Wednesday, April 14, 2010

... कौन कहता है नक्सलवाद एक विचारधारा है !!!

कौन कहता है नक्सलवाद समस्या नहीं एक विचारधारा है, वो कौनसा बुद्धिजीवी वर्ग है या वे कौन से मानव अधिकार समर्थक हैं जो यह कहते हैं कि नक्सलवाद विचारधारा है .... क्या वे इसे प्रमाणित कर सकेंगे ? किसी भी लोकतंत्र में "विचारधारा या आंदोलन" हम उसे कह सकते हैं जो सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखे .... कि बंदूकें हाथ में लेकर जंगल में छिप-छिप कर मारकाट, विस्फ़ोट कर जन-धन को क्षतिकारित करे

यदि अपने देश में लोकतंत्र होकर निरंकुश शासन अथवा तानाशाही प्रथा का बोलबाला होता तो यह कहा जा सकता था कि हाथ में बंदूकें जायज हैं ..... पर लोकतंत्र में बंदूकें आपराधिक मांसिकता दर्शित करती हैं, अपराध का बोध कराती हैं ... बंदूकें हाथ में लेकर, सार्वजनिक रूप से ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर बता कर फ़ांसी पर लटका कर या कत्लेआम कर, भय दहशत का माहौल पैदा कर भोले-भाले आदिवासी ग्रामीणों को अपना समर्थक बना लेना ... कौन कहता है यह प्रसंशनीय कार्य है ? ... कनपटी पर बंदूक रख कर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, कलेक्टर, एसपी किसी से भी कुछ भी कार्य संपादित कराया जाना संभव है फ़िर ये तो आदिवासी ग्रामीण हैं

अगर कुछ तथाकथित लोग इसे विचारधारा ही मानते हैं तो वे ये बतायें कि वर्तमान में नक्सलवाद के क्या सिद्धांत, रूपरेखा, उद्देश्य हैं जिस पर नक्सलवाद काम कर रहा है .... दो-चार ऎसे कार्य भी परिलक्षित नहीं होते जो जनहित में किये गये हों, पर हिंसक वारदातें उनकी विचारधारा बयां कर रही हैं .... आगजनी, लूटपाट, डकैती, हत्याएं हर युग - हर काल में होती रही हैं और शायद आगे भी होती रहें .... पर समाज सुधार व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन के लिये बनाये गये किसी भी ढांचे ने ऎसा नहीं किया होगा जो आज नक्सलवाद के नाम पर हो रहा है .... इस रास्ते पर चल कर वह कहां पहुंचना चाहते हैं .... क्या यह रास्ता एक अंधेरी गुफ़ा से निकल कर दूसरी अंधेरी गुफ़ा में जाकर समाप्त नहीं होता !

नक्सलवादी ढांचे के सदस्यों, प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे बुद्धिजीवियों से यह प्रश्न है कि वे बताएं, नक्सलवाद ने क्या-क्या रचनात्मक कार्य किये हैं और क्या-क्या कर रहे हैं ..... शायद वे जवाब में निरुत्तर हो जायें ... क्योंकि यदि कोई रचनात्मक कार्य हो रहे होते तो वे कार्य दिखाई देते.... दिखाई देते तो ये प्रश्न ही नहीं उठता .... पर नक्सलवाद के कारनामें ... कत्लेआम ... लूटपाट ... मारकाट ... बारूदी सुरंगें ... विस्फ़ोट ... आगजनी ... जगजाहिर हैं ... अगर फ़िर भी कोई कहता है कि नक्सलवाद विचारधारा है तो बेहद निंदनीय है।

10 comments:

देवेश प्रताप said...

बिल्कुल सही कहा आपने नक्सलवाद एक विचारधारा हो ही नहीं सकता .....

Udan Tashtari said...

विचारणीय आलेख!

arvind said...

विचारणीय लेख,......... किन्तु अव्यवहारिक किताबी बातें लगती है.नक्सल्वाद का समर्थन अनुचित है-यह सत्य है लेकिन यह भी सत्य है कि उनकी बात सुनने के लिये कोई भी तैयार नहीं है.

zeal said...

Its like cycle of life and death. After being developed to a certain level, human beings are moving towards 'aadi-kaal'.

Population explosion is the cause and education is the solution.

Insensitive government, is the real culprit.

girish pankaj said...

theek dishaa men soch kar likhaa gayaalekh, chhotaa hai, magar saargarbhit hai..kabhi raipur aao to milanaa bhai...

arun c roy said...

सर आपका केहना बिलकुल ठीक है लेकिन आजादी के ६० साल बाद भी रोशनी नही पाहुच्ने का हिसाब कौन देगा... नाक्साल समस्या वही है जहा सरकार नही पहुच सकी है ... क्या कोई सोच रहा है इस तरफ... शायद कोई नही... पीस तो रहे बेचारे आदिवासी है

BrijmohanShrivastava said...

लेख चिंतन योग्य है

संजय भास्कर said...

विचारणीय लेख,...

श्याम कोरी 'उदय' said...

अरविंद जी
एक तरफ़ विचारणीय लेख ... वहीं दूसरी तरफ़ अव्यवहारिक किताबें बातें!! .... एक तरफ़ समर्थन अनुचित ...वहीं दूसरी तरफ़ उनकी कोई सुन नहीं रहा !!! ....... "चित भी मेरी - पट भी मेरी" .... आपकी टिप्पणी से यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि आप इधर हैं या उधर ?

Pvs Rao said...

उदय कोरी जी नक्सलवाद और विचारधारा की विवेचना किये बिना ही आपने राय व्यक्त किया इसलिये लेख अधूरा/एकतरफा लगता है. 60 साल से ज्यादा हो गये हैं आजादी को, आपको नहीं लगता कि देश की प्रगति शहरी क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गयी है? क्यों ऐसा होता है की जहाँ प्राकृतिक खनिज और सम्पदा प्रचुर मात्रा में है, उद्योग वहाँ नहीं लगते हैं, वहाँ के लोगों के जीवन क स्तर ऊँचा नहीं होता है और कुछ नये उद्योगपति/करोडपति पैदा हो जाते हैं और ध्यान से सोचने पर लगता है कि यहाँ सब कुछ एक सामंतवादी सोच की देन है. किसी विचारधारा के समर्थन या विरोध की बात नही है. किंतु सत्य और यथार्थ को अपने अपने नजरिये से जानने और अपने हक के लिये लडने का अधिकार तो सबको है