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Tuesday, May 24, 2016

जन लोकपाल ... जान बाकी है ... जिन्दा है ... !

जन लोकपाल
अभी-भी ... जिन्दा है ... लहु-लुहान पड़ा है,

न कराह रहा है ...
न तड़फ रहा है ...
क्यों ? .... क्योंकि - .... वह कोमा में है !

न ड्रिप चढ़ी है, न आई.सी.यू. में है,
संग ... न कोई नर्स है, न ही कोई डॉक्टर है,
 
अगर कुछ है ... तो ...
पत्तों की छाँव है
कभी ठंडी, तो कभी गर्म हवाएँ हैं
जन लोकपाल
पीपल के पेड़ के नीचे
बेसुध पड़ा है
जान बाकी है ... साँसें चल रही हैं ... जिन्दा है ... ,

पीठ पे
खंजर भौंकने वाले
आज भी हाथों में खंजर लिए
खुलेआम ... घूम रहे हैं
शान से ... मान से ... सम्मान से ... ??? 

~ श्याम कोरी 'उदय'

Tuesday, August 6, 2013

परिवर्तन ...

"सरकारें … निश्चिंत रहें 
हमारी लड़ाई 
तुम्हारे साथ नहीं है, 

हम तो यहाँ 
व्यवस्था परिवर्तन के लिए 
इकटठा हुए हैं, 

और जब हमने 
यह तय कर लिया है 
तो हम, 

हर हाल में 
व्यवस्था परिवर्तन 
करके रहेंगे,… करके रहेंगे !"

Tuesday, July 31, 2012

अनशन ...


पहले तुम -
अपना पेट ठूंस-ठूंस के भर लो !
हमें तो -
आदत है भूखे रहने की ?
अनशन की ... 
हम मरेंगे नहीं, आठ-दस दिनों में !!
पर हाँ, डर है कि - 
कहीं तुम 
भूखे रहने पर 
मर  जाओ, आठ-दस घंटों में ??
तुम्हारे मौन रहने से 
खामोश रहने से 
हम डरेंगे नहीं ... हारेंगे नहीं 
अभी हम - 
लड़ रहे हैं, लड़ रहे हैं, लड़ रहे हैं !!!

Sunday, July 29, 2012

जय हिंद ...

जिस घड़ी वे अपने आँख के चश्मे पे पडी धूल पौंछ लेंगे 'उदय' 
फिर उन्हें, अनशन-आंदोलन में कोई देश-द्रोही नहीं दिखेंगे ?
... 
हौसला तू रख, हमारी जीत होगी 
अभी हम, लड़ रहे हैं - लड़ रहे हैं !
... 
इस बार, लड़ाई... आर-पार की है 
मारेंगे या मर जाएंगे, जय हिंद !! 

Saturday, July 28, 2012

बूढ़े पे हंस रहे हैं ?


कुछ लोग खुश हैं, नाच-गा रहे हैं 
जीत के भ्रम में हैं ... जश्न मना रहे है !
'उदय' ये कैंसे लोग हैं, जो - 
बूढ़े पे हंस रहे हैं ?

यह कहकर, यह सोचकर 
कि - 
मर गया ... आंदोलन !

नहीं ... मरा नहीं है ... 
आंदोलन ... 
कभी ... मर भी नहीं सकता ... 
जब तक भृष्टाचार है, भ्रष्टाचारी हैं ?? 

Thursday, July 26, 2012

जंतर-मंतर ...


टीम अन्ना ... एंड कंपनी ... सिर्फ -
३०० लोकसभा सीटों पे 
चुनाव लड़ने के लिए 
कमर कस ले !

फिर - 
भृष्टाचार 
जनलोकपाल  
कालाधन  
इत्यादि ... सभी समस्याएं ... 
खुद-ब-खुद 
हो जायेंगी "छू-मंतर" !

फिर नहीं पडेगा जाना 
कभी किसी को ... "जंतर-मंतर" 
या फिर - 
हो जाओगे खुद ही ... तुम ... 
तुम ... तुम ... "तितर-बितर" !!

Wednesday, December 21, 2011

रोड़ा ...

नफ़रत के शोले -
दिलों में, दहकने लगे हैं !
कोई है -
जो अमन चाहता ही नहीं है !
न जाने कौन है -
जो राह में रोड़ा बना है !
क्यों है ?
आखिर वो चाहता क्या है ?
सुकूं, चैन, सत्य, अहिंसा से
उसे परहेज क्यों है ??

