Thursday, February 18, 2010

लालची बुढडा

एक महाशय के घर पडौस के गांव से एक परिवार लडकी देखने आया, लडके व उसके माता-पिता का शानदार स्वागत किया गया, बडी लडकी जिसकी शादी की बात चल रही थी वह ही "सझी-संवरी" मिष्ठान इत्यादि परोस रही थी इसी दौरान लडका-लडकी का आपस मे परिचय कराया गया, इसी बीच छोटी लडकी भी चाय का ट्रे लेकर पहुंच गई, वह ट्रे को मेज पर रखकर अभिवादन स्वरूप हाथ जोडकर बैठ गई, स्वल्पाहार व बातचीत चलती रही, इसी बीच लडके व उसके मा-बाप की नजर बार-बार छोटी लडकी पर जा रही थे उसका कारण ये था कि बडी लडकी थोडी सांवली व दुबली थी और छोटी लडकी गोरी व खूबसूरत थी, स्वल्पाहार के पश्चात दोनो परिवार एक-दूसरे से विदा हुए, मेहमानों का हाव-भाव व चेहरे की प्रसन्नता देखकर रिश्ता पक्का लग रहा था इसलिये लडकी का पूरा परिवार खुश था किंतु हां-ना का जबाव नहीं मिला था।

एक-दो दिन बाद लडकी का पिता पडौस के गांव लडके के घर गया, शानदार हवेली थी काफ़ी अमीर जान पड रहे थे लडके व उसके माता-पिता ने बहुत अच्छे ढंग से स्वागत किया और बोले हमें आपके साथ रिश्तेदारी मंजूर है लेकिन एक छोटी सी समस्या है मेरे लडके को आपकी छोटी लडकी पसंद है और उसी से शादी करूंगा कह रहा है। लडकी का पिता प्रस्ताव सुनकर थोडी देर के लिये सन्न रह गया ...... फ़िर बैठे-बैठे ही मन के घोडे दौडाने लगा ..... लडका अच्छा है .....अमीर परिवार है ..... हवेली भी शानदार है .... व्यापार-कारोबार भी अच्छा है ...बगैरह-बगैरह ... उसने परिवार के सदस्यों की राय लिये बगैर ही छोटी लडकी के साथ शादी के लिये हां कह दी ........ हां सुनते ही खुशी का ठिकाना न रहा .... गले मिलने व जोर-शोर से स्वागत का दौर चल पडा ..... खुशी-खुशी विदा होने लगे ..... लडके के पिता ने लडडुओं की टोकरी व वस्त्र इत्यादि भेंट स्वरूप घर ले जाने हेतु दिये।

खुशी-खुशी लडकी का पिता घर पहुंचा रिश्ता तय होने की खुशी मे सबको मिठाई खिलाई ..... पूरा परिवार खुशी से झूम गया .... छोटी बहन-बडी बहन दोनों खुश थे गले लग कर छोटी ने बडी बहन को बधाई दी .......सब की खुशियां देख बाप ने थोडा सहमते हुए सच्चाई बताई ...... सच्चाई सुनकर सन्नाटा सा छा गया ........ दो-तीन दिन सन्नाटा पसरा रहा .... जब सन्नाटा टूटा तो "लालची बुढडे" का चेहरा गुस्से से तिलमिला गया उसे शादी की खुशियां "ना" मे बदलते दिखीं ..... छोटी लडकी ने शादी से साफ़-साफ़ इंकार कर दिया .......परिवार के सभी इस रिश्ते के खिलाफ़ हो गये।

.....दो-तीन घंटे की गहमा-गहमी के बाद भी कोई बात नहीं बनी तब "लालची बुढडा" गुस्से ही गुस्से में घर से बाहर निकल गया ......... कुछ दूरी पर ही वह मुझसे टकरा गया ....... मैंने कहा क्या बात है भाई, गुस्से मे क्यों चेहरा लाल-पीला किये घूम रहे हो ........ उसने धीरे से सारा किस्सा सुनाया ..... देखो भाई साहब घर बालों ने मेरी "जुबान" नहीं रखी ..... मेरी इज्जत डुबाने में तुले हैं .... कितना अमीर परिवार है अब मैं उन्हे क्या जबाब दूंगा .... उसकी बातें सुनते-सुनते ही मेरे मन में ये विचार बिजली की तरह कौंधा ..... क्या "लंपट बाबू "है, लालच मे बडी की जगह छोटी लडकी की शादी तय कर आया ..... ।

...........अब क्या कहूं मुझसे भी रहा नहीं जाता कुछ-न-कुछ "कडुवा सच" मेरे मुंह से निकल ही जाता है ....... मैने कहा ..... दो-चार दिन के मेहमान हो, वैसे भी एक पैर "कबर" में है और दूसरा "कबर" के इर्द-गिर्द ही घूमते रहता है ... लालच मे मत पडो कोई दूसरा अच्छा लडका मिल जायेगा .....कहीं ऎसा होता है कि बडी की बात चल रही हो और कोई छोटी के लिये हां कह दे ..... घर जाओ, जिद छोडो बच्चों की हां मे ही "हां" है और "खुशी मे ही खुशी" ।

( श्री ललित शर्मा जी द्वारा "लालची बुढडा" की चर्चा अपने ब्लाग मैं तुझ जैसों के मुँह नहीं लगता-चक्कर घनचक्कर "चिट्ठी चर्चा" (ललित शर्मा) की गई है, बहुत बहुत आभार। )


( श्री मनोज कुमार जी द्वारा "लालची बुढडा" की चर्चा अपने ब्लाग "किसी दूसरेके अंदर के जानवर को उकसा कर न जगाएं" की गई है, बहुत बहुत आभार। )

20 comments:

Suman said...

nice

मनोज कुमार said...

