Wednesday, January 5, 2011

किसी ने बताया, लोकतंत्र है, जन्म से गूंगा-बहरा है !!

नया साल गया है, यार कैसे चुपचाप बैठे हो
डरो मत, चलो करें, मिलकर एक और नया घोटाला !
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खेल नया कुछ नहीं, बस शब्दों का करतब है यहाँ
शब्दों की जादूगरी तो है, पर जादूगर नहीं हूँ मैं !
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चलने दो भ्रष्टाचार, अपने देश की जनता है, कोई फर्क नहीं
थोड़ा-बहुत चिल्लायेगी, फिर खुद के दुख-दर्द में उलझ जायेगी !
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टी.वी.वालों ने तंग कर रक्खा है, अच्छा सुनते नहीं हैं
बुरा बोलो तो कुछ का कुछ समझ, ब्रेकिंग बना देते हैं !
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हम तो बेवजह ही उसे, बुरा-भला कह रहे थे
किसी ने बताया, लोकतंत्र है, जन्म से गूंगा-बहरा है !

Tuesday, January 4, 2011

नेताओं ने लोकतंत्र को, सरेआम कर दिया !

ईमान की बस्ती में, बेईमानों का पहरा है
कोई बाहर निकले, तो भला कैसे निकले !
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कौन जाने कब तलक, बैठना है हमको
तुम मुद्दे पे आते हो, खामोश होते हो !
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तेरी खामोशी का क्या मतलब समझें
जब भी देखा है, खामोश ही देखा है !
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जाने दो कोई बात नहीं, कोई अफसोस नहीं
लोकतंत्र भी क्या करे, बेईमानों का राज है !
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सुबह से शाम तक, भ्रष्टाचार के चर्चे
फिर भी मौज है, खूब कर रहे हैं खर्चे !
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अब जिन्दगी में, कुछ आम, ख़ास रहा
नेताओं ने लोकतंत्र को, सरेआम कर दिया !

Monday, January 3, 2011

वाह ! क्या नज़ारे हैं, सच ! ये लोकतंत्र है !!

बेईमानी या इमानदारी ! वाह
बेईमानी की उम्मीद
कितनी, सिर्फ उतनी ही
जितना बेईमान का दायरा है
क्यों, क्योंकि, दायरे से बाहर
वो भी बेईमानी में
मुश्किल, कठिन, असंभव सा है !

किन्तु इमानदारी का सवाल
तो फिर सोचना ही क्या
कोई हद, मर्यादा, दायरा
शायद ! नहीं, क्यों
क्योंकि सवाल इमानदारी का है
इमानदारी का सवाल 'दिल'
और बेईमानी का 'मन' से है !

एक सरकारी कुर्सी पर
बैठा अफसर ! बेईमानी में
कुर्सी के दायरे को
बे-खौफ छू रहा है
और जब सवाल इमानदारी
तो 'दिल' को टटोलने
के लिए भी तैयार नहीं !

नेता, मंत्री ! उफ्फ
कोई हद नहीं, क्यों
इन्हें इमानदारी की फुर्सत
चर्चा, कोई मतलब नहीं
सिर्फ बेईमानी ! एक मन्त्र
वाह, क्या नज़ारे हैं
सच ! ये लोकतंत्र है !!

Sunday, January 2, 2011

जादूगरनी ...

सच ! तुम हसीन
बेहद ख़ूबसूरत हो
जब तुम्हें देखता हूँ
तो सिर्फ देखते रहता हूँ
तुम्हारी आँखें
उफ्फ़ ! क्या कहूं
अजीब-सी कशिश
अजीब-सा जादू है
जब भी मुझे
देखती हैं ! उफ्फ़
अपना बना लेती हैं !

हाँ ! याद है मुझे
जब तुमने मुझे
पहली बार देखा था
बस ! उसी पल
तुमने मुझे, चाहकर भी
अपना बना लिया था
वो दिन या आज का दिन
मैं तुम्हारी आँखों के
इर्द-गिर्द ही हूँ
सच ! क्या तुम्हें पता है
कि तुम एक जादूगरनी हो !

शायद ! नहीं
ठीक है, अच्छा ही है
तुम अंजान हो
तुम्हें यह ही यकीं है
कि मैं तुम्हें
बे-इम्तिहां चाहता हूँ
सच ! चाहता तो हूँ
पर अनोखा सच तो
तुम्हारी आँखों का जादू
खैर ! जाने दो
मुझे तो सिर्फ इतना पता है
कि मैं तुम्हें बेहद
बे-इम्तिहां चाहता हूँ !!

Saturday, January 1, 2011

... बताओ, सुझाओ, समझाओ, ये कैसा नया साल है !!

नया साल है
बहुत मारा-मारी है
क्या करें
कुछ समझ नहीं आता
एक मित्र
कह रहा है चलो
जंगल चलते हैं
पी-खा कर आयेंगे
खूब मौज-मस्ती
जी भर
नांचेंगे-गायेंगे
जाम से जाम
लड़ाएँगे, छक कर
आकर सो जायेंगे !

दूसरा मित्र
बाहर गाडी में
इंतज़ार कर रहा है
कह रहा है
नया साल है
लांग ड्राइव पर
निकल चलते हैं
खूब छककर
जी भर के
खायेंगे-पियेंगे
गिले-सिकबे
भूल-भाल कर
पीना-खाना
छोड़-छाड़ कर
कल से एक
नया जीवन जियेंगे !

एक और मित्र
बहुत व्याकुल-बेचैन
है कल से
कहता है यार
बहुत हो गया
सादा-सादा जीवन
चलो कुछ
माल-टाल लेकर
फ़ार्म हाऊस
निकल चलते हैं
खूब रंग-रलियाँ
कूदा-कादी करेंगे
छक छक कर
मौज-मस्ती करेंगे
कल नया साल है
कल का कल देखेंगे !

क्या करें
किसकी सुनें
समझ नहीं आता
नया साल रहा है
या साल जा रहा है
स्वागत करना है
या विदा करना है
दुविधा की घड़ी है
क्या छोड़ना है
क्या प्रण करना है
अब आप ही कुछ
बताओ, सुझाओ, समझाओ
ये कैसा नया साल है !!