Friday, December 9, 2011

ए.बी.सी.डी. ... ये क्या लफडा है ??

अरे भाई
कोई बताये, कोई समझाए !
ए.बी.सी.डी. ...
ये अलग अलग ... क्या फार्मूला है ?
क्यों बेफिजूल की बहस है ?
और क्यों बेफिजूल का लफडा है ??

क्या आप और हम
यह नहीं जानते, समझते
कि -
ए. और बी. ... भ्रष्टाचार की जड़ें हैं -
मजबूत तने हैं !
सी. और डी. तो महज -
फल, फूल, पत्ते, टहनियां हैं !!

गर मिटाना ही है भ्रष्टाचार, तो फिर
क्यूँ, किसी को, किसी से अलग रखा जाए
सब को एक सांथ घसीटा जाए
क्या छोटा, और क्या मोटा !
सब के सब, एक ही थाली के 'चटटे-बटटे' हैं !
इसलिए, क्यूँ न -
एक ही 'खलबटटे' में डाल के सबको कूटा जाए !!

छोडो ... ये ... ए.बी.सी.डी. ... का लफडा !
अलग अलग नहीं, वरन
सर्कस की भांति -
इन्हें ... एक ही 'हंटर' से पीटना होगा !
और तो और -
इन्हें ... एक ही 'बरेदी' के हांथों सौंपना होगा !!
वरना -
भ्रष्टाचार की 'बोल बम' होती रहेगी !
और जनता ... खामों-खां बैठ कर रोती रहेगी !!

भ्रष्टाचाररूपी 'दानव' के सिर्फ, हाँथ - पैर नहीं
वरन -
तन, मन, दिल, और दिमाग को भी
एक ही 'आरी' से काटना होगा
वरना -
न तो मरेगा 'दानव', और न मिटेगा 'भ्रष्टाचार' !
कोई बताये, कोई समझाए
अरे भाई ... ए.बी.सी.डी. ... ये क्या लफडा है ??

Sunday, December 4, 2011

वो मान जाएगा ...

आज भी
ऐंसे बहुत से लोग हैं
जो चाहते हैं
कि -
भ्रष्टाचार -
फलता-फूलता रहे !

दुकानें सजी रहें
शो-रूम खुले रहें
चौपाल लगी रहे
मौज होती रहे !

जब
ज्यादा से ज्यादा लोग
यही चाहते हैं
तो कोई जाकर, उसे
समझाता क्यूँ नहीं !

कि -
हमें माफ़ कर दो
हम
भ्रष्टाचार के बगैर
जी नहीं सकते
जीना ही नहीं चाहते !

मान जाएगा बेचारा
कौन-सा
उसे भी कुछ
पीठ पे ले के जाना है
कौन-सा
वो
खुद के लिए लड़ रहा है !

उसे
तो सिर्फ
आने वाली पीढ़ियों की चिंता है
गरीब, असहाय, मजलूमों ...
की चिंता है !

वो मान जाएगा ...
खासतौर पर
उन बुद्धिजीवियों की बात
तो -
वो जरुर मान जाएगा
जो
आज भी, इन हालात में भी
बुद्धिजीवी होकर -
जनलोकपाल के विरोधी हैं !!

Friday, December 2, 2011

धोबी-पछाड़ ...

भ्रष्टाचारी, घुटालेबाज, धोखेबाज
क्या वाकई, ये घमंड में हैं ?
नहीं, इनकी नाक पे घमंड विराजमान है
नहीं यार, ये तो घमंड के पुलिंदे हैं !

इन्हें न तो आग्रह -
न अनुरोध की परवाह है
और न ही -
इन्हें जनभावनाओं की कदर है !

ये तो अपने आप में मस्त हैं
या यूँ कहें मदमस्त हैं !!

इन्हें कोई बात समझाने का -
अगर कोई सही तरीका है , तो वो है -
एक शानदार पटकनी !
जी हाँ -
इन्हें 'धोबी-पछाड़' की जरुरत है !!

लातों के भूत ...

