Saturday, September 21, 2013

शिलान्यासी पत्थरों बनाम संभावनारूपी वादों की झड़ी ?

शिलान्यासी पत्थरों बनाम संभावनारूपी वादों की झड़ी ?  

मित्रों, जहाँ तक मेरा मानना है लोकतंत्र का सबसे बड़ा कोई उत्सव है तो वो है चुनाव, जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं उत्सव का शुभारंभ नजर आ रहा है, इस उत्सव के शुरुवाती चरण में आजकल शिलान्यासी पत्थरों का खूब शोर है, चहूँ ओर सिर्फ शिलान्यास ही शिलान्यास हो रहे हैं. मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री लगभग सभी अपने अपने स्तर पर लाखों-करोड़ों रुपयों की योजनाओं का शिलान्यास कर रहे हैं, पर सवाल ये है कि चुनाव पूर्व आनन-फानन में हो रहे शिलान्यास अंजाम तक पहुँच सकेंगे या नहीं ?  कहीं ये शिलान्यास चुनाव पूर्व के शिगूफा बन कर न रह जाएँ ? क्योंकि अगर इन्हें अर्थात नेताओं को विकास की इतनी ही चिंता थी तो गुजर रहे कार्यकाल के दौरान ही ये सारे काम संपन्न क्यों नहीं किये गए, यदि किन्हीं कारणों से संपन्न नहीं भी किये जा सके थे तो इनका ठीक चुनाव पूर्व ही शिलान्यास क्यों ? 

हालांकि शिलान्यासी पत्थरों के जवाब में वादेरूपी सौगातों अर्थात घोषणाओं की भी खूब झड़ी लगी हुई है, मेरा अभिप्राय यह है कि विपक्षी दलों के नेता भी सत्ता पक्ष से किसी भी मामले में पीछे नजर नहीं आ रहे हैं, एक ओर जहां योजनाओं के शिलान्यासी पत्थरों का शोर है तो दूसरी ओर "हम ये करेंगे हम वो करेंगे" की झडी ताबड़-तोड़ जारी है, कोई लाखों-करोड़ों की योजनाओं से जनमानस को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा है तो कोई टैक्स माफी, आरक्षण में वृद्धि, फिल्मसिटी का निर्माण, रोजगार, मँहगाई जैसे महत्वपूर्ण संभावनारूपी प्रलोभनों से अपने पक्ष में माहौल बनाने की फिराक में नजर आ रहा है, यहाँ यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि चुनाव पूर्व हो रहे इन धडा-धड शिलान्यासों व संभावनारूपी वादों के पूर्ण होने में संदेह उत्पन्न होना भी लाजिमी है !

खैर, ओवरआल इन दलों व नेताओं के प्रयासों को आलोचना के नजरिये से देखना भी उचित नहीं होगा क्योंकि सत्ता में बने रहने के लिए तथा सत्ता में आने के लिए सभी दल अपने अपने स्तर पर प्रयास करते ही हैं, आखिरकार ये प्रयास भी एक तरह से साम, दाम, दंड, भेद की नीति के ही हिस्से हैं जो पक्ष और विपक्ष में बैठे राजनैतिक दल अपने अपने फायदे के लिए आजमाते हैं, आजमा रहे हैं ! इन सब के बीच यह भी विचारणीय है कि आज देश का जनमानस भी काफी चतुर व चालाक हो गया है वह भी इनके लोक लुभावन क्रिया कलापों से अनभिज्ञ नहीं है, वह भलीभांति जानता है नेताओं की कथनी और करनी का भेद ! वैसे, इसमें दो राय नहीं है कि चुनावी सफ़र में वादों, घोषणाओं, शिलान्यासों का भी अपना अपना अलग महत्व है, फिलहाल सभी चुनावी धुरंधरों को शुभकामनाएँ !!

Thursday, September 19, 2013

जिद ...

तुम ऑन लाइन रहो या ऑफ लाइन हमें क्या 
बस, हलो-हाय ..…….....…… जारी रखना ? 
… 
चलो खुद को बेच दें, अभी कीमत मिल जायेगी अपनी 
नहीं तो, इस शहर में कीमतों पे खरीददारों का जोर है ? 
…  
लो, बोला तो कुछ ऐसा बोला, कि -
न बोलता तो ज्यादा अच्छा होता ?

शहर जाने की जिद न पालें
यहीं रहें और गाँव संभालें ?
गर मैं तेरा गुनहगार हूँ, तो फांसी चढ़ा दे 
पर, झूठी अफवाहों को… तू आग न दे ? 
… 

Tuesday, September 17, 2013

प्रधानमंत्री का पद और लोकतंत्र का गौरव ?

प्रधानमंत्री का पद और लोकतंत्र का गौरव !

लोकतंत्र में जब बड़े बड़े आंदोलनों व जनसमूहों को नजर अंदाज किया जाने लगे तथा भ्रष्टाचार, घोटाले व बलात्कार जैसी घटनाएँ निरंतर होनी लगें तब यह समझ जाना चाहिए कि जनमानस अन्दर ही अन्दर उद्धेलित व आक्रोशित हो रहा है, राजनीति व व्यवस्था परिवर्तन के लिए उमड़-घुमड़ रहा है तथा अपनी इच्छा के अनुरूप व्यवस्था व क़ानून चाह रहा है ! 

