Friday, December 9, 2011

रजाई ... बगिया ...

रजाई ...
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क्या तुम्हें -
रजाई के दायरे का भी
ख्याल नहीं रहता ?
कभी कभी तो
उफ़ ! हद ही कर देते हो !!
ओढ़ने की जगह -
बिछाने भी लग जाते हो !
और तो और
तुम्हें सुध भी नहीं रहती
कहीं के भी कहीं
पैर पसारने लगते हो !!
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बगिया ...
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तुम पीते हो
कभी कभी तो बहुत ज्यादा
ही पी लेते हो !
याद रहता है तुम्हें ?
कि -
जब बहुत पीकर आते हो
तब
कितने उत्पाती हो जाते हो
रौंध डालते हो तुम
खुद -
अपनी ही बगिया को !!

कुल्हाड़ी ...

एक अर्से से सुन रहा हूँ
सुनते आ रहा हूँ
तुम्हारी जुबान
कुल्हाड़ी-सी चल रही है !
बोलो -
कब तक चलते रहेगी ?
वह दिन दूर नहीं
जब
खच्च-खच्च आवाज से
कान मेरे
सन्न हो जायेंगे !
सोचो -
फिर क्या करोगे -
कुल्हाड़ी का ?
किसे काटोगे, या फिर
खुद को ही -
काट डालोगे तुम !!

ए.बी.सी.डी. ... ये क्या लफडा है ??

अरे भाई
कोई बताये, कोई समझाए !
ए.बी.सी.डी. ...
ये अलग अलग ... क्या फार्मूला है ?
क्यों बेफिजूल की बहस है ?
और क्यों बेफिजूल का लफडा है ??

क्या आप और हम
यह नहीं जानते, समझते
कि -
ए. और बी. ... भ्रष्टाचार की जड़ें हैं -
मजबूत तने हैं !
सी. और डी. तो महज -
फल, फूल, पत्ते, टहनियां हैं !!

गर मिटाना ही है भ्रष्टाचार, तो फिर
क्यूँ, किसी को, किसी से अलग रखा जाए
सब को एक सांथ घसीटा जाए
क्या छोटा, और क्या मोटा !
सब के सब, एक ही थाली के 'चटटे-बटटे' हैं !
इसलिए, क्यूँ न -
एक ही 'खलबटटे' में डाल के सबको कूटा जाए !!

छोडो ... ये ... ए.बी.सी.डी. ... का लफडा !
अलग अलग नहीं, वरन
सर्कस की भांति -
इन्हें ... एक ही 'हंटर' से पीटना होगा !
और तो और -
इन्हें ... एक ही 'बरेदी' के हांथों सौंपना होगा !!
वरना -
भ्रष्टाचार की 'बोल बम' होती रहेगी !
और जनता ... खामों-खां बैठ कर रोती रहेगी !!

भ्रष्टाचाररूपी 'दानव' के सिर्फ, हाँथ - पैर नहीं
वरन -
तन, मन, दिल, और दिमाग को भी
एक ही 'आरी' से काटना होगा
वरना -
न तो मरेगा 'दानव', और न मिटेगा 'भ्रष्टाचार' !
कोई बताये, कोई समझाए
अरे भाई ... ए.बी.सी.डी. ... ये क्या लफडा है ??

सब्जी बाजार ...

आज सब्जी बाजार में -
गेट के पास, एक बोर्ड लगा था
जिसमें -
टमाटर - १५/- रुपये किलो
शिमला मिर्च - १२/- रुपये किलो
फूल गोभी - १०/- किलो
हरा मटर - १२/- रुपये किलो
वहीं नीचे एक नोट -
जल्दी आओ, जल्दी पाओ ... लिखा था !
पढ़ते ही मेरा मित्र पीछे मोटर साइकल से
फटाक से कूदा, और दौड़ गया
थोड़ी देर बाद -
हाँफते हुए आया
मैंने पूछा - क्या हुआ ?
पूरे बाजार में, किसी भी दुकान पर
ये सारी सब्जियां -
कल, परसों, हफ़्तों से नहीं है !
मैंने कहा - तभी मैं सोचूँ -
इतनी मंहगाई में -
सब्जियां इतनी सस्तीं ... क्यों, कैसे ??

Thursday, December 8, 2011

साहित्यिक श्रेष्ठ ...

वो -
जो बात को पूरी तह तक
समझे बिना ही
हाँ, हाँ, कर रहे हैं !
या वो -
जो उनकी हाँ सुन रहे हैं !
या फिर वो -
जो हाँ में हाँ मिला रहे हैं !
या फिर वो
जो विरोध में ...
झंडा ऊंचा लहरा रहे हैं
किसे मानें
हम, साहित्यिक श्रेष्ठ ... !!