'उदय' तुम किसे समझा रहे हो
छोडो, जाने दो
बाद में देख लेंगे
आज नहीं तो कल, क्या फर्क पड़ता है ?
जहां इतने साल लग गए
वहां साल-दो-साल और सही !
भ्रष्टाचार, घुटाले ...
हाँ, हाँ, बन जाएगा जनलोकपाल !
पर, पहले
हमें इस मुद्दे को छोड़ना होगा !
क्यूँ, किसलिए ?
अरे भाई, समझा करो
वो कहावत नहीं सुनी क्या !!
लातों के भूत, बातों से नहीं मानते !!!
गर सुनी है
तो छोडो अभी बातें-सातें
सब अपनी अपनी लातें मजबूत करो
और कूद जाओ -
सबक सिखाने, मैदान में -
पहले इन्हें सबक सिखाना जरुरी है !!
फिर देखें -
कौन कहता है जनलोकपाल मजबूरी है !!!

Monday, October 17, 2011

बहुत बूढा तो है लेकिन ...

कभी भूखा, कभी प्यासा, समर में आगे बढ़ता है
कभी खामोश रहता है, कभी चिंघाड़ पड़ता है !

सफ़र छोटा या लंबा हो, कभी परवाह नहीं करता
दिलों में आरजू रखकर, कदम मजबूत रखता है !

नहीं रुकता, नहीं थमता, नहीं हटता, वो पीछे है
अदब से बात करता है, गजब की शान रखता है !

तेरी, मेरी, इसकी, उसकी, वो बातें नहीं करता
वतन की आन, मान, शान, पे कुर्बान होता है !

नहीं डरता फिसलने से, संभल के पैर रखता है
बहुत बूढा तो है लेकिन, जवानी जोश रखता है !!

Sunday, October 16, 2011

टीम अन्ना के नाम एक खुला पत्र ...

टीम अन्ना ...
निसंदेह आप अपने प्राथमिक मिशन -
जंतर-मंतर तथा रामलीला मैदान पर जन लोकपाल रूपी मुहीम में सफल रहे हैं ...
किन्तु -
स्वामी अग्निवेश व प्रशांत भूषण रूपी घटनाक्रमों के बीच "टीम अन्ना" कमजोर भी हुई है, यदि यही सुस्त व गैर जिम्मेदाराना चाल चलती रही तो यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि शनै: शनै: टीम अन्ना स्वत: ही कमजोर होते चली जाएगी ...
इसलिए -
ऐंसा मेरा मानना है कि -
टीम अन्ना को चाहिए कि वह अपने "ढाँचे" को मजबूत करे तथा मजबूती के लिहाज से "कोर कमेटी" के सांथ-सांथ कम से कम "तीन या पांच विंग" और तैयार करे तथा अपने छोटे-मोटे अभियानों के अलावा ढांचें को मजबूत करने की दिशा में भी अग्रसर रहे ... टीम अन्ना का कमजोर होना अपने आप में भ्रष्टाचार समर्थक मंसूबों का मजबूत होना है जो देश हित में उचित नहीं है ... जय हिंद !!

Tuesday, October 11, 2011

जन लोकपाल बिल ... बना गले की हडडी !!

एक तरफ कुआ
तो दूजी तरफ खाई है
इसलिए ही
जन लोकपाल के मसले पर
सरकार ने
अनसुनी दिखलाई है !

करते क्या
और क्या न करते
मरना तो लगभग तय है
मान लेने पर
जेल जाने का भय है
तो न मानने पर
हार जाने का संकट तय है !

जन लोकपाल बिल
गले की हडडी बन गई है
न उगल पाने
और न निगल पाने का
संकट गहरा रहा है
और न ही कोई
संकटमोचक नजर आ रहा है !

हे राम ! अब क्या करें
कहीं ऐंसा न हो
न घर के रहें
और न ही घाट के
जन लोकपाल के चक्कर में
राज-पाट न छिन जाए
और तो और, कहीं
घाट घाट का
पानी न पीना पड़ जाए !!

Monday, September 5, 2011

एक चिटठी अन्ना हजारे के नाम ...

