नंगे आये थे
सब यहाँ छोड़
नंगे चले जाना है !
............
है खबर सबको
दौलतें छूट जायेंगी
लालच में डूबे हुए हैं !
............
गरीब भूखा है
रोटी मिलेगी
दुआ जरुर देगा !
............
समेटेंगे छिपा रहेगा
बांटेंगे काम आयेगा
मन को खुशियाँ मिलेंगी !
............
मेहनत की रोटी
पेट भर देती है
नींद आ जाती है !
............
मजहबी बातें
दीवारें बन रही हैं
और इंसान खौफजदा !
............
रियासतें - सियासतें
कोठियां और महल
खंडहर हो गए हैं !
............
लड़ाई भी चलेगी
और चलते रहेगी
हम इंसान जो हैं !
............
थे जानवर पहले
लड़ना, घूरना, गुर्राना
कैसे भूल जाएँ !
............
नक़्शे, सरहदें व देश
सब ज्यों के त्यों रहेंगे
बस इंसान गुजरते रहेंगे !!!
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Wednesday, December 8, 2010
Tuesday, December 7, 2010
खा रहे रोटी वतन की, कर रहे सौदा वतन का !
अब चंद लम्हें भी, सदियों से हो चले हैं
छाने लगा है जूनून जीने का लम्हे लम्हे में !
.........................................
चलो अच्छा हुआ जो तुम, खिड़की से नीचे उतर आये
बिना दीदार कड़कती ठंड में, शायद हम ठिठुर जाते !
.........................................
कहाँ उलझे रहें हम, मिलने बिछड़ने के फसानों में
चलो दो-चार पग मिलकर रखें, हम नए तरानों में !
.........................................
एक तेरे ही नाम से, वतन में शान है मेरी
क्या उसको मिटा कर मुझे गुमनाम होना है !
.........................................
'उदय' अब तू ही बता दे रास्ता इंसान को
खा रहे रोटी वतन की, कर रहे सौदा वतन का !
छाने लगा है जूनून जीने का लम्हे लम्हे में !
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चलो अच्छा हुआ जो तुम, खिड़की से नीचे उतर आये
बिना दीदार कड़कती ठंड में, शायद हम ठिठुर जाते !
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कहाँ उलझे रहें हम, मिलने बिछड़ने के फसानों में
चलो दो-चार पग मिलकर रखें, हम नए तरानों में !
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एक तेरे ही नाम से, वतन में शान है मेरी
क्या उसको मिटा कर मुझे गुमनाम होना है !
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'उदय' अब तू ही बता दे रास्ता इंसान को
खा रहे रोटी वतन की, कर रहे सौदा वतन का !
लेबल:
शेर
Monday, December 6, 2010
भारतीय मीडिया : सांठ गांठ की नीति !
भारतीय मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना व जाना जाता है जिसके वर्त्तमान समय में दो धड़े प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया के रूप में सक्रीय व क्रियाशील हैं किन्तु विगत कुछेक वर्षों से इनकी सक्रियता व क्रियाशीलता पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं, यदि ये आँख मूँद कर बैठ जाते अर्थात निष्क्रिय होकर अपनी भूमिका का सम्पादन करते रहते तो शायद इनके अस्तित्व, सक्रियता व क्रियाशीलता पर प्रश्न ही नहीं खडा होता, स्वाभाविक तौर पर यह मान लिया जाता कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ फ़ैल हो गया है किन्तु इनकी सक्रियता व क्रियाशीलता में निरंतर बढ़ोतरी हुई है जिसका स्वरूप दिन-व-दिन सशक्त होकर उभर कर सामने है।
