Sunday, November 26, 2017

मन की बातें ...

सिर काट दो .. नाक काट दो ..
उड़ा दो ..
उठा लो ...
आग लगा दो, रौंद दो, लूट लो इज्जत, ...

ये "मन की बातें हैं".. पर किसके, किस-किस के मन की ?

क्या "मन की बातें" ऐंसी होती हैं ??

हिंसक .. आपराधिक ....
क्या .. हम सब ... "मूकबधिर" हो गए हैं ..
जो ....
ऐंसी "बातें" .. "मन की बातें" .. सुनकर भी ... ???

~ श्याम कोरी 'उदय'

Monday, November 20, 2017

लोकतंत्र ... !

कुछ खामोश हैं, कुछ बड़-बड़ा रहे हैं
कुछ आँखें मिच-मिचाए बैठे हैं,

कुछ तमाशे दिखा रहे हैं, कुछ देख रहे हैं
कुछ मूकदर्शक हैं,

कुछ तमगे बांट रहे हैं, कुछ बटोर रहे हैं
कुछ इंतज़ार में दंडवत हैं,

पर .. फिर भी ... चंहूँ ओर ....
शोर है .. सन्नाटा है ... लोकतंत्र है .... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Friday, October 20, 2017

एक शब्द ...

लोग ..
न जाने .. क्या-क्या लिख देते हैं
और मुझसे .. एक शब्द लिखा नहीं गया


प्रेम
आस्था
विश्वास
समर्पण
बगैरह-बगैरह ..
लिखने की मेरी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं

एक शब्द
अब तक .. अपूर्ण है
कोशिशें .. आज भी जारी हैं
शायद ..
किसी क्षण, किसी पल ... पूर्ण हो जाए .... !

Saturday, September 30, 2017

सच .. मैं .. रावण हूँ ... !

अबे .. चूजो ...
घोंचुओ ...
भोंपुओ ...
पप्पुओ ... चप्पुओ ...

रात-दिन .. दुम हिलाने वाले टट्टुओं ...
अब तुम ...
राम बनने की कोशिश ... न करो ....

क्या तुम मेरे पुतले को जलाकर राम बन जाओगे ???

सुबह-शाम .. तलुए चाँटने वाले स्वयं-भू सूरमाओ
क्या तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं है ... ?
क्या तुम्हारे अंदर का खून पानी हो गया है ... ?
क्या तुम्हारा जमीर मर गया है ... ?

जो तुम .. मेरे पुतले के सामने ... सीना ताने खड़े हो
जलाओ ...
चलाओ तीर ...
फूंक दो .. मुझे .... और ...
अकड़ के खड़े रहो .. बिना रीढ़ वालो ..... !!

शायद .. तुमसे ...
भृष्टाचारियों ... मिलावटखोरों .... ठगों .....
ढोंगियों .. पाखंडियों .. के विरुद्ध .. कुछ होगा भी नहीं ...

क्यों ? ... क्योंकि -
तुम्हें ..
मेरा पुतला .. जलाने ... देखने ... तालियाँ बजाने ...
की आदत-सी हो गई है ... !

गर .. दम है ... तो ....
जला के दिखाओ ... उसे .. उन्हें ... जिनमें मैं ....
आज भी ज़िंदा हूँ .. जी रहा हूँ ....
हाँ .. सच ... मैं .. रावण हूँ .... अजर हूँ .. अमर हूँ .... !!!

Friday, September 29, 2017

संघर्ष

"जीवन का दूसरा एक नाम संघर्ष भी है ... यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर लगता है पर यह सच है कि .. जीवन की राह / राहें बेहद कठिन हैं ... जन्म से लेकर मृत्यु तक कदम-कदम पर संघर्ष है ....

ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात सब के लिए हैं / होते हैं .... संसार में लगभग 10% ऐसे लोग भी हैं / होते हैं जिनके जीवन की राहें 'बाय बर्थ' नेशनल हाइवे की तरह स्मूथ होती हैं अर्थात ये लोग राजयोग में पैदा होते हैं जिनके जीवन में संघर्ष का कोई स्थान ही नहीं होता ...

खैर .. छोडो ... राजयोग की बातों में पड़ना उचित नहीं है ... सच तो ये है कि हम सभी कर्म प्रधान जीवन जी रहे हैं कर्म ही हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचा सकते हैं, हमें सुख और शान्ति दे सकते हैं ....

हमारे कर्म व हमारी सोच कितनें सकारात्मक हैं ये हमारे जीवन व संघर्षों का निर्धारण करेंगे / करते हैं ... कर्म व सोच की सकारात्मकता वह ऊर्जा है जो संघर्षों को सुख व शान्ति में बदल देती है ....

सकारात्मक सोच .. सकारात्मक कर्म ... सकारात्मक आहार अर्थात विटामिन व मिनरल्स युक्त पौष्टिक आहार ... हमारे तन और मन को ऊर्जा प्रदान करते हैं ... संघर्षों से मुक्त करते हैं ....

हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए कितने सजग हैं ... देखें .. जाँचें ... परखें .. और हमेशा सजग रहें ....
स्वस्थ्य रहें, मस्त रहें ....
स्वस्थ्य हैं तो जान है ... जान है तो जहान है !"

~ श्याम कोरी 'उदय'