अन्ना जी, अरविंद जी
जय हिंद
१ - "राईट टू रिजेक्ट" के सांथ सांथ आपके एजेंडे में एक सुझाव और शामिल करने हेतु आग्रह है -
"एक व्यक्ति एक स्थान से ही चुनाव लड़ सके, अक्सर देखा गया है कि कुछेक प्रत्याशी ( मंजे हुए नेता जिन्हें चुनाव हारने का भय होता है ) २-२, ३-३ चुनाव क्षेत्रों से नामांकन दाखिल कर चुनाव लड़ते हैं तथा कहीं-न-कहीं से तिकड़म कर चुनाव जीत जाते हैं ! नए प्रस्तावित प्रावधान के तहत ऐसा होना चाहिए कि - एक व्यक्ति सिर्फ एक स्थान से ही चुनाव लड़ सके, ऐसी स्थिति में खुद को बहुत बड़ा नेता समझने वाले नेताओं को वास्तविक जनाधार का सामना करना पडेगा जो लोकतंत्र के लिए सकारात्मक व हितकर होगा !"
२ - सांथ ही सांथ एक मुद्दा और - यदि कोई भी चुनाव जीता हुआ प्रत्याशी विधायक / सांसद अपने पद पर रहते हुए पुन: कोई भी आगामी या मध्यावधि चुनाव लड़ना चाहता है तब उसे अपने वर्त्तमान पद सांसद / विधायक से सर्वप्रथम 'रेजिगनेशन' देना आवश्यक कर दिया जाए, इसके पश्चात ही वह चुनाव लड़ सके ! ऐसी स्थिति में 'रेजिगनेशन' देने उपरांत उस "पर्टीकुलर सीट" पर कोई मध्यावधि चुनाव न हो, जो पिछले चुनाव में निकटतम प्रत्याशी रहा हो उसे ही आगामी निर्धारित चुनाव तक के लिए "विधिवत चुना हुआ जन प्रतिनिधी" संवैधानिक रूप से घोषित कर दिया जाए ! इस प्रस्तावित प्रक्रिया के पालन से यह होगा कि जनमत का सम्मान बना रहेगा तथा बेवजह जन्में मध्यावधि चुनाव के बोझ से सरकार व जनता दोनों बचे रहेंगे, परिणाम स्वरूप लालच में आकर कोई भी जीता हुआ प्रत्याशी जन भावनाओं के सांथ खिलवाड़ नहीं कर सकेगा!
३- सांथ ही सांथ "राईट टू रिकाल" रूपी मुद्दा पुनर्विचार योग्य है !
उक्त मुद्दे जनहित में विचार हेतु ...
शेष कुशल !
शुभकामनाएं, जय हिंद !!

Sunday, September 4, 2011

राजाओं के राजा !!

हम तो कह रहे हैं
आओ, चलो, लड़ लो, भिड़ लो
चुनावी अखाड़े में ...
पर
ये -
अनशन
आन्दोलन
नारेबाजी
भीडबाजी
चक्कर
घनचक्कर
जंतर-मंतर
रामलीला मैदान
जन लोकपाल बिल
पास-फ़ैल
अच्छी बात नहीं न है !

रोज-रोज
हमें
डराते-धमकाते फिरते हो -
कालेधन
विदेशी बैंक
भ्रष्टाचार
जन लोकपाल
राईट टू रिजेक्ट
राईट टू रिकाल
जनसंसद
ये नौकर - हम राजा
जैसे, दांव-पेंच, फार्मूले, टिका-टिका कर !

चलो, माना, मान लेते हैं
कि -
तुम, सही हो
सही हो तो इसका मतलब ये तो नहीं है
कि -
तुम, हमें
सुबह-शाम, रात-दिन, हर पहर
यूं ही, डराते-धमकाते ...
गर
दम-ख़म है
तो आओ, आ जाओ
लड़ने को, पटका-पटकी को
हम तैयार हैं, चुनावी अखाड़े में ...
तुम राजा हो, तो हम भी, राजाओं के राजा हैं ... !!

Thursday, September 1, 2011

भीड़ बनाम मुद्दों की राजनीति !

