Wednesday, June 2, 2010

... कुछ ब्लागर जैल जाने की कगार पर हैं !!!

बलागजगत में मचे घमासान को देख कर ऎसा लग रहा है कि कुछ ब्लागर जैल जाने की कगार पर हैं !!! ... जैल कैसे ... क्या उन्होंने किसी का खेत काट लिया है ? ... या किसी की मोटर साईकल की टंकी से पेट्रोल चोरी कर लिया है ? ... या किसी महिला के गले से चैन लूट ली है ? .... या मंदिर की दान पेटी से चिल्लर पैसे उठा लिये हैं ? ... अरे कोई बतायेगा ... कि उन्होंने किया क्या है ... जो जैल जाने के कगार पर हैं ...

...अरे भाई साहब ... आप क्यों तैस में आ रहे हैं ... क्या किया है, तो लो सुनो ....ब्लागजगत एक सार्वजनिक मंच है, किसी भी सार्वजनिक स्थान पर जब कोई किसी को इंगित करते हुये अपशब्द बोलेगा या लिखेगा जिससे उसको व अन्य लोगों को बुरा लगे भारतीय दण्ड विधान की धारा - २९२,२९३,२९४ के अंतर्गत संज्ञेय व दण्डनीय अपराध है, अपराध सिद्ध होने पर सजा/जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है ...

... अब सब देख ही रहे हैं .... कौन-कौन क्या-क्या अपशब्द छापे पड़े हैं ... और किस किस को बुरा लग रहा है ... और कौन कौन पढ कर बुरा महसूस कर रहा है ... इसके साथ-साथ मानहानी के मुकदमें में तो कुछ लोगों की लुटिया भी डूब सकती है !!!! .... ऎसा लग रहा है कि कुछ ब्लागर जैल जाने की कगार पर हैं !!! ... देख के भईये ... जरा सोच समझ कर लिखो कहीं ऎसा न हो कि लेने-के-देने पड जायें ....!!!!!!!!

( vishesha teep : - is tippanee ko bhee is post kaa hissaa samajhaa jaaye )

Akhtar Khan Akela said...

bhaai jaan aap ipc ki dhaaraa 500,504,506,469 or cybr act kaa qaanoon btaanaa bhul gye jisme tin se ds vrsh ki szaa or 5 laakh rupye jurmaanaa he fir muqdmaa jis hehr men chlegaa vhaa taarikhon pr aane jaane ki diqqt alg se he . akhtar khan akela kota rajsthan

June 3, 2010 1:00 AM

... ब्लागिंग अपने अंतिम पडाव पर है ???

ब्लागजगत में घमासान मच रहा है ... क्यों, किसलिये ... ब्लागर बे-वजह तो घमासान नहीं कर रहे होंगे ... कुछ-न-कुछ तो अवश्य ही लाभ छिपा होगा ... हो सकता है, पर क्या लाभ होगा ? .... इस विषय पर चर्चा-परिचर्चा की आवश्यकता महसूस हो रही है ... तो चलो शुरु किया जाये चर्चा-परिचर्चा ..... क्या फ़र्क पडता है चर्चा-परिचर्चा से ... कुछ तो नतीजा निकलेगा ही .... पर अब कौन शुरु करे चर्चा-परिचर्चा ..... अब तो लोग ब्लागिंग से भी घवराने लगे हैं ... कहीं ऎसा न हो कि ब्लागिंग से बुद्धिजीवी वर्ग पलायन करने लगे .... यह भी संभव है ... आज के समय में कौन चाहता है लफ़डे में पडना ... वो भी बे-वजह के लफ़डे में ... पर ऎसा क्यों हो रहा है ... कहीं ये बर्चस्प की लडाई तो नहीं है ... हो भी सकती है ... बर्चस्प की लडाई से कौन अछूता रहा है ... राजा-महराजा, रंक-फ़कीर, अमीर-गरीब, ज्ञानी-मूर्ख, छोटे-बडे ... सभी तो इस लडाई के शिकार हुये हैं ... फ़िर ब्लागर किस खेत की मूली है जो इस लडाई से अछूता रह जाये ... संभव या असंभव ... कोई उत्तर नहीं ... कहीं ऎसा तो नहीं ब्लागिंग अपने अंतिम पडाव पर है ???????

Tuesday, June 1, 2010

क्या मेरा भला संभव है ?

दो भाई .. एक थानेदार ... दूसरा लेखक ... थानेदार भाई ने फ़ोन लगाया ... हां बोल अनुज ... भईया प्रणाम ... खुश रह ... भईया, ये घिसटना क्या होता है ? ... अरे यार तू भी कमाल करता है ... अरे जिसका कोई नही होता वह अपना जीवन ऎसे ही .. धीरे धीरे .. भगवान भरोसे घिसट-घिसट कर काटता है ... दूसरे शब्दों में कहूं तो ... जिसके समर्थक न हों, कोई पंदौली देने वाला न हो, जिसका कोई सालिड बेकग्राउंड न हो, जिसे जी-हजूरी न आती हो, जो चमचागिरी नहीं जानता हो, जो भईया-दादा न हो, जो अकड के चलता हो, बगैरह बगैरह .... अक्सर ऎसे लोग अपना जीवन घसिटते-घसिटते ही काटते हैं ....

