मैं रावण हूँ ... मरा नहीं ... कौन मार सकता है मुझे ... मैं अमर हूँ ... याद है मुझे, पर शायद आप लोग भूल रहे हो कि मैंने घोर-अघोर तप से एक नहीं अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थी ... क्या तुम भूल रहे हो कि वह मैं ही हूँ जिसने न सिर्फ देवताओं को पराजित किया था वरन समस्त ग्रहों के स्वामियों को भी अपना दास बनाया था ... हा हा हा ... आप लोग जल्दी ही भूल जाते हो, पर मुझे सब याद है ... मेरी अमरत्व शक्ति कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं थी, याद है या सब भूल गए ... साक्षात राम को भी मुझे हराने के लिए ऐडी-चोटी का दम लगाना पडा था वो तो विभीषण था जो घर का भेदी निकल गया जिसने मेरी मृत्यु का राज बता दिया, नहीं तो राम को भी पराजित कर देता ... खैर छोडो अब पुरानी बातों में कुछ नहीं रक्खा है, जाने दो ...
... हाँ पर एक बात जरुर याद रखना कि मैं अब तक मरा नहीं हूँ क्योंकि मैं अमर हूँ ... अमर हूँ तो अमर हूँ ... चलो आज मैं तुम्हें मेरी अमरता का असल राज बताता हूँ जो बहुत ही गोपनीय है ... गोपनीय इसलिए कि उस राज को सिर्फ मैं जानता हूँ नहीं तो विभीषण जैसे गद्दार ... खैर जाने दो, आज मैं उस राज को इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आज सब जान कर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे क्योंकि इस दौरान मैंने इस अमरत्व को इतना अमर बना दिया है कि जब तक यह संसार रहेगा तब तक, अब कोई मुझे मारने की चेष्ठा भी नहीं कर पायेगा ... मारना तो बहुत दूर की बात है ...
... तो चलो सुनो आज वह राज ... मैंने जिस अमरत्व को नाभी में छिपा कर रखा था वह तो मेरे शरीर को अमर बना कर रखे हुए था अर्थात मेरा शरीर नश्वर था किन्तु विभीषण की मेहरवानी से ... चलो जाने दो वह तो आप सभी जानते हैं, नहीं जानते हैं तो वह राज नहीं जानते जो मैं अब तुम्हें सुना रहा हूँ ... मैंने एक बार घोर तप कर "ब्रम्हा-विष्णु-महेश" तीनों से संयुक्तरूप से यह वरदान प्राप्त किया था कि यदि विशेष परिस्थितियों में मुझे शरीर त्यागना भी पड़े तो मेरी आत्मा अमर रहेगी, और जिस समय मैं अर्थात साक्षात रावण शरीर त्यागूंगा ठीक उस समय सम्पूर्ण संसार में जितनी भी राक्षस प्रवृत्ति की आत्माएं अर्थात मांस-मदिरा का सेवन कर रही आत्माएं जीवित होंगी उन सभी आत्माओं में मेरी आत्मा समाहित होकर जीवित रहेगी अर्थात मैं मरने के बाद भी अमर रहूँगा ... किन्तु यह वरदान देते समय तीनों देवताओं ने मुझसे यह वचन ले लिया था कि मैं अमर तो रहूँगा, पर मेरी संपूर्ण शक्तियां शरीर के साथ नष्ट हो जायेंगी ... उस समय मुझे यह घमंड था कि मुझे तो कोई मार ही नहीं सकता है इसलिए मैंने वचन दे दिया ...
... लेकिन मैं आज सोचता हूँ कि मैंने वचन देकर बहुत बड़ी भूल की थी वरना आज मैं ... खैर जाने दो, पर आज भी मैं खुश हूँ बहुत खुश हूँ ... मेरी वो शक्तियां नहीं हैं तो क्या हुआ ! पर मैं तो आज अमर हूँ और खूब मजे ले रहा हूँ ... ऐसे ऐसे मजे ले रहा हूँ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी ... मांस-मदिरा का सेवन कर रही जीवित आत्माओं के शरीर व मन में जीवत रहकर मैं ... मांस - मदिरा के मजे, अपहरण - बलात्कार के मौजे, लूट - डकैती के कारनामे, कालाबाजारी - भ्रष्टाचारी के फार्मूले, बम - धमाके, ह्त्या - मारकाट ये सब मेरे ही कारनामे हैं ... हा हा हा ... अमर भी किसी एक-दो शरीर में नहीं, वरन संपूर्ण संसार में गिने-चुने कुछेक प्राणियों को छोड़ कर शेष सभी प्राणियों में मैं ज़िंदा हूँ ... हा हा हा ... आज सम्पूर्ण संसार में मेरा ही राज है ... मैं ही राज कर रहा हूँ, मजे कर रहा हूँ, मौज कर रहा हूँ ... क्यों, क्योंकि मैं रावण हूँ ... रावण ... मुझे अब कोई नहीं मार सकता क्योंकि अब मैं तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... तुम सब लोगों के अन्दर ज़िंदा हूँ ... अमर हूँ ... हा हा हा ... हा हा हा ... !!!
