भईय्या, मैं रावण नहीं मारूंगा, कोई कुछ भी कहे, कहता रहे, मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता ... अरे, क्या हो गया, क्यूं ऐंसा बड़बड़ा रहा है, क्या वजह है साफ़ साफ़ बता ... भईय्या, अब आप से क्या छिपाऊँ, जब आज तक कोई बात छिपाई नहीं तो फिर आज कैंसे छिपा दूं ... हाँ, बता क्या बात है ... भईय्या, मैं पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान चल रहा था मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है किन्तु डर के कारण मैं उसे कह नहीं पा रहा था, कल रात मेरे एक दोस्त की बर्थ-डे पार्टी थी मैं भी गया था वहीं पर हम दोनों दोस्त बीयर पी रहे थे बीयर पीते पीते मैं उस लड़की की याद में तनिक मायूस सा हो गया था तब मेरे दोस्त ने मुझे कहा - एक बीयर और पी ले सब टेंशन दूर हो जाएगा किन्तु मैंने नहीं पी ... बहुत बढ़िया बेटा, एक से ज्यादा बीयर कभी पीना भी नहीं चाहिए, तू समझदार बच्चा है !
... लेकिन भईय्या आगे तो सुनो, थोड़ी देर बाद एक "काली छाया" सी आकर मेरे सामने खड़ी हो गई और कहने लगी कि - तू क्यूं परेशान है राजेश ... मैं सहम सा गया, सोचने लगा कि यह क्या मुसीबत है, कहीं ज्यादा नशा तो नहीं हो गया ... वह फिर बोली - डर मत, मैं रावण के वंशस का हूँ और मैं अमर हूँ, पास से गुजर रहा था तुम्हारा दुःख देखा नहीं गया इसलिए तुम्हारे पास आ गया हूँ अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ ... मैंने कहा - क्या ... जो तुम बोलो ... अच्छा, मुझे हिम्मत दो कि मैं जिससे प्यार करता हूँ उसे प्यार का इजहार कर दूं ... लगाओ फोन - बोल दो, डरो मत, मैं हूँ, लगाओ लगाओ ... मैंने फोन लगा कर - आई लव यू कह दिया, सामने से लड़की भी नाराज नहीं हुई किन्तु उसने जवाब नहीं दिया, मैं खुश हुआ, बहुत खुश हुआ !
... फिर मैंने उसे बैठने को कहा ... वह बैठ गया और बोला - दो बीयर बुलवाओ इंजॉय करेंगे ... फिर जैसा जैसा वह बोलता गया मैं करता गया, कितनी पी, कितना मुर्गा खाया, और कौन मुझे घर छोड़ गया, मुझे याद नहीं है, पर मेरी एक सबसे बड़ी समस्या का समाधान निकल गया, मैंने कल उसको आई लव यू बोल ही दिया, अब आप ही बताओ भईय्या कैसे मैं रावण को मारने जा सकता हूँ ... तू सरक गया है, ये क्या फिजूल की बकवास कर रहा है, तुझे तो तेरा दोस्त अनिल घर छोड़ के गया था पर तूने बहुत पी रखी थी, आज के बाद यह सब बर्दास्त नहीं होगा, और रही दूसरी बात - आई लव यू, देख कहीं तुझे लेने के देने न पड़ जाएं ... कुछ समझा नहीं भईय्या आपका मतलब ... अरे यार तूने नशे की हालत में आई लव यू बोल दिया है कहीं लड़की पुलिस-वुलिस में कम्पलेंट न कर दे या घर में शिकायत न कर दे ... बात तो सही कह रहे हो भईय्या, पर कल रात उस "काली छाया" की मेहरवानी से मेरा एक टेंशन तो मिट गया, अब देखेंगे जो होगा ... पर मैं तो आज रावण को मारने नहीं जाने वाला, आखिर उसके वंशज की मदद से अपुन का टेंशन दूर हुआ है ... ठीक है जैसी तेरी मर्जी !