लेकिन सवाल ये है कि यदि देश का जनमानस अर्थात दो-तिहाई जनमत राजनैतिक व व्यवस्था परिवर्तन के तौर पर लालूप्रसाद यादव, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, ममता बैनर्जी, मायावती, जयललिता, सोनिया गांधी, नरेन्द्र मोदी या अरविन्द केजरीवाल को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है तथा अपनी इच्छा के अनुरूप व्यवस्था चाहता है तो क्या यह वर्त्तमान में चलित जोड़-तोड़ की नीति व गठबंधनों की नीति से संभव है ?

शायद नहीं, क्योंकि जब तक ये व्यक्तित्व स्वयं को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगे तथा कम से कम 300 सीटों पर चुनाव मैदान में नहीं उतरेंगे तब तक यह कैसे ज्ञात हो पायेगा कि जनता चाहती क्या है, अत: इस सन्दर्भ में मेरी व्यक्तिगत राय तो यही है कि सभी दलों को अपना अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनाव पूर्व ही घोषित करते हुए चुनाव मैदान में उतरना चाहिए ताकि जनता स्वयं अपने पसंद के दल व उम्मीदवार को पूर्णरूपेण बहुमत से चुन सके !

यदि ऐसा नहीं हुआ या देश के समस्त राजनैतिक दल इस सिद्धांत व व्यवहार के साथ चुनाव मैदान में नहीं उतरे या नहीं उतरते हैं तो जनता क्या चाहती है और किसे प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहती है यह तार्किक व सैद्धांतिक तौर पर प्रमाणित नहीं हो सकेगा, और जब तक जनभावनाओं व जनमत के अनुरूप पूर्णरूपेण सरकारें नहीं बनेगीं तथा प्रधानमंत्री के पद सुशोभित नहीं होंगे लोकतंत्र गौरवान्वित नहीं हो सकेगा ! 

अत: लोकतंत्र के गौरव व सम्मान के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि जोड़-तोड़ की राजनीति व गठबंधन सरकारों पर अंकुश लगे तथा पूर्ण बहुमत से सरकारें बनें तथा प्रधानमंत्री भी एक तरह से जनता की भावनाओं के अनुरूप अर्थात जनमत से ही बनें, यह तभी संभव हो सकेगा जब सभी राजनैतिक दल प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए कम से कम 300 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरें तथा जनता को ही अपनी पूर्णकालिक सरकारें चुनने का अवसर प्रदान करें !

जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक राजनीति व व्यवस्था में परिवारवाद, वंशवाद, अवसरवाद, जोड़-तोड़, खरीद-फरोख्त, चाटुकारिता, भय व खौफ का बोलबाला रहेगा तथा कुशल नैतृत्व के अभाव में आयेदिन लोकतंत्र कभी दंगों के नाम पर तो कभी आतंक के नाम पर लहु-लुहान होते रहेगा तथा जनभावनाओं के विपरीत गठजोड़ की सरकारें बनते रहेंगी व छोटे-बड़े-मझोले दल मिलजुल कर अपने अपने स्वार्थों की सिद्धि करते रहेंगे जो स्वच्छ व स्वस्थ्य लोकतंत्र के विपरीत आचरण होगा ! 

गर यह सिलसिला निरंतर चलता रहा, सरकारें बनते रहीं, प्रधानमंत्री बनते रहे तो यह तय है देश का जनमानस उम्मीदों भरी आस से संसद रूपी आसमान को निरंतर तकता रहेगा ! आज का दौर विकास व परिवर्तन का दौर है, निष्पक्षता, पारदर्शिता व स्वतंत्रता का दौर है, अत: मैं व्यक्तिगत तौर पर देश के सभी राजनैतिक दलों से यह आव्हान करता हूँ कि वे नए सिद्धांतों व व्यवहार के साथ चुनाव मैदान में उतरें ताकि जनभावनाओं के अनुरूप अर्थात जनमत के अनुरूप सरकारें बनें, प्रधानमंत्री चुने जाएँ, परिणामस्वरूप लोकतंत्र न सिर्फ मजबूत हो वरन गौरवान्वित भी हो, जय हिन्द !! 

फेसबुक एडिक्ट ...

लघुकथा : एडिक्ट 

दो मित्र अपने अपने ढंग से पिछले सवा घंटे से टाईम पास कर रहे थे तभी एक मित्र ने दूसरे मित्र से कहा - 

यार तुम फेसबुक एडिक्ट हो गए हो, बहुत बुरी बात है ! 

दूसरे ने पहले मित्र के एक हाथ में सुलग रही ग्यारहवी सिगरेट तथा दूसरे हाथ में अधभरे शराब के पांचवे पैग को देखते हुए जवाब दिया -  

एडिक्ट … हाँ यार … सच कह रहे हो !!

Monday, September 16, 2013

मुफलिसी ...

बड़ी अजीबो-गरीब कहानी है, मंजर भी तूफानी है
ऐंसे भी हालातों में,…… हमने लड़ने की ठानी है !
...
उसकी मजार पे, जलता चराग हमने कभी बुझता नहीं देखा
सच ! उसकी रूह भी 'उदय', उसकी तरह ही जिद्दी निकली ?
...
शायद ! अब उसे, समझ में आ गया होगा 'उदय' 
कैसे होते हैं, … संत, … राम, … और बापू ??
न तो वो सूरत बदलेंगे, और न ही घमंड छोड़ेंगे 
दरअसल, वो आज अपनी असल औकात पे हैं ?
दो दिन की मुफलिसी भी उनसे सही नहीं गई 
उफ़ !…… ईमान का सौदा सरेआम कर गए ?