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Saturday, October 16, 2010
Friday, October 15, 2010
ख़्वाब ...
मंजिलें आँखों में हों
दिलों में हों
या ख़्वाबों में हों
एक एक पल
एक एक कदम
हमें उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
होंगे साकार ख़्वाब
मिलेंगी मंजिलें
कदम दर कदम
राहों पर
हमें चलते रहना
उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
मुश्किलें होंगी आसां
बढ़ेंगे कदम
मिलेंगी मंजिलें
हर कदम पर
नए जज्बे के संग
हमें उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
दिलों में हों
या ख़्वाबों में हों
एक एक पल
एक एक कदम
हमें उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
होंगे साकार ख़्वाब
मिलेंगी मंजिलें
कदम दर कदम
राहों पर
हमें चलते रहना
उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
मुश्किलें होंगी आसां
बढ़ेंगे कदम
मिलेंगी मंजिलें
हर कदम पर
नए जज्बे के संग
हमें उनकी ओर
बढ़ते रहना चाहिए !
Thursday, October 14, 2010
संभव नहीं, असंभव है !
अनुशासन में जीवन जीना
संभव नहीं, असंभव है !
इमानदारी से काम करना
संभव नहीं, असंभव है !
सास - बहु में मीठी वाणी
संभव नहीं, असंभव है !
हंसते हंसते जीवन जीना
संभव नहीं, असंभव है !
सच्चाई का साथ निभाना
संभव नहीं, असंभव है !
प्रेम के वादे निभा पाना
संभव नहीं, असंभव है !
पाप-पुण्य का भेद समझना
संभव नहीं, असंभव है !
राजनीति में अनुशासन
संभव नहीं, असंभव है !
भ्रष्टाचार मिटा पाना अब
संभव नहीं, असंभव है !
गांधी जी की राह पकड़ना
संभव नहीं, असंभव है !!
संभव नहीं, असंभव है !
इमानदारी से काम करना
संभव नहीं, असंभव है !
सास - बहु में मीठी वाणी
संभव नहीं, असंभव है !
हंसते हंसते जीवन जीना
संभव नहीं, असंभव है !
सच्चाई का साथ निभाना
संभव नहीं, असंभव है !
प्रेम के वादे निभा पाना
संभव नहीं, असंभव है !
पाप-पुण्य का भेद समझना
संभव नहीं, असंभव है !
राजनीति में अनुशासन
संभव नहीं, असंभव है !
भ्रष्टाचार मिटा पाना अब
संभव नहीं, असंभव है !
गांधी जी की राह पकड़ना
संभव नहीं, असंभव है !!
Tuesday, October 12, 2010
नक्सलवाद को विचारधारा की संज्ञा देना निंदनीय है !