... हां भईया समझ गया .... भईया मैं आपकी चमचागिरी तो करता हूं, आप मुझे पंदौली देते रहना, कम से कम मेरा जीवन तो ठीक-ठाक कट जायेगा ... फ़िर पकाने बैठ गया, ये बता तुझे कभी लगा कि मैने तेरा भला नहीं किया ... नई भईया... आपके पैर पकड-पकड कर तो मैं यहां तक पहुंचा हूं ... आपके एहसान तो शायद मैं सात जन्मों मे भी न उतार पांऊ ... अगर आप न होते तो, न जाने मैं कहां पडा होता ... चल ठीक है, अब ज्यादा भावुक मत हो ... बता क्यों फ़ोन लगाया ...

... क्या बोलूं भईया ... नये नये थानेदार आये हैं ... लगता है अब नौकरी करना मुश्किल हो जायेगा ... क्यों, क्या हो गया ... ये नये नये लडके कंधे पर दो-दो स्टार लगाकर भी मंत्रियों व नेताओं के पैर ऎसे उछल कर पकडते हैं जैसे मेंढक अचानक कूदकर पैर पर चढ जाता है ... भईया-भईया कहते आगे-पीछे घूमते रहते हैं जैसे उनकी पार्टी के युवा कार्यकर्ता हों ... इन लोगों ने धीरे धीरे पुराने लोगों को भसकाना शुरु कर दिया है ... लगता है अब मेरा भी नंबर लगने वाला है ... चल ठीक है, समय बदल गया है, पर इतना भी नहीं कि ईमानदार लोगों को मौका नही मिलेगा ...

... पर लगता है कुछ बदलाव तो आ रहा है ... कल की ही बात है ... अपने शास्त्री जी (मंत्री) ने याद किया था तो शाम को चला गया था ... कुछ पर्सनल था इसलिये एकांत में गार्डन में आधे घंटे चर्चा चली ... उनके बंगले पर भीड थी, कुछ आते ही जा रहे थे ... चर्चा के पश्चात शास्त्री जी ने हाथ जोडकर गले लगकर विदा किया ... बाहर निकलते निकलते उनके खास सिपहसलारों ने मेरे पैर छूकर आशीर्वाद लिया ... ठीक उसी समय लपक कर दो पुलिस अधिकारी भी आ गये और पैर छूकर आशीर्वाद लेने लगे, दोनों के कंधों पर तीन-तीन स्टार चमक रहे थे, आशीर्वाद दे कर मैं तो चला आया ...

... मुझे लगा, दूर-दराज के रिश्तेदार होंगें, शायद मैं ही नहीं पहचान पा रहा हूं ... अरे नई भईया, वे कोई रिश्तेदार-विश्तेदार नहीं हैं ... कहीं दूर दूर तक मेरे अलावा कोई दूसरा पुलिस वाला आपके पहचान में भी नही है ... बात दर-असल ये है कि उन्होंने आपको और मंत्री जी को गुप्त चर्चा करते हुए देख लिया था, वे समझ गये कि आप "दम-खम" रखते हो, तब ही तो मंत्री जी ने आपसे गुप्त चर्चा की है, इसलिये मौके का फ़ायदा उठाते हुए, दोनों ने आपका आशीर्वाद ले लिया .... भईया अब ये बताओ, उन दोनों में से कोई एक कल सुबह सुबह आपकी चौखट पे आकर, पैर छूकर आशीर्वाद मांगने लगे, तो क्या आप आशीर्वाद नहीं दोगे ?

... अरे तू फ़िर गलत मतलब निकालने बैठ गया ... नई भईया, मैं कोई गलत मतलब नहीं निकाल रहा हूं, बिलकुल ऎसा ही हो रहा है... पूरे विभाग में ... इसलिये ही तो कह रहा हूं कि अब नौकरी करना मुश्किल लग रहा है ... आप तो जानते हो पूरे बीस साल काट दिये विभाग में, आज तक किसी मंत्री-अधिकारी के पैर नहीं छुए ... अब आप मुझे ये बताओ, यदि कल उन दोनों में से कोई भी एक और मैं ... किसी अधिकारी या मंत्री से मिलते हैं ... वो लपक के पैर छू ले ... और मैं सल्यूट मार के खडा रहूं ... तब क्या मेरा भला संभव है ???

चूहा - बिल्ली

चूहा - बिल्ली
बिल्ली - चूहा
आगे - पीछे
पीछे - आगे

भागम - भाग
उछल - कूद
दौडा - दौडी
जीना - मरना

आंख - मिचौली
लपका - झपकी
झपटा - झपटी
पटका - पटकी

हाय - तौबा
तौबा - तौबी
मौका - मौकी
लुक्का - छिप्पी

चूहा - आगे
पीछे - बिल्ली
अंत - भला
सब - भला

जीता - चूहा
हारी - बिल्ली
चूहा - चूहा
बिल्ली - बिल्ली !

...... अदभुत !!!