लालची लोगों की असलियत को उजागर करने के लिए जो आपने यह रचना की है बहुत अच्छी लगी।

ali said...

श्याम भाई
इसका एक पक्ष ये भी है कि उसे "जिम्मेदारियों" से उऋण होना था अब जो भी पहले हो जाये वर्ना 'वर पक्ष की संपत्ति' तो बड़ी लड़की से सम्बन्ध बनाते समय भी थी ही ! जहां तक लड़की के चयन का प्रश्न है वो वर ने किया ! पिता को तो इस घर में लड़की देना ही थी ! पिता नें संपत्ति देखी तो अपनी पुत्री के हित में इस अर्थ में वह लालची नहीं है ! हाँ उससे एक गलती जरुर हुई है वो ये कि उसे बदले हुए प्रस्ताव पर अकेले हाँ कहने से पहले परिजनों से चर्चा करनी चाहिये थी !

ललित शर्मा said...

शादी जैसे वि्षय पर पुरे परिवार की राय लेना ही ठीक होता है क्योंकि यह रिश्ता जीवन से मरण तक जु्ड़ा होता है।

arvind said...

...........अब क्या कहूं मुझसे भी रहा नहीं जाता कुछ-न-कुछ "कडुवा सच" मेरे मुंह से निकल ही जाता है .
श्याम भाई,
बहुत अच्छी रचना

रश्मि प्रभा... said...

aise logon ko aapne jo katu satya sunaya hai, wah tareefe kabil hai

राज भाटिय़ा said...

नही मै इसे लालची नही कहुंगा, एक बाप ओर वो भी जवान लडकियो का अपनी बच्चियो की भलाई ही सोचेगा, हां उसे हां करने से पहले अपने परिवार मै आ कर बात करनी चाहिये थी, इस बुजुर्ग कि जगह अगर मै होता तो शायद मै भी एक दम से ना नही करता, अगर आप होते तो क्या करते??

अमिताभ श्रीवास्तव said...

raaj bhatiya ji ne kuchh kahaa he..gour kiya jana behatar he..kher.., rachna sandarbh aour praasangik he.

डॉ टी एस दराल said...

इसे एक लाचार बाप की मजबूरी ज्यादा कहेंगे।
हालाँकि घर में सलाह मिलाना चाहिए था।
शदी ब्याह बड़े नाज़ुक मामले होते हैं, भाई।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

सतीश सक्सेना said...

डॉ दाराल से सहमत हूँ ...

वन्दना said...

aisi paristhitiyan kai bar kai gharon mein aati hain aur kai baar aisa suna hai .........kya kahein , sirf itna hi kah sakti hun ki agar ghar wale aur ladki bhi raji ho tabhi aisa koi nirnay lena chahiye aur agar sabki sahmati na ho to nhi lena chahiye kyunki aise palon mein badi ladki ke dil par kya gujarti hai ye har koi nahi samajh sakta.........uska dukh us waqt sabse oopar hota hai jise kehna namumkin hai.

sangeeta swarup said...

yahan lalach dikha diya gaya hai warna ek ladaki ke pita ko bahut kuchh sochna padta hai....yahi hamaare samaaj ki niyati hai..

प्रकाश पाखी said...

श्याम जी,
कहानी अच्छी लगी पर लड़की के बाप को लालची बुड्ढा कहना उचित नहीं लगा..हाँ अगर लड़की का बाप पैसे लेकर बड़ी की जगह छोटी लड़की का कोई अनमेल विवाह करने की हाँ भरता तो उसे लालची कहा जा सकता है...पर इसमें तो बाप अपनी बेटी के लिए सम्पन्न और खुशहाल घर में रिश्ता करने की इच्छा रख रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है...हो सकता है अपनी छोटी लड़की के लिए जब वह रिश्ताढूंढें तो ऐसा घर नहीं मिले..
खैर कहानी तो लेखक की मर्जी पर चलती है..

निर्मला कपिला said...

कहानी का प्रवाह अच्छा लगा मगर पाखी जी की बात से सहमत हूँ। फिर भी कहानी लिखते हुये कई बार लेखक का उद्देशय कुछ और होता है परंपराओं से हट कर वो कुछ कहना चाहता है। शायद आपने भी वही कहना चाहा है। धन्यवाद्

रचना दीक्षित said...

कहानी अच्छी और वास्तविकता भी है. जाने कितने ही घरों में ऐसा हो भी चुका होगा. पर एक सत्य या ये कहें की कटु सत्य तो ये है ही की हमारे देश में लड़कियों के नाम पर तो रंग भेद है और था .इसको हवा देने देने में गोरेपन की क्रीम और टी वी का बहुत बड़ा हाथ है. जबकि सच तो ये है "सब रंग कच्चा पर सांवरिया रंग पक्का " .

Apanatva said...

bahut accha sandesh detee kahanee.........

Apanatva said...

bahut accha sandesh detee kahanee.........

Apanatva said...

bahut accha sandesh detee kahanee.........

APNA GHAR said...

ek achcha ,sandesh de rahi hai kahani jaha baap kee majboori jab choti ho jyad sunder to rakhiye badi ko dewkhne aaye wakt rakhiye doori buddha laalchi nahi uski bhi hogi koi majboori thank ASHOK KHATRI BAYANA DIST BHARATPUR RAJASTHAN