... भाई के कमरे से बाहर जाते ही "काली छाया" फिर से प्रगट हो गई, देख कर राजेश सन्न हो गया ... वह बोली - डरो मत, कल रात से अपुन दोनों दोस्त हो गए हैं, जल्दी तैयार हो जाओ, आज अपुन मौज-मस्ती करने जंगल चलते हैं घर पर अनिल इंतज़ार कर रहा होगा, और हाँ तुम्हारी प्रेमिका का भी तुमको फोन आने वाला है ... ऐंसा है क्या ! तब तो लो फटा-फट तैयार हो जाते हैं ... और राजेश पंद्रह मिनट में ही नहा-धोकर तैयार हो गया ... और चाय पीते पीते प्रेमिका का फोन भी आ गया तथा उससे बातें कर राजेश प्रसन्न हो गया ... फिर क्या था, राजेश को लगा कि -उसकी निकल पडी है कोई "अद्भुत शक्ति" से दोस्ती हो गई है जो हर पल, हर घड़ी मदद में है और अब मौजे ही मौजे ... भाई के लाख समझाने पर भी राजेश नहीं माना और रावण दहन के कार्यक्रम का पूर्णरूपेण त्याग करते हुए मित्र अनिल के सांथ जंगल की सैर पर निकल गया ...
क्रमश : ... कहानी जारी है ... पार्ट - २ ... ब्रेक के बाद ...
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Thursday, October 6, 2011
रावण ...
एक दिन ऐंसा भी आयेगा
रावण
वादा कर
जलने से ...
मरने से ... मुकर जाएगा !
लड़ते लड़ते ... अड़ जाएगा
सामने ...
रावण रूपी राम को देखकर
मरने से
वह पीछे हट जाएगा !
कह देगा, ... वो कह देगा
नहीं मरुंगा, ... नहीं मरुंगा
कलयुगी राम -
के हांथों से
अब मैं नहीं मरुंगा !
कैसे ... मैं मर जाऊं ...
आज, उन हांथों से, जो खुद ही
भ्रष्ट
कपटी
पापी
दुष्ट
घुटालेबाज हुए हैं !
जन ... गण ... मन ...
रावण
वादा कर
जलने से ...
मरने से ... मुकर जाएगा !
लड़ते लड़ते ... अड़ जाएगा
सामने ...
रावण रूपी राम को देखकर
मरने से
वह पीछे हट जाएगा !
कह देगा, ... वो कह देगा
नहीं मरुंगा, ... नहीं मरुंगा
कलयुगी राम -
के हांथों से
अब मैं नहीं मरुंगा !
कैसे ... मैं मर जाऊं ...
आज, उन हांथों से, जो खुद ही
भ्रष्ट
कपटी
पापी
दुष्ट
घुटालेबाज हुए हैं !
जन ... गण ... मन ...
जिनसे -
त्रस्त हुए हैं !
एक दिन, ऐंसा भी आयेगा
रावण -
मरने से पीछे हट जाएगा !!
त्रस्त हुए हैं !
एक दिन, ऐंसा भी आयेगा
रावण -
मरने से पीछे हट जाएगा !!
लेबल:
कविता / poem,
भ्रष्टाचार,
रावण,
सत्यामृत
दशहरा पर्व ...
बेहद मुश्किल ... दुष्कर्मों को
जो कभी ...
मुझे ... बहुत प्रिय हुआ करते थे
उन्हें,
शनै: शनै: छोड़ चुका हूँ !
सबसे पहले ... नान वेज
फिर ... वाइन
उसके बाद ... स्मोकिंग
अब ... महसूस कर रहा हूँ
बेहद सुकूं ... !
अब ... आगे ... धीरे-धीरे
एक-दो और नित्य कर्मों पर
ध्यान है मेरा,
देखें ... अब-कब,
उनकी बारी आयेगी !
पर
यकीं है, मुझे ... खुद पर
वह दिन दूर नहीं
जब
मैं भी ... नेक इंसा बन जाऊंगा !
फिर ... मैं भी ...
रावण दहन ... देखने
रामलीला मैदान ... जाऊंगा
उस दिन ... दशहरा पर्व
मैं भी ... धूम-धाम से मनाऊंगा !!
... ... ... ... ... ... ... ...
सभी मित्रों को दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ...
जो कभी ...
मुझे ... बहुत प्रिय हुआ करते थे
उन्हें,
शनै: शनै: छोड़ चुका हूँ !
सबसे पहले ... नान वेज
फिर ... वाइन
उसके बाद ... स्मोकिंग
अब ... महसूस कर रहा हूँ
बेहद सुकूं ... !
अब ... आगे ... धीरे-धीरे
एक-दो और नित्य कर्मों पर
ध्यान है मेरा,
देखें ... अब-कब,
उनकी बारी आयेगी !
पर
यकीं है, मुझे ... खुद पर
वह दिन दूर नहीं
जब
मैं भी ... नेक इंसा बन जाऊंगा !
फिर ... मैं भी ...