नक्सलवाद को विचारधारा के रूप में परोसा जाना अपने आप में नक्सलवाद का समर्थन करना है ! अक्सर कई बुद्धिजीवी वर्ग के महानुभावों ने नक्सलवाद को विचारधारा माना है, ये उनके अपने अपने विचार कहे जा सकते हैं क्योंकि किसी को नक्सलवाद एक विचारधारा दिखाई देती है तो किसी को समस्या बतौर गैर-कानूनी संघठन नजर आता है ! नक्सलवाद पर लोगों के अनेक प्रकार के मत हैं और आगे भी रहेंगे लेकिन मेरा मानना है की नक्सलवाद एक समस्या है और समस्या रहेगी, नक्सलवादी गतिविधियाँ असंवैधानिक है जिसका समर्थन करना कतई उचित नहीं है। यहाँ पर मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि नक्सलवाद की जब शुरुवात हुई उस समय निश्चित तौर पर नक्सलवाद की विचारधारा सकारात्मक व संघर्षपूर्ण थी किन्तु वर्त्तमान में नक्सलवाद की जो कार्यशैली है उसे विचारधारा कहना सार्थक व उचित नहीं होगा क्योंकि आये-दिन नक्सलियों ने जो मारकाट, विस्फोट, बम धमाके, ह्त्या, थाने व पुलिस केम्पों पर आक्रमण की नीति अपनाई हुई है उसे कतई विचारधारा नहीं कहा जा सकता।
नक्सलवाद विचारधारा है अथवा नहीं है इस पर चर्चा-परिचर्चा, वाद-विवाद, विचार विमर्श किया जा सकता है क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में "विचारधारा या आंदोलन" हम उसे कह सकते हैं जो सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखे .... न कि बंदूकें हाथ में लेकर जंगल में छिप-छिप कर मारकाट, विस्फ़ोट कर जन-धन को क्षतिकारित करे। यदि अपने देश में लोकतंत्र न होकर निरंकुश शासन अथवा तानाशाही प्रथा का बोलबाला होता तो यह कहा जा सकता था कि हाथ में बंदूकें जायज हैं ..... पर लोकतंत्र में बंदूकें आपराधिक मांसिकता दर्शित करती हैं, अपराध का बोध कराती हैं ... बंदूकें हाथ में लेकर, सार्वजनिक रूप से ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर बता कर फ़ांसी पर लटका कर या कत्लेआम कर, भय व दहशत का माहौल पैदा कर भोले-भाले आदिवासी ग्रामीणों को अपना समर्थक बना लेना ... कौन कहता है यह प्रसंशनीय कार्य है और कौन इसे विचारधारा मान लेगा !
अगर कुछ तथाकथित लोग इसे विचारधारा ही मानते हैं तो वे ये बतायें कि वर्तमान में नक्सलवाद के क्या सिद्धांत, रूपरेखा, उद्देश्य हैं जिस पर नक्सलवाद काम कर रहा है .... दो-चार ऎसे कार्य भी परिलक्षित नहीं होते जो जनहित में किये गये हों, पर हिंसक वारदातें उनकी विचारधारा स्वमेव बयां कर रही हैं, इस रास्ते पर चल कर वह कहां पहुंचना चाहते हैं .... क्या यह रास्ता एक अंधेरी गुफ़ा से निकल कर दूसरी अंधेरी गुफ़ा में जाकर समाप्त नहीं होता ! नक्सलवादी ढांचे के सदस्यों, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे बुद्धिजीवियों से यह प्रश्न है कि वे बताएं, नक्सलवाद ने क्या-क्या रचनात्मक कार्य किये हैं और क्या-क्या कर रहे हैं ..... शायद वे जवाब में निरुत्तर हो जायें ... क्योंकि यदि कोई रचनात्मक कार्य हो रहे होते तो वे कार्य दिखाई देते.... दिखाई देते तो ये प्रश्न ही नहीं उठता .... पर नक्सलवाद के कारनामें ... कत्लेआम ... लूटपाट ... मारकाट ... बारूदी सुरंगें ... विस्फ़ोट ... आगजनी ... जगजाहिर हैं ... अगर फ़िर भी कोई कहता है कि नक्सलवाद विचारधारा है तो बेहद निंदनीय है।
Sunday, October 10, 2010
राहुल गांधी परिपक्व या अपरिपक्व !