हमारे देश में दिन व दिन बढ़ रही आबादी हमें कहाँ लेकर जायेगी अभी यह स्पष्ट नहीं है किन्तु यह तो जान ही पड़ता है कि यह बढ़ती आबादी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं को निसंदेह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्षतौर पर सपोर्ट कर रही है, मेरे कहने का तात्पर्य बहुत ही सीधा व सरल है कि यह बढ़ती आबादी मुद्दा विहीन राजनैतिक महात्वाकांक्षी व्यक्तित्व को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी राजनीति को हरा-भरा रखने में बेहद सहायक है अर्थात जिन राजनैतिक व्यक्तित्वों व दलों के पास सार्थक व प्रभावी मुद्दे नहीं हैं वे भी अपने छोटे-मोटे प्रयासों से भीड़ जमा करने में सफल हो जाते हैं ! अब इस भीड़ के जमा होने के पीछे कोई ठोस बजह नहीं होती सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस भीड़ के पीछे बढ़ती आबादी और बेरोजगारी एक बजह मानी जा सकती है या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आर्थिक मैनेजमेंट के आधार पर भी यह भीड़ इकट्ठा की जा रही है ! यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि यदि राजनैतिक व्यक्तित्वों के निकटतम नुमाइंदे भीड़ जुटाने का प्रयास जोर-शोर से न करें तो संभव है राजनैतिक व्यक्तित्वों व दलों की जगहंसाई हो जाए, यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि ऐसा मेरा व्यक्तिगत आंकलन है कि यदि भीड़ जुटाने के लिए धन व व्यक्तिगत संसाधनों का प्रयोग न हो तो भीड़ जुटा पाना बेहद कठिन होगा क्योंकि वर्त्तमान में बड़े से बड़े राजनैतिक नैतृत्व मुद्दों की नहीं वरन भीड़ की राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं !

यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि मेरा मकसद किसी भी राजनैतिक व्यक्तित्व या राजनैतिक दल को आहत करने का नहीं है वरन वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व का ध्यान भीड़ बनाम मुद्दों की राजनीति की ओर आकर्षित करने का है, मैं यह भी भलीभांति जानता और महसूस करता हूँ कि वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व भी यह भलीभांति जानते व समझते हैं ! इन गंभीर हालात में भी यदि राजनैतिक नैतृत्व व राजनैतिक दलों के एजेंडों में अमूल-चूल बदलाव नहीं आता है तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता का इन दलों पर से विश्वास पूर्णत: उठ जाए, आम जनता का वर्त्तमान राजनैतिक कार्य प्रणाली से दिन व दिन उठ रहा विश्वास बेहद चिंतनीय ही कहा जा सकता है ! वर्त्तमान राजनैतिक सोच व जनमानस की सोच में बढ़ रहा अविश्वास आने वाले दिनों में गंभीर राजनैतिक व सवैधानिक बदलाव को इंगित कर रहा है यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि अब समय आ गया है कि वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व गंभीरतापूर्वक चिंतन व मनन कर उपयोगी कदम उठाएं !

एक ओर जहां राजनैतिक व्यक्तित्वों व राजनैतिक दलों को भीड़ जुटाने के लिए आर्थिक मैनेजमेंट का सहारा लेना पड़ता है अर्थात लोगों के घर घर तक गाडी पहुंचवा कर तथा आने-जाने के समय भीड़ की व्यक्तिगत जरूरतों का भी ख्याल रखते हैं तब कहीं जाकर उतनी भीड़ इकट्ठी हो पाती है जिससे वे जगहंसाई से बच सकें ! वहीं दूसरी ओर जन लोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे के नैतृत्व में आयोजित आन्दोलन अपने आप में एक मिसाल हैं जिनमें लोगों की भीड़ खुद-ब-खुद उमड़ रही थी, एक दिन - दो दिन नहीं वरन आन्दोलन के अंतिम पड़ाव तक लोगों का हुजूम देखते बन रहा था, इन दोनों आन्दोलनों ने - चाहे वह जंतर-मंतर का हो या रामलीला मैदान का, यह स्पष्ट कर दिया है कि लोगों की भीड़ या दूसरे शब्दों में कहें जनसैलाव किसी प्रायोजित कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था वरन एक गंभीर मुद्दे को लेकर संजीदा लोगों का स्वस्फूर्त समर्थन था, भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल रूपी क़ानून की मांग को लेकर जो जनसैलाव देखने को मिला वह निश्चित ही एक ऐतिहासिक अध्याय कहा जा सकता है ! वर्त्तमान राजनैतिक नैत्रत्वों व दलों को यह मनन व चिंतन करना ही होगा कि अब समय भीड़ की राजनीति का नहीं वरन मुद्दों की राजनीति का आ गया है तथा इस दिशा में सकारात्मक पहल ही आवश्यकता है जो न सिर्फ राजनैतिक दलों वरन लोकतंत्र के लिए भी प्रभावकारी व हितकर है !

अन्ना टोपी !

अभी
इनकी नश-नश में
फितरत में
कूट-कूट के भरी है
आदत
टोपीबाजी की !

शायद, इन्हें
यह कला
गुरु-शिष्य रूपी
परम्परा में
विरासत में मिल रही है !

