प्रिय मित्रो
इस संसार से मूर्खता
और मूर्ख
शायद समाप्त हो जाएंगे
ऐसा, मुझे लगता था !
धीरे धीरे संसार से
सारे के सारे मूर्ख मर जाएंगे
मूर्खों के मरने के सांथ ही
मूर्खता भी मर जायेगी !
पर, शायद, ऐसा सोचना
गलत था, मेरी सोच भी गलत थी
क्यों, क्योंकि, मूर्ख मर ही नहीं सकते
आज ढेरों मूर्ख, मुझे दिखने लगे हैं
बुद्धिमान मस्तिष्क में
बुद्धिमानी सोच में, बुद्धिमानी साये में ...
आज जो नुक्ताचीनी हो रही है
नेक, अच्छे, कार्यों में, सवालों पे सवाल
उठ रहे हैं, उठाये जा रहे हैं
ये कोई और नहीं, वरन
आज का, आने वाले समय का
बुद्धिमान मूर्ख उठा रहा है
वाह ... वाह वाह ... क्या खूब है ... बुद्धिमान मूर्ख !!
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Monday, July 4, 2011
Sunday, July 3, 2011
... कड़वी ज़ुबानी !
क्या करें
चुप-चाप बैठे हैं
डरते हैं
कहीं, उगलने न लगें
जहर, मुंह से !
आदत, कुछ बुरी है
पर, लोगों को
लगती, ज्यादा बुरी है
घर में, दोस्तों में
अक्सर चर्चे छिड़े हैं
छिड़ते रहे हैं
क्यूं ये छोड़ता नहीं
अपनी आदत पुरानी !
समय के सांथ
चलना भी ...
क्यूं है, इसको गवारा
न जाने क्या मिला
या मिल जाएगा इसको
इस मीठे जमाने में
बोल कर, कड़वी ज़ुबानी !!
चुप-चाप बैठे हैं
डरते हैं
कहीं, उगलने न लगें
जहर, मुंह से !
आदत, कुछ बुरी है
पर, लोगों को
लगती, ज्यादा बुरी है
घर में, दोस्तों में
अक्सर चर्चे छिड़े हैं
छिड़ते रहे हैं
क्यूं ये छोड़ता नहीं
अपनी आदत पुरानी !
समय के सांथ
चलना भी ...
क्यूं है, इसको गवारा
न जाने क्या मिला
या मिल जाएगा इसको
इस मीठे जमाने में
बोल कर, कड़वी ज़ुबानी !!
सर्द रातें !
सर्द रातें थीं
सिमटे सिमटे से
हम बैठे रहे
सिमटे सिमटे से
हम बैठे रहे
उंकडू !
बांहों में बांहे, डाल कर
सिमटे रहे, खुद ही से
सिमटे रहे, सिमटते रहे
न जाने
और कितना
सिमटना था, हमको, हम ही से
कडकडाती ठंड में
बैठे बैठे, उंकडू
इंतज़ार में, तुम्हारे ... !!
बांहों में बांहे, डाल कर
सिमटे रहे, खुद ही से
करते भी क्या !
धुंध बिखरा था
शीत भी, गिरने लगी थी !
धुंध बिखरा था
शीत भी, गिरने लगी थी !
सिमटे रहे, सिमटते रहे
न जाने
और कितना
सिमटना था, हमको, हम ही से
कडकडाती ठंड में
बैठे बैठे, उंकडू
इंतज़ार में, तुम्हारे ... !!
Saturday, July 2, 2011
जनलोकपाल रूपी बवंडर : खाट खड़े होने का भय !!
