Wednesday, October 5, 2011

घाल-माल ...

भ्रष्टाचार से जनता त्रस्त है
फिर भी
सरकार चौकन्ना नहीं होना चाहती !

जन लोकपाल के मसले पर
राजनैतिक पार्टियां
एक मत नहीं होना चाहतीं !

शोर-गुल बहुत है
गाँव-गाँव, शहर-शहर में -
मंहगाई का
फिर भी, लोकतंत्र के मसीहा
कुछ सुनना नहीं चाहते !

नेता, अभिनेता, व्यापारी
मस्त-मौला हुए हैं
सत्ता, सत्ताधारी मद मस्त हैं
गरीब, किसान, मजदूर, त्रस्त हैं !

ये कैंसा मुल्क है !
ये कैंसी व्यवस्थाएं हैं !
ये कैंसी परम्पराएं हैं !
ये क्या घाल-माल है !!
कोई तो सुने, लोग चाहते क्या हैं !!

फेसबुकिया फ्रेंड ... जय हो !!

एक दिन ट्रेन में यात्रा के दौरान ... सामने वाली सीट पर दो युवा आपस में चर्चा कर रहे थे ... एक ने कहा - यार बड़े लोगों के भी भाव बड़े होते हैं ... क्या हुआ ? ... कुछ ख़ास नहीं ... फिर भी, कुछ तो बात जरुर है, बता न यार ... अरे यार "फेसबुक" पर लम्बे अर्से से जुड़ा हूँ मुझे दोस्तों की वाल पर जो फोटो या पोस्ट पसंद आती है उसे निसंकोच "लाईक" कर देता हूँ या फिर कभी कभी ज्यादा पसंद आने पर "कमेन्ट" भी ठोक देता हूँ ... ये तो अच्छी बात है, इसमें समस्या क्या है !

अरे यार समस्या इसमें नहीं है, समस्या तो ये है कि - कुछ लोग अपने आप को बहुत बड़ा "तीस-मार-खां" समझते हैं वो मेरी पोस्ट व फोटो पर कभी आकर हिलते-डुलते भी नहीं हैं आई मीन "लाईक" तक नहीं करते हैं, मुझे तो लगता है कि - बहुत घमंडी लोग हैं ... अरे यार तू भी छोटी-मोटी बातों पर संजीदा हो जाता है, ये तो आम बात है अब इसमें टेंशन लेने की क्या जरुरत है !

बात तो सही है पर अच्छा नहीं लगता यार ... अच्छा-बुरा छोड़, इसमें कर भी क्या सकते हैं, सब चलते रहता है, पर ये सही है कि - कुछ लोग अपने आप को बहुत बड़ा, आई मीन "सिलेब्रेटी या पब्लिक फिगर" समझते हैं जो अपने जैसे छोटे-मोटे फ्रेंडस को जानबूझकर अनदेखा करते हैं ... हाँ यार, गंभीर मसला है ... ( बात करते करते कुछ पल को दोनों खामोश से हो जाते हैं, यह देख-सुन कर मुझसे रहा नहीं जाता, आखिर नौसिखिया लेखक जो ठहरा, इसलिए उनके बीच में कूद पडा ) !

मित्रों आपकी चर्चा सुन रहा था, सुनते सुनते रहा नहीं गया, मुझे भी लग रहा है कि - आप दोनों की चिंता जायज है, पर ... ये "पर" क्या है भाई साहब ( दोनों एक सांथ बोल पड़े ) ... मैंने कहा - आप अपने "फेसबुकिया फ्रेंडस" के बारे में चर्चा कर रहे थे ... हाँ, हाँ ... अच्छा, मुझे एक बात बताओ - जिन्हें तुम "सिलेब्रेटी या पब्लिक फिगर" समझ रहे हो, यदि वे तुम्हारी "फ्रेंड रिक्वेस्ट" को स्वीकार नहीं करते, तब क्या करते, शायद कुछ भी नहीं !