रावण दहन ... देखने
रामलीला मैदान ... जाऊंगा
उस दिन ... दशहरा पर्व
मैं भी ... धूम-धाम से मनाऊंगा !!
... ... ... ... ... ... ... ...
सभी मित्रों को दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ...
लेबल:
कविता / poem,
रावण
Wednesday, October 5, 2011
रावण की नाराजगी ... संशय में राम !
दशहरा पर्व के दिन ... शाम होते होते सारे शहर में हल्ला हो गया कि - रावण ने जलने से मना कर दिया है ... खबर फैलते ही, चहूँ ओर, संशय का विकट वातावरण निर्मित हो गया ... यह खबर आग की तरह रावण का दहन करने वाले राम अर्थात शहर के सबसे दबंग नेता जी तक भी पहुँच गई ! अब चूंकि नेता जी एक पावरफुल मंत्री थे इसलिए सारा प्रशासनिक अमला और उनके चेले-चपाटे खबर की पुष्टि करने के लिए दौड़ पड़े ... कुछ ही देर में खबर की पुष्टि करने वालों की ... मंत्री जी के बंगले पर भीड़ लग गई !
जब सारे पुष्टिकर्ता आ गए ... तब मंत्री ने स्वयं सभी से चर्चा की ... चर्चा पर असल मसला सामने आया कि - शाम चार बजे रावण निर्माण का फिनिशिंग काम चल रहा था तब अचानक एक आवाज गूंजने लगी ... आवाज सुनकर बनाने वाले कारीगर डरने लगे, तब अचानक रावण रूपी एक विशाल आकृति प्रगट हुई और कहने लगी कि - "आज मुझे कोई राम प्रवृति का इंसान ही जलाएगा, यदि ऐंसा नहीं हुआ तो ... जो मुझे जलाएगा उसे चौबीस घंटे के अन्दर मैं जलाकर राख कर दूंगा" ... सुनते ही मंत्री जी चिंतित हो गए, मीटिंग हाल में सन्नाटा-सा पसर गया !
कुछ देर बाद मंत्री जी सहमे सहमे से बोले - अब क्या किया जाए ? ... कुछेक जुझारू प्रवृति के लोग बोल पड़े ... कुछ नहीं होता सर ... आप डरिए मत ... यह सब फिजूल बकवास जैसा है ... और फिर आप भी तो साक्षात भगवान राम ही हैं ... हाँ सर, आप भगवान राम से कम नहीं हैं ... मंत्री जी को ये सारे सुझाव मरवाने वाले सुझाव लग रहे थे, कुछ देर गमगीनी माहौल के बाद मंत्री जी ने मीटिंग हाल से सभी को बाहर बैठने का निर्देश दिया !
सभी के बाहर निकलते ही मंत्री जी अपने चहेते एक अधिकारी व अपने एक ख़ास आदमी से गुप्त रूप से बोले - आप दोनों त्वरंत जाओ, और रावण से हाँथ जोड़कर प्रार्थना करो कि - इस समस्या का कोई हल वे स्वयं बताएं ... उनसे आग्रह करो कि - मंत्री जी आपका दहन करना चाहते हैं यह उनकी मजबूरी है ... इसलिए आप स्वयं ही कोई उपाय सुझाएँ ... ऐंसा क्या किया जाए जिससे आप नाराज न हों, और आपकी नाराजगी का असर हमें मंत्री जी को खोकर न उठाना पड़े, ... और हाँ, सीधेतौर पर हाँथ जोड़कर प्रार्थना में बता देना कि मंत्री जी राम प्रवृति के नहीं है, कहीं कोई संशय न रहे ... जी सर ... !
लगभग आधे घंटे के बाद ... दोनों महाशय रावण से प्रार्थना-अर्चना कर वापस आकर मंत्री जी से मिले तथा बोले ... सर, मसला बेहद गंभीर है, रावण की आत्मा साक्षात प्रगट हो रही है, सर्वप्रथम तो माननीय रावण साहब भड़क गए और कहने लगे कि - तुम लोगों ने ये क्या मजाक बना कर रखा हुआ है, क्या तुम्हें इतने बड़े शहर में कोई राम जैसे स्वभाव का इंसान नहीं मिलता जो तुम शहर के सबसे दुष्ट व पापी इंसान से मेरा सालों से दहन करवा रहे हो, ... बहुत हो गया, अब मुझसे बर्दास्त नहीं होगा, जाओ चले जाओ !