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ वर्त्तमान समय में न सिर्फ सक्रीय व क्रियाशील है वरन बेहद सशक्त व आधुनिक संसाधनों से युक्त भी है, इन हालात में भी यदि मीडिया संदेह व सवालों के कटघरे में खडी है जो निसंदेह गंभीर व विचारणीय मुद्दा है ! वर्त्तमान समय में मीडिया पर सांठ गांठ के गंभीर आरोप लग रहे हैं यहाँ पर मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि सांठ-गांठ से मेरा तात्पर्य गठबंधन, मिलीभगत, साझानीति, तालमेल की नीति से है यह नीति सामान्य तौर पर सत्तासीन राजनैतिक अथवा व्यवसायिक प्रतिस्पर्धी आपस में तय कर अपने अपने मंसूबों को साधने के लिए उपयोग में लाते हैं।
अब यह सवाल उठना लाजिमी होगा कि जब मीडिया का न तो राजनैतिक और न ही व्यवसायिक हितों से कोई लेना-देना है फिर यह सांठ-गांठ क्यों, किसलिए ! यदि मीडिया का राजनीति व व्यावसाय से कुछ लेना-देना है तो वो सिर्फ इतना कि इनकी कारगुजारियों को समय समय पर निष्पक्ष व निर्भीक होकर जनता के सामने रखने से है ! क्या कोई भी मीडिया कर्मी ऐसा होगा जो अपने कर्तव्यों व दायित्वों से अंजान होगा, शायद नहीं ! फिर क्यों, मीडिया के खुल्लम-खुल्ला तौर पर राजनैतिज्ञों व उद्धोगपतियों के साथ सांठ-गांठ के आरोप जगजाहिर हो रहे हैं !
आधुनिकीकरण की दौड़ एक ऐसी दौड़ है जिसमे हरेक महत्वाकांक्षी शामिल होना चाहेगा, यहाँ आधुनिकीकरण से मेरा तात्पर्य आधुनिक संस्कृति व भौतिक सुख-सुविधाओं से ओत-प्रोत होने से है, जब आधुनिक संस्कृति अपने चरम पर चल रही हो तब क्या कोई भी महात्वाकांक्षी शांत ढंग से बाहर से देख सकता है, शायद नहीं ! संभव है एक कारण यह भी हो मीडिया का राजनैतिज्ञों व उद्धोगपतियों की ओर रुझान का या फिर मीडिया को अपने पावर अर्थात शक्ति का अचानक ही एहसास हुआ हो कि क्यों न राजनीति व व्यवसाय को भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संचालित किया जाए।
हम इस बात से भी कतई इंकार नहीं कर सकते कि मीडिया को गुमराह करने का प्रयास नहीं किया गया होगा या ऐसे प्रलोभन नहीं दिए गए होंगे जिनके प्रभाव में आकर मीडिया रूपी धारा का रुख स्वमेव मुड गया हो ! संभव है इन कारणों में से ही किसी किसी कारण की चपेट में आकर मीडिया ने अपनी स्वाभाविकता को खो दिया है और तरह तरह के सवालों के कटघरे में स्वमेव खडी है ! संभव है यह बुरा दौर भी गुजर जाएगा किन्तु मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि मीडिया रूपी भव्य इमारत निष्ठा, निष्पक्षता, इमानदारी व जनभावना रूपी बुनियाद पर खडी है यदि कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था इस नींव पर सांठ-गांठ पूर्वक भव्य महल खडा करने का प्रयास करेगा वह महल बुनियाद पर ज्यादा समय तक ठहर नहीं पायेगा और स्वमेव ही भरभरा कर धराशायी हो जाएगा !
Sunday, December 5, 2010
कडकडाती ठण्ड : प्रेम कहानी !
कल रात बेचैनी थी
नींद खुल गई
बिस्तर पर पड़े पड़े
करवट बदलता रहा
दस से पंद्रह मिनट
फिर उठकर बैठ गया !
थोड़ी देर बाद ही
खिड़की के पास
खडा हो ताजी हवा
के झोंके लेते लेते
नीचे सड़क के पार
नजर जा टिकी !
एक लड़की खडी थी
फ्राक पहने हुए
ठंड में सिकुड़ते हुए
न जाने क्यूं
शायद इंतज़ार में
सवाल ! पर किसके !
अन्दर नजर दौड़ाई
घड़ी पर देखा
सुबह के साढ़े चार
बज रहे थे
फिर मेरी नजर
जा टिकी लड़की पर !
