Tuesday, February 9, 2010

मदिरा ...

वह सामने आकर,
मुझको लुभा गई
फ़िर धीरे से, मुझमें समा गई
रोज सोचता हूं,
छोड दूं उसको
शाम हुई ,
उसकी याद फ़िर से आ गई

दूर भागा, तो सामने आ गई
मैं पूछता हूं ,
क्यों छोडती नहीं मुझको
वह "बेजुबां" होकर भी,
मुझसे लड गई
क्यूं भागता है, डर कर मुझसे
तू सदा पीते आया है मुझे
क्या आज मै तुझे पी जाऊंगी !

ये माना,
तेरे इस "सितमगर" शहर में
हर कदम पर "बेवफ़ा" बसते हैं
डर मत
मै बेवफ़ा नहीं - मै बेवफ़ा नहीं।

Saturday, February 6, 2010

भयभीत चिट्ठाकार !

चिट्ठाकार तो बस चिट्ठाकार है वह कुछ भी लिख सकता है, न तो उसे किसी से कुछ पूछने की जरूरत है और न ही किसी से "अनुमती" लेने की जरूरत है . . . सीधे शब्दों मे कहा जाये तो "अपनी ढपली-अपना राग" है ... यूं भी कह सकते हैं वह 'जंगल का राजा' है ... अरे भाई चिट्ठाकार "शेर" है !

... अब हाल तो ये है भाई साहब जंगल का राजा भी चतुर व चालाक "लकडबघ्घों" की बजह से तनिक सहमा व भयभीत रहता है, अब वो पुरानी राजशाही व मान-मर्यादा रह कहां गई है, छोटे-बडों का लिहाज भी नई पीढी के लोग भूलते जा रहे हैं जिसको मौका मिला वो दूसरे को "गटक" गया।

ठीक इसी तरह हमारा "चिट्ठाकार शेर" भी भयभीत रहने लगा है ... अरे इस शेर को किसी से डरने की क्या जरूरत है इसका कोई क्या बिगाड लेगा ? ... अब बिगाडने की बात मत पूछिये साहब ... इस शेर की भी एक "दुम" है दुम से मेरा मतलब "टिप्पणी बाक्स" से है, इस दुम पर कोई महानुभाव कभी-कभी "छोटे-छोटे फ़टाकों की लडी" लगा कर चला जाता है वह धीरे-धीरे फ़ूटते रहती है और "चिट्ठाकार शेर" डरा-सहमा दुम दबाये भागते फ़िरता है।

इससे भी ज्यादा खतरनाक तो "बेनामी" टिप्पणीकार है वह छोटे-मोटे फ़टाकों मे विश्वास नही करता ... वह तो सीधा "बम" उठाता है और लगाकर गुमनाम- अंधेरी गलियों मे चला जाता है .... अब जरा सोचो बम के फ़टने से "चिट्ठाकार शेर" की क्या हालत होती होगी ... अब बेचारा 'भयभीत चिट्ठाकार" करे तो करे क्या !!

Friday, February 5, 2010

हार-जीत ...

हर पल, पाने की चाह
कुछ पल के लिये अच्छी है
समर्पण की भावना
सदा के लिये अच्छी है !

जरा सोचो
हमने क्या खोया - क्या पाया
और जरा सोचो
तुमने क्या पाया - क्या खोया !

जिंदगी की राहों में
जीत कर भी हारते हैं कभी
कभी हार कर भी जीत जाते हैं !

भावना हार-जीत की नहीं
समर्पण की देखो !

जीतने वाले को
और हारने वाले को देखो
खुशी को देखो
और अंदर छिपी मायूसी को देखो !

फ़िर जरा सोचो
कौन जीता - कौन हारा
कौन हारा - कौन जीता

मत हो उदास, जीत कर भी तू
संतोष कर
देख कर मुझको
हारा नही हूं, हारा नही हूं !!

Tuesday, February 2, 2010

अमीर किसान-गरीब किसान

हमारा देश किसानों का देश है कुछ वर्ष पहले तक एक ही वर्ग के किसान होते थे जिन्हे लोग 'गरीब किसान' के रूप में जानते थे जो सिर्फ़ खेती कर और रात-दिन मेहनत कर अपना व परिवार का गुजारा करते थे लेकिन समय के साथ-साथ बदलाव आया और एक नया वर्ग भी दिखने लगा जिसे हम 'अमीर किसान' कह सकते हैं।

... अरे भाई, ये 'अमीर किसान' कौन सी बला है जिसका नाम आज तक नहीं सुना .....और ये कहां से आ गया ... अब क्या बतायें, 'अमीर किसान' तो बस अमीर किसान है .... कुछ बडे-बडे धन्ना सेठों, नेताओं और अधिकारियों को कुछ जोड-तोड करने की सोची.... तो उन्होने दलालों के माध्यम से गांव-गांव मे गरीब-लाचार किसानो की जमीनें खरीदना शुरू कर दीं... और फ़िर जब जमीन खरीद ही लीं, तो किसान बनने से क्यों चूकें !!! ......... आखिर किसान बनने में बुराई ही क्या है........ फ़िर किसानी से आय मे 'इन्कमटैक्स' की छूट भी तो मिलती है साथ-ही-साथ ढेर सारी सरकारी सुविधायें भी तो है जिनका लाभ आज तक बेचारा 'गरीब किसान' नहीं उठा पाया ।

........ अरे भाई, यहां तक तो ठीक है पर हम ये कैसे पहचानेंगे कि अमीर किसान का खेत कौनसा है और गरीब किसान का कौन सा ? ............ बहुत आसान है मेरे भाई, जिस खेत के चारों ओर सीमेंट के खंबे और फ़ैंसिंग तार लगे हों तो समझ लो वह ही अमीर किसान का खेत है, थोडा और पास जाकर देखोगे तो खेत में अन्दर घुसने के लिये बाकायदा लोहे का मजबूत गेट लगा मिलेगा, तनिक गौर से अन्दर नजर दौडाओगे तो एक शानदार चमचमाती चार चक्का गाडी भी खडी दिख जायेगी ...... तो बस समझ लो यही 'अमीर किसान' का खेत है ।

........... अब अगर अमीर किसान और गरीब किसान में फ़र्क कुछ है, तो बस इतना ही है कि अमीर किसान के खेत की देखरेख साल भर होती है, और गरीब किसान के खेत में साल भर में एक बार "खेती" जरूर हो जाती है ।

Monday, February 1, 2010

दोस्ती ...

वो रहनुमा 'दोस्त' बनकर,
हमसे मिलते रहे
और हम उन्हें, अपना
हमदम समझते रहे
चलते-चलते,
ये हमें अहसास न हुआ
कि वो दोस्त बनकर,
दुश्मनी निभा रहे हैं
एक-एक बूंद 'जहर',
रोज हमको पिला रहे हैं !

अब हर कदम पर देखता हूं,
उनका 'हुनर'
हर 'हुनर' को देखकर ,
अब सोचता हूं
'दोस्ती' से दुश्मनी ज्यादा भली थी
तुम दुश्मन होते,
तो अच्छा होता
कम-से-कम मेरी पीठ में,
खंजर तो न उतरा होता !

संतोष कर लेता,
देखकर खरोंच सीने की
अब चाहूं तो कैसे देखूं,
वो निशान पीठ के
अब 'उदय' तुम ही कुछ कहो
किसे 'दोस्त',
और दुश्मन किसे कहें।