Monday, October 15, 2012

बेगुनाही के सबूत ...


भृष्टाचारियों, तुम खुद ही तुम्हारी हदें तय कर दो 
ताकी, उसके बाद ही, हम तुम्हारे ... गिरेबां पकड़ें ? 
... 
तमाम सबूतों और गवाहियों के बाद भी, गुनहगारों की अकड़ कायम है  
लंगड़े, लूले, गूंगे, बहरे .... अब, न्याय की चाह में जाएँ तो जाएँ कहाँ ?
... 
न तो शर्म है उन्हें, और न ही वे बेक़सूर हैं 'उदय' 
बस, सत्ता का कवच है, ..... सही-सलामत हैं ? 
... 
क्या खूब, आज उन्ने, खुद ही खुद को, बेक़सूर सिद्ध किया है 'उदय'
लगता नहीं कि अब ... अदालतों व जाँच एजेंसियों की जरुरत होगी ? 
... 
दो-एक तस्वीरें, रसीदें व आयोजनों के झूठे-सच्चे आंकड़े 
उफ़ ! ये, खुद की नजर में, खुद की बेगुनाही के सबूत हैं ?

Sunday, October 14, 2012

मम्मी-पापा ...


चहूँ ओर ... दुख ... 
और सिर पे, चिंता के बादल 
घिर आए हैं 
बच्चों की नादानी से 
मम्मी-पापा ... 
दोनों ... घवराये हैं !
अब करें, तो क्या करें वे 
यही विचार ... 
विचार रहे हैं ... दोनों 
कहीं नादानी - नादानी में 
सत्ता ... 
निकल न जाए हांथों से !!

Saturday, October 13, 2012

परहेज ...


दिल पे, ... कुछ इस कदर असर हुआ है उनकी खामोशी का 
कि न तो कुछ सुन रहा है मेरी, और न ही सुना रहा है कुछ ?
... 
उफ़ ! क्या खूब बदला है, खुद को किसी ने 
अपने हो के भी, अब वो अपने नहीं लगते ? 
... 
चलो माना 'उदय', कि उनके आरोप अनर्गल हैं 
फिर जांच से ... सत्ताधीशों को  परहेज क्यूँ है ?
...
उन्हें, हम याद आएंगे ..................... मगर दिल टूटने के बाद 
अभी तो, दिल उनका, रकीबों के झूठे दिलासों से गुब्बारा हुआ है ? 
... 
जनआक्रोश से, उनकी, कोई साहूकारी नहीं है 
उन्हें तो, समर्थन की आड़ में, रोटी सेंकना है ? 

Friday, October 12, 2012

सबक ...


सुनो, कुचल दो उसकी जुबान ... 
और, दफ़्न कर दो ... 
उसको -
और उसकी आवाज को 
कहीं भी ... 
जहां से ... 

गर उसकी रूह भी चिल्लाना चाहे 
तो चिल्लाते रहे ... 
पर, 
उसकी आवाज, यहाँ तक ... 
हम तक ... 
न पहुँच सके !

उसे सबक मिलना ही चाहिए 
हमारे सामने ... 
चीखने ... 
चिल्लाने ... 
और, बगावत करने का !!
आखिर .... हम .... सरकार हैं !!!

Thursday, October 11, 2012

कहर ...


वे दिल पे दस्तक तो देते हैं, पर अन्दर नहीं आते 
'रब' ही जाने, ये उनकी अदा है, या मजबूरियाँ हैं ? 
... 
गर, आज इस मुल्क में, सख्त क़ानून होते 'उदय' 
तो इन घमंडियों के ..... सर कलम हो गए  होते ? 
... 
गरीबों, किसानों, मजदूरों से जी नहीं भरा था उनका 
तब ही तो, लंगड़े-लूलों पे ... कहर बरपा है उनका ? 
... 
वे रोज प्रोफाइल पिक्चर बदल बदल के वाह-वाही लूट लेते हैं 
काश ! ये हुनर ......................... हम में भी होता 'उदय' ?
... 
पिन चुभा-चुभा के, क्यूँ सता रहे हो यार 
खंजर ही सीने में ... क्यूँ उतार नहीं देते ?