ये जब भी
ज्वाईन करते हैं
राजनीति -
राजनैतिक पार्टी
तब, इन्हें
पहनाई जाती है, टोपी !

अब, जब
पहन ही ली टोपी
इन्होंने
तो समझ लो
मिल गई इन्हें, कला
विरासत में
टोपीबाजी की !

नहीं
ये बाज नहीं आएंगे
खुद--खुद
टोपीबाजी से
कौन !
अपने नेता
तब तक, जब तक
कोई इन्हें
अन्ना टोपी का
पाठ नहीं पढ़ायेगा !!

Monday, August 29, 2011

'राईट टू रिजेक्ट' रूपी कदम निसंदेह लोकतंत्र को मजबूत करेगा !

लोकतांत्रिक प्रणाली की सर्वाधिक मजबूत व सशक्त व्यवस्था यदि कोई है तो निसंदेह स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली है, स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया निश्चित ही हमारे लोकतंत्र को मजबूती प्रदाय करती है, ये और बात है कि इस मजबूत प्रणाली को भी छल, बल व प्रलोभन के आधार पर प्रभावित किया जा सकता है यह भी कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि जन समुदाय को छल, बल व प्रलोभन के आधार पर प्रभावित किया जाता रहा है, किया जा रहा है लेकिन फिर भी स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली हमारे संविधान की सशक्तता की एक बेहद प्रभावशाली व बेहतरीन मिशाल है !

स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली के माध्यम से जनता को अपने प्रतिनिधी चुनने का विशेषाधिकार प्रदाय किया गया है यह अधिकार इतना सशक्त व प्रभावी है कि समय समय पर अर्थात एक नियमित व निर्धारित अंतराल के बाद जनता स्वयं अपने लिए अपने पसंद का प्रतिनिधी चुन सकती है, सांथ ही सांथ यह भी प्रावधान है कि यदि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधी से संतुष्ट नहीं है तो वह एक निर्धारित समयावधि के बाद उन्हें स्वमेव बदल सकती है, किन्तु इस बदलाव के लिए एक निर्धारित समय सीमा का इंतज़ार करना पड़ता है जो पांच साल बाद की होती है अर्थात आगामी चुनाव में ही बदलाव संभव होता है !

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई चुना हुआ प्रतिनिधी जन भावनाओं पर खरा नहीं उतरता है तब जनता को उसे हटाने अर्थात बदल देने का अधिकार मिलता है किन्तु वह अधिकार अगले चुनाव अर्थात पांच साल बाद ही मिलता है, इन पांच सालों तक वह चुना हुआ प्रतिनिधी अपने आप में स्वतंत्र होता है यदि वह चाहे तो जन भावनाओं का आदर करे, और न चाहे तो वह जन भावनाओं को नजर अंदाज कर दे ! इन परिस्थितियों में यह चुनाव प्रणाली अपने आप में सवालिया निशान खडा कर देती है, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जब एक जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधी चुनाव जीतने के बाद खुद की मर्जी का मालिक हो जाए, दूसरे शब्दों में कहें तो 'बेलगाम घोड़ा' हो जाए तब निसंदेह वह चुना हुआ प्रतिनिधी 'लोकतंत्र रूपी बगिया' को चौपट ही करेगा !

निसंदेह इन परिस्थितियों में वह चुनाव जीता हुआ प्रतिनिधी जन भावनाओं का खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ायेगा, उस चुने हुए प्रतिनिधी का यह व्यवहार निश्चित ही स्वतन्त्र, निष्पक्ष व मजबूत लोकतंत्र के नजरिये से भी अहितकर होगा, यहाँ यह कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि वर्त्तमान में ऐसे हालात देखने व सुनने को मिल रहे हैं ! इन विकट परिस्थितियों के बारे में, इन विकट परिस्थितियों के लिए, हमें आज से ही घोर व सशक्त विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है, यदि समय रहते विचार-विमर्श कर सार्थक कदम नहीं उठाये गए तो निसंदेह हमारा लोकतंत्र दिन-व-दिन कमजोर होगा !

