Monday, July 18, 2011

बेजान कमरा ...

हे यमदूतो
मेरी प्रार्थना सुनकर
तुम, चुप-चाप, चले आओ
मुझे, तुम्हारा इंतज़ार है !

इस ऊंची हवेली के
पीछे बने, बेजान कमरे में !

मैं, ज़िंदा हूँ अभी
शायद, ज़िंदा रहूँगा, मरुंगा नहीं
तुम्हारे आने तक !

पर तुम, देर न करो, आने में
जल्दी, जल्दी, और जल्दी आ जाओ
मुझे
अपने सांथ ले जाकर
किसी शांत, एकांत कब्रिस्तान में
दफ्न कर दो, मार कर, या जीते जी !

क्यों, क्योंकि
अब मेरा दम घुटने लगा है
मेरी ही बनाई हुई, बनवाई हुई
इस आलीशान हवेली के
पीछे बने, इस बेजान कमरे में !

शायद अभी भी मेरे बेटे-बहु
जश्न मना रहे होंगे, अकेले अकेले
मुझे -
इस बेजान कमरे में अकेला छोड़कर !!

4 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

समय की बलिहारी है ..

संजय भास्कर said...

...खूबसूरत अंदाज.... सुन्दर प्रस्तुति , बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

भयावह सच।

वन्दना said...

कडवी सच्चाई।