हिन्दुस्तान में धर्म व जातिगत राजनीति कोई नया मुद्दा नहीं है आम बात है ! विगत दिनों मध्यप्रदेश दौरे पर टीकमगढ़ में कांग्रेस पार्टी के युवा सेनापति राहुल गांधी का यह स्टेटमेंट कि सिमी और आरएसएस दोनों एक जैसी विचारधारा के कट्टरवादी संघठन हैं, दोनों में वैचारिक तौर पर कट्टरता में कोई फर्क नहीं है, राहुल बाबा ने स्पष्ट तौर पर अपने समर्थकों के समक्ष यह कह दिया कि संघ व सिमी जैसी विचारधारा रखने वालों की कांग्रेस पार्टी में कोई जगह नहीं है हालांकि राहुल गांधी के भाषाई तेवर देखकर यह स्पष्ट झलक रहा था कि वे मध्यप्रदेश में दिग्विजयसिंह की बोली बोल रहे हैं। संघ की सिमी से तुलना करना निसंदेह एक विवादास्पद वक्तव्य कहा जा सकता है क्योंकि सिमी एक प्रतिबंधित संघठन है, और जो संघठन प्रतिबंधित हो उससे किसी जनसामान्य से जुड़े किसी संघठन की तुलना करना अपने आप में विवाद को जन्म देता है, खैर तुलनात्मक स्टेटमेंट, नासमझी, समझदारी, समर्थन, विरोध, परिपक्वता, अपरिपक्वता, ये अलग मुद्दे हैं इन मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा के लिए राजनैतिक दल सक्रीय व क्रियाशील हैं । हालांकि यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं है कि इस पर चर्चा की जाए, लेकिन इस मुद्दे अर्थात राहुल गांधी के सिमी व आरएसएस के संबंध में दिए गए कथन के अन्दर छिपे रहस्यात्मक कूटनीतिक भाव पर चर्चा करना लाजिमी है, यहाँ पर रहस्यात्मक भाव से मेरा तात्पर्य जातिगत व धर्मगत राजनीति से परे है ।
जी हाँ, राहुल गांधी का यह विवादास्पद कथन ठीक उस समय आना जब अयोध्या स्थित रामजन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहावाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसला आने के फलस्वरूप कुछेक राजनैतिक दल फैसले के पक्ष अथवा विपक्ष में अपने अपने कथन जारी कर वोट की राजनीति कर रहे थे, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को अयोध्या फैसले पर रोटी सेंकने का प्रयास न करते हुए शान्ति व सौहार्द्र बनाए रखने को तबज्जो देना चाहिए था जो परिलक्षित नहीं हुआ ! यहाँ विचारणीय बात यह है कि अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पहले ही बहुत राजनैतिक पैंतरेवाजी हो चुकी थी जो अब नहीं होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा न होते हुए लोगों ने पुन: इस मुद्दे को भुनाने की कसर नहीं छोडी। यह स्पष्ट तौर पर झलक रहा था कि अयोध्या मुद्दे के फैसले से कांग्रेस पार्टी को न तो कोई राजनैतिक लाभ था और न ही हानि, लेकिन दूसरे दलों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ न कुछ लाभ जरुर था, इस राजनैतिक लाभ-हानि के द्रष्ट्रीकोण से ही राहुल गांधी के स्टेटमेंट को आंका जा सकता है। हुआ दरअसल यह कि जब जातिगत व धर्मगत राजनीति अर्थात वोट की नीति की बात हो तथा कुछेक राजनैतिक दल मुद्दे को भुनाने की कोशिश करें तब कांग्रेस कैसे चुप रह सकती है, और चुप रहना राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से लाजिमी भी नहीं है !
अब हम राहुल गांधी के स्टेटमेंट में छिपे रहस्यात्मक भाव पर चर्चा करते हैं, अपने देश में हिन्दू हों या मुस्लिम हों दोनों ही भावनात्मक व व्यवहारिक रूप से दो हिस्सों में बंटे हुए हैं कुछ मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म की राजनीति के पक्षधर हैं तो कुछ घोर विरोधी भी हैं, ठीक यह स्थिति हिन्दू व मुस्लिम वर्ग में आरएसएस व् सिमी को लेकर भी है ! मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि हिन्दू वर्ग में ही कुछेक कट्टरपंथ विचारधारा के समर्थक हैं तो कुछ विरोधी भी हैं ठीक उसी प्रकार मुस्लिम वर्ग में भी समर्थन व विरोध की स्थिति है, कहने का तात्पर्य यह है कि मुस्लिम वर्ग में ही कुछेक सिमी का समर्थन करते हैं तो कुछ विरोध भी करते हैं, ठीक इसी तरह हिन्दू वर्ग में भी आरएसएस का समर्थन व विरोध दोनों है ! राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिन्दू वर्ग व मुस्लिम वर्ग में साफ्ट कार्नर रखने वाला वह हिस्सा जिसे जातिगत व धर्मगत वोट की राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, न तो वह किसी के समर्थन में है और न ही किसी के विरोध में है, अब सवाल यह है कि इस वर्ग अर्थात हिस्से को कौन व् कैसे भावनात्मक व रहस्यात्मक ढंग से अपनी ओर खींचे !! यह वह वर्ग अर्थात हिस्सा है जिसे मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम युक्त कट्टर राजनीति से कोई लेना-देना न होकर शान्ति व सौहार्द्र से लेना-देना है, इस वर्ग को देश में एक ऐसी राजनैतिक पार्टी की जरुरत है जो अमन-चैन व शान्ति-सौहार्द्र की पक्षधर हो ! कहीं ऐसा तो नहीं राहुल गांधी के इस स्टेटमेंट में यही रहस्यात्मक भाव छिपा हुआ है तथा इस स्टेटमेंट के माध्यम से इस वर्ग विशेष का समर्थन जुटाने का भरपूर प्रयास किया है !!
