Sunday, August 11, 2013

वित्तमंत्री ...

लघुकथा : वित्तमंत्री

चमचमाती कार से चार व्यक्ति उतर कर ढाबे में प्रवेश किये तो ढाबे का मालिक काउंटर से उठकर सीधा उनकी टेबल पर पहुँचा …

क्या लेंगे हुजूर ?
खाना खायेंगे और क्या, … क्या-क्या ख़ास है … स्पेशल ?
जी, सब कुछ मिल जाएगा … वेज-नानवेज, सब कुछ !

सुनने-सुनाने के बाद …

अच्छा, एक काम करो … एक प्लेट दाल और एक प्लेट भिंडी ले आओ … और कड़क कड़क रोटी … !
( ढाबे का मालिक भौंचक-सा हुआ … )
हुजूर, बाकी तीन लोग … चाय लेंगे, काफी लेंगे, या ठंडा लेंगे ?
ये आर्डर चारों के लिए है, … चलो फटा-फट ले आओ …  दो बज रहे हैं …  आज सुबह से नाश्ता भी नहीं किया है !

ओह, … अच्छा, … हुजूर, एक सलाह दूँ !
हूँ, … हाँ … बोलो …. !
हुजूर, आप देश के वित्तमंत्री क्यों नहीं बन जाते !!

हूँ, … हाँ … हूँ, … क्यों ?
हुजूर, … एक दाल … एक सब्जी … कड़क रोटियाँ … और चार आदमी, … वो भी सुबह से भूखे … आपका वित्तीय मैनेजमेंट कमाल का है … गाडी और चेहरे से… खैर छोडो, आप वित्तमंत्री के लिए … फिट हो बॉस !!!

Friday, August 9, 2013

फ़साने ...


उनकी वाल पे, बहुत भीड़ है आज
गर जी करे भी तो कैसे करे ????

वे मीठा-मीठा बोलेंगे और तुम्हें ललचायेंगे
देखना इक दिन वे ही आपस में लड़वायेंगे ?

गर नाज है 'उदय', उन्हें अपने ताज होने पर
तो, हमें भी गुमान है उन्हें देखते रहने पर ?

किसने कहा है मिल कर ही मिला करो
कभी न मिलकर भी मिल लिया करो ?
...
कभी कभी गुजर जाते हैं 'उदय', ऐंसे भी फ़साने दिल के
जिनकी चर्चा भी नहीं होती, जो गुमसुम भी नहीं होते ?

Tuesday, August 6, 2013

परिवर्तन ...

"सरकारें … निश्चिंत रहें 
हमारी लड़ाई 
तुम्हारे साथ नहीं है, 

हम तो यहाँ 
व्यवस्था परिवर्तन के लिए 
इकटठा हुए हैं, 

और जब हमने 
यह तय कर लिया है 
तो हम, 

हर हाल में 
व्यवस्था परिवर्तन 
करके रहेंगे,… करके रहेंगे !"

Monday, August 5, 2013

तमाशा ...

लो 'उदय', बात कहाँ की, कहाँ ले आये हैं वो 
ऐंसा हुनर, किसी और में देखा नहीं हमने ?
... 
उनका चूना, खुद उनको ही........लगा रहे हैं लोग 
कुछ इस तरह साहित्यिक दुकां चला रहे हैं लोग ? 
... 
अब तुम उस बेजुबाँ पे लाड न दिखाओ मियाँ 
कल इन्हीं हांथों से तो, हलाल होना है उसे ??
... 
चलो माना खुबसूरती पे इतराने का हक़ है तुम्हें 
पर, जिस्म की नुमाइश अच्छी नहीं यारा ????
... 
तमाशा चल रहा है, देख लो सरेआम संसद में 
मदारी कौन है...... सिर्फ ये जाहिर नहीं होता ? 
... 

Saturday, August 3, 2013

संगदिल ...

बहुत गुस्ताख हैं,……. आँखें उनकी
दबे दबे ही हमें देख लेती हैं अक्सर ?

उनके कमीनेपन की, कोई हमसे मिसाल न पूंछे 'उदय'
कुर्सी की चाह में, …….. वो अपना बाप बदल लेते हैं ?

कोई एक तो होगा 'उदय', जो संगदिल नहीं होगा
वो जिस दिन मिलेगा, ये दिल पहचान लेगा ??
...  
कुछ हुनर, था छिपा परछाइयों में
धूप ज्यों छंटने लगी, वो नजर आने लगा ?
...
वो चाहकर भी, हमे कभी नहीं भूल सकते हैं 'उदय'
राह चलते, आँखों पे जोर नहीं चलता है उनका ??