जी हाँ, सच कहा आपने ... फिर चिंतित क्यों हो "लाईक या कमेन्ट" को लेकर, नहीं करते तो न करने दो, कम से कम वे तुम्हारी "वाल व पोस्ट" को देख-पढ़ तो रहे ही होंगे, और यदि नहीं भी देख-पढ़ रहे हैं तो भी क्या हुआ, कम से कम वे तुम्हारी "फेसबुकिया फ्रेंड लिस्ट" में तो हैं, तुम अपने आप पर गर्व तो कर ही सकते हो कि - फलां सिलेब्रेटी, फलां पब्लिक फिगर, आपका "फेसबुकिया फ्रेंड" है, देख तो रहे हो आज-कल पति-पत्नि, बाप-बेटे, और तो और बचपन के दोस्त भी आपस में एक-दूसरे से नाक-मुंह सिकोड़ के मिलते हैं ... आप महान हैं भाई साहब, आपने हमारी आँखें खोल दी, प्रणाम ... प्रणाम ... जय हो !!

Tuesday, October 4, 2011

हम जां लुटा रहे हैं, युगों युगों से तुम पर ...

सच ! मरते रहे हैं तुम पर
युगों युगों से हम
अब बदन की आड़ लेकर
हमारी चाहतों पे
तुम इल्जाम मत लगाओ ...

आज
जिस बदन पे तुमको
गुमान हो रहा है
वो है कहाँ तुम्हारा
सदियों सदा से वो तो
पल पल रहा हमारा ...

गर तुमको यकीं नहीं है
देखो ज़रा छूकर
तुम बदन को खुद ही
सिहरन भी न उठेगी
धड़कन भी न हिलेगी
साँसें भी न चलेंगी
छुए बगैर मेरे ...

अब क्या मिलेगा मुझको
तुमसे उलझ-सुलझ कर
बस इतना जान लो तुम
हम जां लुटा रहे हैं
युगों युगों से तुम पर ...

सिर्फ खता नहीं तुम्हारी
आज जिस किसी को देखो
वो, हम पे
तीखी नजरें उठा रहा है
अब तुम ही कुछ कह दो
क्या कसूर है हमारा ...

अब जब
खुद के रहे नहीं हम
क्या हक़ नहीं बदन पर
जब
हम खुद हो चुके तुम्हारे !!

... हम उसकी सहेली पे फ़िदा थे !

तेरे नैन-नक्स किसी मल्लिका से कम नहीं है
उफ़ ! फिर भी तू है कि उदास बैठी है !!
...
वो इस कदर लोट-पोट हुए हैं मुहब्बत में
न घर का पता है, न खुद का ठिकाना है !
...
क्या खूब दास्ताँ है, क्या खूब आरजू है
बात सुन ली तेरी, तो चल पडी है मेरी !
...
चलो अच्छा हुआ, वादे किये नहीं हमने
अगर वो टूट जाते तो, हम रूठे हुए होते !
...
सच ! न तो मैं सर हूँ, और न ही सरकार हूँ
लोग कहते हैं मुझे, भोला-भाला इंसान हूँ !
...

ख़्वाबों, ख्यालों, धड़कनों में बसर था मेरा
नहीं था तो मगर, उसके होंठों पे नहीं था !
...
हमें खबर कहाँ थी, कि वो हमें चाहते हैं
बे-वजह ही हम उसकी सहेली पे फ़िदा थे !
...
मंहगाई बढाने के अलावा, नहीं कोई विकल्प था
कालाधन बटोरने का, एक छोटा-सा संकल्प था !
...
सच ! बहुत जल्द ही सौ का सिक्का, धूम मचाएगा
कल जो मिलता था चवन्नी में, अब सौ में आयेगा !
...
हम तो सौदागिरी के हुनर को सलाम करते हैं 'उदय'
लोग कभी मुल्क का, तो कभी खुद का सौदा किये हैं !

पथ ...

करते भी क्या
और क्या न भी करते
भ्रष्ट हुए थे
राजा, रानी, मंत्री, संत्री
इसलिए -
हार गए
सब हार गए
कहते-सुनते, सुनते-कहते
छोटे, मोटे, सारे
भ्रष्ट, घुटालेबाज, लुटेरे
ताकतवर
लड़ते-लड़ते हार गए
दांव-पेंच सब ध्वस्त हुए
और
जीत गए
सब जीत गए
सत्य-अहिंसा के पथ पर
लड़ते-लड़ते
जन-गण-मन, सब जीत गए !!