जी हाँ, राहुल गांधी का यह विवादास्पद कथन ठीक उस समय आना जब अयोध्या स्थित रामजन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहावाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसला आने के फलस्वरूप कुछेक राजनैतिक दल फैसले के पक्ष अथवा विपक्ष में अपने अपने कथन जारी कर वोट की राजनीति कर रहे थे, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को अयोध्या फैसले पर रोटी सेंकने का प्रयास न करते हुए शान्ति व सौहार्द्र बनाए रखने को तबज्जो देना चाहिए था जो परिलक्षित नहीं हुआ ! यहाँ विचारणीय बात यह है कि अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पहले ही बहुत राजनैतिक पैंतरेवाजी हो चुकी थी जो अब नहीं होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा न होते हुए लोगों ने पुन: इस मुद्दे को भुनाने की कसर नहीं छोडी। यह स्पष्ट तौर पर झलक रहा था कि अयोध्या मुद्दे के फैसले से कांग्रेस पार्टी को न तो कोई राजनैतिक लाभ था और न ही हानि, लेकिन दूसरे दलों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ न कुछ लाभ जरुर था, इस राजनैतिक लाभ-हानि के द्रष्ट्रीकोण से ही राहुल गांधी के स्टेटमेंट को आंका जा सकता है। हुआ दरअसल यह कि जब जातिगत व धर्मगत राजनीति अर्थात वोट की नीति की बात हो तथा कुछेक राजनैतिक दल मुद्दे को भुनाने की कोशिश करें तब कांग्रेस कैसे चुप रह सकती है, और चुप रहना राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से लाजिमी भी नहीं है !
अब हम राहुल गांधी के स्टेटमेंट में छिपे रहस्यात्मक भाव पर चर्चा करते हैं, अपने देश में हिन्दू हों या मुस्लिम हों दोनों ही भावनात्मक व व्यवहारिक रूप से दो हिस्सों में बंटे हुए हैं कुछ मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म की राजनीति के पक्षधर हैं तो कुछ घोर विरोधी भी हैं, ठीक यह स्थिति हिन्दू व मुस्लिम वर्ग में आरएसएस व् सिमी को लेकर भी है ! मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि हिन्दू वर्ग में ही कुछेक कट्टरपंथ विचारधारा के समर्थक हैं तो कुछ विरोधी भी हैं ठीक उसी प्रकार मुस्लिम वर्ग में भी समर्थन व विरोध की स्थिति है, कहने का तात्पर्य यह है कि मुस्लिम वर्ग में ही कुछेक सिमी का समर्थन करते हैं तो कुछ विरोध भी करते हैं, ठीक इसी तरह हिन्दू वर्ग में भी आरएसएस का समर्थन व विरोध दोनों है ! राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिन्दू वर्ग व मुस्लिम वर्ग में साफ्ट कार्नर रखने वाला वह हिस्सा जिसे जातिगत व धर्मगत वोट की राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, न तो वह किसी के समर्थन में है और न ही किसी के विरोध में है, अब सवाल यह है कि इस वर्ग अर्थात हिस्से को कौन व् कैसे भावनात्मक व रहस्यात्मक ढंग से अपनी ओर खींचे !! यह वह वर्ग अर्थात हिस्सा है जिसे मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम युक्त कट्टर राजनीति से कोई लेना-देना न होकर शान्ति व सौहार्द्र से लेना-देना है, इस वर्ग को देश में एक ऐसी राजनैतिक पार्टी की जरुरत है जो अमन-चैन व शान्ति-सौहार्द्र की पक्षधर हो ! कहीं ऐसा तो नहीं राहुल गांधी के इस स्टेटमेंट में यही रहस्यात्मक भाव छिपा हुआ है तथा इस स्टेटमेंट के माध्यम से इस वर्ग विशेष का समर्थन जुटाने का भरपूर प्रयास किया है !!
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