Sunday, March 24, 2013

दागदार ...


सच ! उम्र संबंधों की 'उदय', सोलह रहे या अठारह 
होना वही है, जो अक्सर नादानियों में हो जाता है ? 
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गर, तुमसे पहले भी,....................हमें किसी से प्यार हुआ होता 
तो शायद आज हम, मुहब्बती रश्मों-रिवाजों से अनजान नहीं होते ? 
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आतंकियों की मौत पे, सहानुभूति अच्छी नहीं यारा 
वर्ना, पाक दामन भी.................दागदार समझो ?
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सच ! वे खुद को, पीर, मौला, हकीम, कहते हैं 'उदय' 
पर, बगैर तमंच्ची घेरों के, घर से बाहर नहीं आते ? 
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उफ़ ! कहाँ तुम, उस एक अदने से 'कोहिनूर' के पीछे पड़े हो 
यहाँ तो, विजय, सुब्रत, जैसे सैकड़ों कोहिनूर बिखरे पड़े हैं ? 
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Wednesday, March 20, 2013

सूट-बूट ...


उनकी मुहब्बत की, अब हम क्या मिसाल दें 
शौहरत की चाह में, .... उन्ने बांहें बदल लीं ? 
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'खुदा' जाने किस दौर से गुजर रहे हैं वो 
वजह न भी हो, तो भी मुस्कुरा उठते हैं ?
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गर हम 'उदय', कल उनकी गलियों से, गुजरे नहीं होते 
तो शायद आज हम, हर एक आँख को खटके नहीं होते ?
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सूट-बूट है, तो कविता लिखो, पढ़ो, करो 
वर्ना, बे-फिजूल में वक्त जाया न करो ?
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तरीके चाहे जो हों, पर नतीजे अपने हों 
अब आज के दौर में 'उदय' हारना कैसा ?
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Monday, March 18, 2013

ब्रेक-अप ...


सच ! जिस्म से रूह निकल रही है मेरे 
तनिक और ठहर जाओ तो सुकूं मिले ?
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न कद है न काठी है, न दिमाग है न खुबसूरती 
फिर भी, .......................... वो सरकार हैं ? 
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अब जब ब्रेक-अप हो ही रहा है तो हिसाब-किताब पूरा कर लो 
कहीं ऐंसा न हो, दो-चार चुम्बन तुम्हारे हमारे पास रह जाएँ ?
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जनता को मिर्गी की बीमारी है, या सत्ताधारियों को 
कोई तो बताये 'उदय', हम जूता सुंघायें किसे ????
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आओ किसी पुरानी बात को याद कर के ठहाके लगा लें 
वर्ना अब, ............. ठहाकों की वजहें मिलती कहाँ हैं ?
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Friday, March 15, 2013

टेड़ी की टेड़ी ...


उनकी खुशी के, कोई मिजाज तो देखे 'उदय' 
मंद-मंद मुस्कुराते हैं परेशां देख कर हमको ? 
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तुम उंगली पकड़ लो, या पगडंडी पकड़ा दो 
फिर देखें, कैसे भूलते हैं हम घर तुम्हारा ? 
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हदों में होते, तो वो हदें पार करते 
दुम कुत्ते की, रहेगी टेड़ी की टेड़ी ?
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कुछ तो बोलो मियाँ, मौला, मेरे परवरदिगार 
खब्बीसों को,.........क्यूँ मिला ऊँचा दरवार ?
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तुम्हारा दिल है,....................तुम्हारी मर्जी 
पर, किसी और को चाहा, तो उसकी खैर नहीं ? 
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Wednesday, March 13, 2013

मुहब्बत ...


जी चाहता है 'उदय', डूब जायें उनमें 
गर खो भी गए तो गिला नहीं होगा ? 
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लो, आज सारा शहर, हमसे.........बेइन्तहा नाराज है 'उदय'
वजह, कुछ ख़ास नहीं, कल हमने उनकी हाँ में हाँ नहीं भरी ? 
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अब मर्जी तुम्हारी, जो चाहे नाम ले लो 
बेरहम कह लो,.....या बेवफा कह लो ? 
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लो, दफ़्न हो गई, कल.....एक और मुहब्बत 
उनकी............................खामोशियों में ? 
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झूठे दिलासों को....हथियार बनाया था उन्ने 
और एक हम थे, जो उनपे एतबार करते रहे ? 
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