Saturday, June 5, 2010

शेर

अलग जगह है, ये दुनिया
जहां फ़रिश्तों को पागल कहते हैं।
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कभी तौला - कभी मासा , अजब हैं रंग फ़ितरत के
करें खुद गल्तियां, मढें इल्जाम दूजे पे ।
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क्या बताएं अब तुम्हें, क्यूं भीड में तन्हा हैं हम
दोस्तों की भीड है, पर सभी खुदगर्ज हैं ।

एक ब्लागर सडक पर .... पहचान कौन !!!!

Friday, June 4, 2010

सीनियर - जूनियर एसोसिएशन ... या छीछा-लेदर !!!

ब्लागदुनिया के मेरे हमसफ़र साथियों .... लेखन क्षेत्र में कोई उम्र नहीं होती ... कोई छोटा-बडा नहीं होता ... लेखन के भाव महत्वपूर्ण व छोटे-बडे होते हैं .... ये और बात है कि हम भारतीय संस्कृति के अंग हैं इसलिये उम्र को महत्व देते रहे हैं और शायद आगे भी देते रहें ..... जब एक पाठक आपके लेखन को पढता है तो वह भाव व विषय को तबज्जो देता है उस समय उसके मन में यह भाव संभवत: नहीं रहते होंगे कि लेखक की उम्र क्या होगी ....

... आज फ़िर मैं तो यही कहूंगा कि " .... न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई , तो देखे केवल मन ...." .... मेरा तात्पर्य सिर्फ़ इतना है कि ब्लागदुनिया में भी कोई छोटा-बडा, सीनियर-जूनियर नहीं है सब एक समान हैं .... ये सीनियर - जूनियर की भावना ... क्यॊं, किसलिये .... भाई लोग क्यों छीछा-लेदर कराने पे तुले हो !!!

.... भाई लोग, अगर कोई मुझसे पूछे कि वर्तमान में अच्छा व प्रभावशाली लेखन ब्लागजगत में कौन कर रहा है ... तो निसंदेह मेरा ध्यान कुछेक युवा लेखकों तथा कुछेक वरिष्ठ लेखकों की ओर ही जाता है .... जो प्रभावशाली व प्रसंशनीय लिख रहा है उसकी प्रसंशा होना तय है ...

... मेरा सभी ब्लागर साथियों से आग्रह है कि अमर्यादित, उट-पुटांग, बे-फ़िजूल तथा बिना सिर-पैर का लेखन यदि लिख रहे हैं तो लिखो ... पर किसी की भावनाएं व मान-मर्यदा आहत न हो .... रही बात एसोसिएशन की तो आधार जितना मजबूत होगा ... उस पर इमारत भी उतनी ही बुलंद खडी होगी .... एसोसिएशन के मुद्दे पे जो हो रहा है ... खींच-तान, आरोप-प्रत्यारोप, छीछा-लेदर .... क्यों, किसलिये .... भाई लोग क्यों छीछा-लेदर कराने पे तुले हो !!!

Thursday, June 3, 2010

"समीर लाल" व "ललित शर्मा" पुरुष ही नहीं हैं .... !!!

ब्लागजगत में मुझे कदम रखे हुये ज्यादा समय नहीं हुआ है ... अब धीरे धीरे पांव पसारने का मन करने लगता है ... मेरा तात्पर्य ये है कि जैसे लंबे सफ़र के बाद चलते चलते आदमी थक जाता है तब वह बैठते साथ ही पांव (पैर) पसारने का जोखिम नहीं उठाता है क्योंकि नस-बस चढने की संभावना रहती है ...

... तनिक सुस्ताने के बाद की वह पांव पसारना शुरु करता है ... भईये मेरा मतलब अब थोडा थोडा सुस्ताना शुरु कर रहा हूं तो पांव पसारने का मन करने लगता है ... पर अभी समय नहीं आया है पांव पसारने का ... वो इसलिये अभी में ब्लागिंग में बहुत पीछे चल रहा हूं ... महापुरुषों की भीड में कहीं दिख ही नहीं रहा हूं ... न जाने वो वक्त कब आयेगा जब मैं भी ब्लागजगत के महापुरुषों के साथ दिखाई दूंगा ...

... दो धुरंधर ब्लागरों की टिप्पणी से ऊर्जा प्रभाहित होती है ... आप खुद देख लो उनकी टिप्पणी जो उन्होंने पिछली पोस्ट पर दर्ज की है : -

Udan Tashtari
said...

बहुत खूब, महाराज!

ललित शर्मा said...

बहुत पी ली भैया
चलो अब घर चलो:)

बम बम बम बम डम डम डम डम

... अब हुआ ये कि इन टिप्पणियों को पढकर मैं सुबह सुबह आधे घंटे हंस हंस कर लोट-पोट हो गया .... मुझे तो लगता है "समीर लाल" व "ललित शर्मा" पुरुष ही नहीं हैं ... वरन ये दोनों "महापुरुष" हैं ... "महापुरुष" ... धन्य हैं आप दोनों ... धन्य है ब्लागजगत ... जय जोहार!!!

'साकी'

आज फ़िर बैठा हूं 'साकी'
मैं तेरी यादों के साथ
है मुझको ये खबर
तू नही है 'मै' के साथ

पी रहा हूं, आज फ़िर
मैं तेरी यादों के साथ
'मैकदा' है या है 'मै'
कौन जाने क्या पता है

'मैकदा' खामोश है
जब तू नही है 'मै' के साथ
आज फ़िर बैठा हूं 'साकी'
मैं तेरी यादों के साथ !