भईय्या प्रणाम ... अरे अनुज, बहुत दिन बाद, सब खैरियत तो है ... हाँ भईय्या, बस एक छोटी सी उलझन ... हाँ, हाँ, तुझे देख कर ही समझ गया था कि कुछ न कुछ, बता क्या बात है ... भईय्या, अभी जनलोकपाल रूपी बवंडर उठा हुआ है अपने देश में, उसे देख कर बड़े से बड़े दिग्गज भी अपनी आँखें मूँद ले रहे हैं ... ठीक ही तो कर रहे हैं किसी को अपनी आँखें फुडवानी हैं क्या ! ... पर भईय्या, ऐसे काम कैसे चलेगा, लोग कब तक आँखें मूंदकर काम चलाएंगे ... बात तो सही ही कह रहा है, आँखें मूँद लेने से काम तो चलने वाला है नहीं, और लोग आँखें मूंदेंगे भी तो भला कब तक, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, कभी न कभी तो सामना करना ही पडेगा, लोग ऐसे ही छिपते-छिपाते, भागते-भगाते रहेंगे तो जनता इनको सबक सिखा ही देगी, और जब जनता सबक सिखाएगी तब इन सबके लेने के देने पड़ जायेंगे, इसलिए भलाई इसी में है कि बवंडर का सामना करें ... पर भईय्या, कुछ लोग मजबूरी में सामना तो कर रहे हैं पर टाल-मटोल करने जैसा ... हाँ, सही कह रहा है, अब इनके पास टाल-मटोल करने के अलावा इस समस्या से निपटने का कोई हल भी नहीं है, अगर ये सिविल सोसायटी द्वारा तैयार किये गए जनलोकपाल रूपी मसौदे को हू-ब-हू मान लेते हैं तो लगभग सबकी तो नहीं, पर बहुतों की खटिया खड़ी होना तय है, और कौन चाहेगा खुद की खटिया खड़ी करवाना, वो तो चाहेंगे ही कि जितने दिन बिछी हुई है बिछी रहे उनकी खाट और फरमाते रहें आराम ... पर भईय्या इसका कोई न कोई उपाय तो होगा ही ... हाँ है न, उपाय क्यों नहीं है, जरुर है, पर उपाय करने को कोई तैयार नहीं है सब के सब इस चक्कर में हैं कि इस समस्या को किसी भी तरह टाला जाए, और ये टली रहे, इसलिए ही रोज कोई न कोई नया नया वक्तव्य ठोक देते हैं, कोई कहता है हम प्रधानमंत्री को दायरे में रखने को तैयार हैं पर न्यायपालिका को नहीं, तो कोई कहता है कि हम संसदीय कार्यप्रणाली व सांसदों को इससे बाहर रखना चाहते हैं क्योंकि इससे लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहेगी, तो कोई कहता है कि हम प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखने के पक्ष में नहीं हैं, कुल मिला कर मसला ये है कि रोज कुछ न कुछ नया सुनने -पढ़ने को मिल जाएगा, मतलब ये है कि किसी भी तरह यह बवंडर इधर-उधर टला रहे ... पर भईय्या, इसका कोई न कोई हल तो निकालना ही पडेगा ... हाँ, हल तो निकालना ही पडेगा, नहीं तो ये लोग खुद ही हल के रूप में नजर आने लगेंगे और जनता ... !!
Friday, July 1, 2011
... बे-जान होकर भी, गजब करतब दिखाती है !!
गपशपें करना भी 'उदय' जुर्म था
बस बैठ के बातें करीं दो-चार हैं !
...
फूहड़ता लुटा रहे हैं, कामेडी के नाम पर
दरिन्दगी परोसते हैं, न्यूज के नाम पर !
...
अब भला रखते भी क्या, हम उनसे मोहब्बत
जो खिड़की पे भी, कभी दिखते नहीं हमको !
...
हो तो गया गुनाह, तुझे सजदे में मांग कर
रखना पडेगा अब, तुझको संभाल कर !
...
तुझे इंसा बना कर, मुझसे हो गई गल्ती
तू जंगली था, तब ही अच्छा लगे था !
...
अब इस तरह, मुंह फेर के जाना नहीं अच्छा
मोहब्बत में, तकरारें तो होते ही रहती हैं !
...
कोई कहे धर्मावलम्बियों, तो कोई कहे पाखंडियों का
उफ़ ! हमें तो लगे है, भ्रष्टतम भ्रष्टाचारियों का देश है !
...
'खुदा' जाने कौन किसके कंट्रोल में है
हमें तो कोई, कंट्रोल में नहीं लगता !
...
सच ! कभी देखी नहीं हमने, ऐसी काठ की पुतली
जो बे-जान होकर भी, गजब करतब दिखाती है !!
बस बैठ के बातें करीं दो-चार हैं !
...
फूहड़ता लुटा रहे हैं, कामेडी के नाम पर
दरिन्दगी परोसते हैं, न्यूज के नाम पर !
...
अब भला रखते भी क्या, हम उनसे मोहब्बत
जो खिड़की पे भी, कभी दिखते नहीं हमको !
...
हो तो गया गुनाह, तुझे सजदे में मांग कर
रखना पडेगा अब, तुझको संभाल कर !
...
तुझे इंसा बना कर, मुझसे हो गई गल्ती
तू जंगली था, तब ही अच्छा लगे था !
...
अब इस तरह, मुंह फेर के जाना नहीं अच्छा
मोहब्बत में, तकरारें तो होते ही रहती हैं !
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कोई कहे धर्मावलम्बियों, तो कोई कहे पाखंडियों का
उफ़ ! हमें तो लगे है, भ्रष्टतम भ्रष्टाचारियों का देश है !
...
'खुदा' जाने कौन किसके कंट्रोल में है
हमें तो कोई, कंट्रोल में नहीं लगता !
...
सच ! कभी देखी नहीं हमने, ऐसी काठ की पुतली
जो बे-जान होकर भी, गजब करतब दिखाती है !!
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