझन मेरी
यही सोच सोच के घवरा रहे थे !

आस के मोहब्बती चिरागों को
बार बार बुझने से बचा रहे थे !!

Thursday, September 1, 2011

... श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

बप्पा बप्पा गणपति बप्पा
विघ्न विनाशक गणपति बप्पा

तेरे-मेरे गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा

गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
घर घर विराजे गणपति बप्पा

जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा

लडडू लाओ, लडडू चढाओ
खाओ-खिलाओ गणपति बप्पा

आँगन-आँगन ढोल बजाओ
बिराज गए हैं गणपति बप्पा

गणपति बप्पा, गणपति बप्पा
हम सबके हैं गणपति बप्पा

सबसे आगे गणपति बप्पा
सबके संग-संग गणपति बप्पा

जोर से बोलो गणपति बप्पा
जय जय बोलो गणपति बप्पा

सिद्धि विनायक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा

विघ्न विनाशक गणपति बप्पा
बप्पा बप्पा, गणपति बप्पा

जय जय बोलो गणपति बप्पा
गणपति बप्पा, गणपति बप्पा !