मैं कुछ सोचता
तब तक वहां एक
लड़का आ पहुंचा
दोनों कुछ पल बातें
गुपचुप करते रहे
न जाने क्या !
लडके ने लड़की को
गुलाब फूल दिया
दोनों कुछ बुद-बुदाये
और चले गए, मैंने सोचा
कडकडाती ठण्ड ! क्या है
शायद ! प्रेम कहानी !!!
नींद खुल गई
बिस्तर पर पड़े पड़े
करवट बदलता रहा
दस से पंद्रह मिनट
फिर उठकर बैठ गया !
थोड़ी देर बाद ही
खिड़की के पास
खडा हो ताजी हवा
के झोंके लेते लेते
नीचे सड़क के पार
नजर जा टिकी !
एक लड़की खडी थी
फ्राक पहने हुए
ठंड में सिकुड़ते हुए
न जाने क्यूं
शायद इंतज़ार में
सवाल ! पर किसके !
अन्दर नजर दौड़ाई
घड़ी पर देखा
सुबह के साढ़े चार
बज रहे थे
फिर मेरी नजर
जा टिकी लड़की पर !
मैं कुछ सोचता
तब तक वहां एक
लड़का आ पहुंचा
दोनों कुछ पल बातें
गुपचुप करते रहे
न जाने क्या !
लडके ने लड़की को
गुलाब फूल दिया
दोनों कुछ बुद-बुदाये
और चले गए, मैंने सोचा
कडकडाती ठण्ड ! क्या है
शायद ! प्रेम कहानी !!!
लेबल:
औरत,
कविता / poem
Saturday, December 4, 2010
ईमानदार भ्रष्टाचारी !
भाई साहब मैं मर जाऊंगा
मेरी धड़कनें रुक जायेंगी
सांस लेना मुश्किल हो जाएगा
मेरी बीवी घर से निकाल देगी
शान-सौकत सब चली जायेगी
किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूँगा
मुझे करने दो, थोड़ा-बहुत ही सही
पर मुझे भ्रष्टाचार कर लेने दो !
मैं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टाचारी हूँ
इरादतन भ्रष्टाचार का आदि हो गया हूँ
आज तक एक भी ऐसा काम नहीं किया
जिसमे भ्रष्टाचार न किया हो
लोग मेरे नाम की मिसालें देते हैं
मुझे जीने दो, मेरी हाय मत लो
मेरी हाय तुम्हें चैन से बैठने नहीं देगी
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ !
मेरी नस नस में भ्रष्टाचार दौड़ रहा है
दिल की धड़कनें भ्रष्टाचार से चल रही हैं
मान लो, मेरी बात मान लो
मुझे, सिर्फ मुझे, भ्रष्टाचार कर लेने दो
तुम हाय से बच जाओगे
और मेरी दुआएं भी मिलेंगी
यही मेरी पहली और अंतिम अर्जी है
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ !
मेरी धड़कनें रुक जायेंगी
सांस लेना मुश्किल हो जाएगा
मेरी बीवी घर से निकाल देगी
शान-सौकत सब चली जायेगी
किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूँगा
मुझे करने दो, थोड़ा-बहुत ही सही
पर मुझे भ्रष्टाचार कर लेने दो !
मैं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टाचारी हूँ
इरादतन भ्रष्टाचार का आदि हो गया हूँ
आज तक एक भी ऐसा काम नहीं किया
जिसमे भ्रष्टाचार न किया हो
लोग मेरे नाम की मिसालें देते हैं
मुझे जीने दो, मेरी हाय मत लो
मेरी हाय तुम्हें चैन से बैठने नहीं देगी
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ !
मेरी नस नस में भ्रष्टाचार दौड़ रहा है
दिल की धड़कनें भ्रष्टाचार से चल रही हैं
मान लो, मेरी बात मान लो
मुझे, सिर्फ मुझे, भ्रष्टाचार कर लेने दो
तुम हाय से बच जाओगे
और मेरी दुआएं भी मिलेंगी
यही मेरी पहली और अंतिम अर्जी है
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ !
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