Sunday, October 31, 2010

सन्देश

दीवाली में दीप जलाएं
द्वारे-द्वारे फूल सजाएं
आँगन आँगन रंग बिछाएं
चलो चलें हम 'दीप' बने,
और खुशी का गीत बनें
गाँव, शहर, प्रदेश, देश में
विकास का सन्देश बनें !

Saturday, October 30, 2010

रौशनी

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जहां उजाले-ही-उजाले हैं,
वहां 'दीप' बन -
टिमटिमाने से बेहतर है
चलो चलें, कहीं अंधेरों में,
रौशनी बन -
आँगन आँगन जगमगा जाएं !
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चाहत

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तू चाहे या न चाहे, कोई बात नहीं
हम तो चाहेंगे तुझे, रात में रौशनी बनाकर !
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Friday, October 29, 2010

'दीप'

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चलो चलें 'दीप' बनें हम
जगमग-जगमग छा जाएं
दीवाली के पावन में
दीप जलाएं आँगन में !
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Wednesday, October 27, 2010

अब हुआ मजबूर हूँ, धूप में भी चल रहा हूँ !

रात में निकला नहीं था, सर्द की ठंडक के डर से
अब हुआ मजबूर हूँ, धूप में भी चल रहा हूँ !

जिन्हें हम भूलने बैठे, वो अक्सर याद आते हैं
जो हमको याद करते हैं, उन्हें हम भूल जाते हैं !

फलक से तोड़कर, मैं सितारे तुमको दे देता
पर मुझको है खबर, तुम उन्हें नीलाम कर देते !

चलो मिलकर बदल दें, नफरतों को चाहतों में
हमारे न सही, किसी-न-किसी के काम आयेंगी !
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