इस मुद्दे के सांथ सांथ एक और मुद्दा आज-कल लोगों के जेहन में उमड़ रहा है वह मुद्दा यह है कि इस स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव प्रणाली में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि यदि चुनाव लड़ रहे सारे के सारे प्रत्यासियों में से, यदि कोई भी प्रत्यासी, मतदाता को पसंद नहीं है तब वह क्या करे अर्थात वह कौन-सा रास्ता चुने, मतदान में हिस्सा न लेने का या उपलब्ध प्रत्यासियों में से ही किसी प्रत्यासी को चुन लेने का, यहाँ पर मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि इन हालात में 'अंधों में काणे को राजा बनने' का सुअवसर मिल जाएगा तात्पर्य यह है जनता न चाहकर भी किसी न किसी के पक्ष में मतदान कर चुनाव जितवा देगी, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, ये परिस्थितियाँ निसंदेह निरंतर लोकतंत्र को कमजोर करेंगी !

लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में यह भी प्रावधान होने चाहिए कि मतदान के समय जनता अर्थात मतदाता को जब कोई भी प्रत्यासी योग्य व उचित प्रतीत न लगे तब जनता अर्थात मतदाता उस प्रत्यासी या उन प्रत्यासियों को मतदान के समय ही 'रिजेक्ट' कर दे, यहाँ पर मेरे कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि जनता के पास 'राईट टू रिजेक्ट' के रूप में संवैधानिक अधिकार होना चाहिए, मैं यहाँ यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि यह प्रावधान आने से लोकतंत्र की गरिमा धूमिल नहीं होगी वरन लोकतंत्र और भी सशक्त, प्रभावी व आकर्षक होगा, यह प्रणाली हमारे लोकतंत्र को, हमारे संविधान को, हमारे देश को दुनिया के मंच पर बेहद प्रखर व सशक्त रूप में प्रस्तुत करेगी !

मैं यह नहीं कहता कि जिन जनमानस के जेहन में यह विचार उमड़ रहे हैं उसके पीछे उनका कोई निहित स्वार्थ भी समाहित होगा, शायद कतई नहीं, मेरा तो इस मुद्दे पर व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि 'राईट टू रिजेक्ट' का प्रावधान शीघ्र-अतिशीघ्र अमल में लाना लोकतंत्र को मजबूत करेगा ! आयेदिन हम देखते हैं, महसूस करते हैं कि वर्त्तमान में जो प्रत्यासी चुनाव मैदान में होते हैं उनकी व्यवहारिक व सामाजिक छबि कितनी सकारात्मक व नकारात्मक होती है, इन हालात में न चाहते हुए, न चाहकर भी, ऐसे प्रत्यासी चुनाव जीत कर आ जाते हैं जो अपने आप में एक सवालिया निशान होते हैं, खैर यह मुद्दा बहस व चर्चा का नहीं है और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि आज अगर चर्चा होनी चाहिए तो 'राईट टू रिजेक्ट' पर होनी चाहिए क्योंकि यह वक्त की मांग है, वक्त की जरुरत है, इस मुद्दे पर मेरा व्यक्तिगत मानना है कि 'राईट टू रिजेक्ट' रूपी कदम अर्थात प्रावधान निसंदेह लोकतंत्र को मजबूत करेगा !

Saturday, August 27, 2011

सच ! ये कैसा आदमी है !!

लोग कहते हैं
चौहत्तर साल का बूढा है
सातवीं-आठवीं पास है
गाँव का आदमी है
मंदिर में सोता-जगता है
बहुत, सीधा-सरल
दयालु-कृपालु स्वभाव का है
उसे अपनी नहीं
समाज की, देश की चिंता है
इसी चिंता के लिए
वह, भ्रष्टाचार से
लड़ रहा है, अड़ रहा है !
सच ! ये कैसा आदमी है !!

जिसे अपनी नहीं
जनमानस की चिंता है !
ये कैसा कलयुग है
शायद
कलयुग नहीं, हमारा भ्रम है !
आओ, देखो, चलो
कैंसे, एक अकेले, बूढ़े -
और जज्बाती अन्ना ने
दृढ निश्चय कर
आगे कदम बढाया है
सच ! ये कैसा आदमी है !!

जिस भ्रष्टाचार से
आप, हम, सब, सारे लोग
परेशां, हैरान, त्रस्त हैं !
उसी भ्रष्टाचार को
ध्वस्त करने
वह
अड़ गया है, भिड़ गया है !
आज
चारों ओर, यही नारा गूँज रहा है
तू भी अन्ना -
मैं भी अन्ना -
आज सारा देश है अन्ना !
सच ! ये कैसा आदमी है !!