फिर ... फिर हम दोनों उनके चरणों में गिर पड़े तथा अपनी मजबूरी व्यक्त किये, तब कहीं जाकर वे तनिक शांत होकर बोले - अच्छा ये बात है, ठीक है जाकर अपने रामरुपी मंत्री को बोल दो कि - मुझ पर तीर चलाने के पहले हाँथ जोड़कर मुझसे प्रार्थना करते हुए अपनी मजबूरी व्यक्त करने के बाद ही तीर चलाये, नहीं तो ... और हाँ, आप लोगों ने ये जो ढोंग बना कर रक्खा है कि शहर का सबसे बड़ा पापी व दुष्ट इंसान मुझे हर साल मार कर नाम कमा रहा है वह जल्द बंद कर दो अन्यथा ... यह सब देखते देखते अब मुझे क्रोध आने लगा है, कहीं ऐंसा न हो ... जो मेरा दहन करने आ रहा है उसका ही मैं दहन शुरू कर दूं !
बातें सुनते ही मंत्री जी सन्न हो गए तथा कुछ देर के लिए पुन: सन्नाटा-सा छा गया ... कुछ देर बाद लम्बी गहरी सांस लेते हुए मंत्री जी बोले - चलो ठीक है, जान में जान आई ... इस बार तो छुटकारा मिल गया, अगली बार का अगली बार देखेंगे ... दोनों बोल पड़े - जी सर, पर मामला बेहद संगीन होते जा रहा है, कोई न कोई हल निकालना पडेगा " रावण दहन" का ... कहीं ऐंसा न हो कि लेने-के-देने पड़ जाएं ... क्योंकि अभी सालों-साल तक आपको ही रावण दहन करना है ... ठीक है, चिंता जायज है, बाद में मुख्यमंत्री जी से बात करेंगे !
ठीक शाम सात बजे ... निर्धारित समयानुसार मंत्री जी ने रामलीला मैदान पहुँच कर ... मंच से, दूर से ही मन ही मन रावण से क्षमा प्रार्थना की तथा प्रार्थना करने के बाद ही तीर चलाया ... तीर चलते ही ... चारों ओर ... फटाकों की गूँज ... शोर-गुल ... आतिशबाजी ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... के नारे गूंजने लेगे तथा मैदान में सभी लोग एक-दूसरे से गले लगने लगे ... चारों ओर ... बधाई ... बधाई ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... नारों व खुशियों के बीच रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हुआ ... इन सब के बीच ... मंत्री जी सन्न ... उपस्थित जनता प्रसन्न ... और रावण तनिक खिन्न ... नजर आये ... जय श्रीराम !!
जब सारे पुष्टिकर्ता आ गए ... तब मंत्री ने स्वयं सभी से चर्चा की ... चर्चा पर असल मसला सामने आया कि - शाम चार बजे रावण निर्माण का फिनिशिंग काम चल रहा था तब अचानक एक आवाज गूंजने लगी ... आवाज सुनकर बनाने वाले कारीगर डरने लगे, तब अचानक रावण रूपी एक विशाल आकृति प्रगट हुई और कहने लगी कि - "आज मुझे कोई राम प्रवृति का इंसान ही जलाएगा, यदि ऐंसा नहीं हुआ तो ... जो मुझे जलाएगा उसे चौबीस घंटे के अन्दर मैं जलाकर राख कर दूंगा" ... सुनते ही मंत्री जी चिंतित हो गए, मीटिंग हाल में सन्नाटा-सा पसर गया !
कुछ देर बाद मंत्री जी सहमे सहमे से बोले - अब क्या किया जाए ? ... कुछेक जुझारू प्रवृति के लोग बोल पड़े ... कुछ नहीं होता सर ... आप डरिए मत ... यह सब फिजूल बकवास जैसा है ... और फिर आप भी तो साक्षात भगवान राम ही हैं ... हाँ सर, आप भगवान राम से कम नहीं हैं ... मंत्री जी को ये सारे सुझाव मरवाने वाले सुझाव लग रहे थे, कुछ देर गमगीनी माहौल के बाद मंत्री जी ने मीटिंग हाल से सभी को बाहर बैठने का निर्देश दिया !
सभी के बाहर निकलते ही मंत्री जी अपने चहेते एक अधिकारी व अपने एक ख़ास आदमी से गुप्त रूप से बोले - आप दोनों त्वरंत जाओ, और रावण से हाँथ जोड़कर प्रार्थना करो कि - इस समस्या का कोई हल वे स्वयं बताएं ... उनसे आग्रह करो कि - मंत्री जी आपका दहन करना चाहते हैं यह उनकी मजबूरी है ... इसलिए आप स्वयं ही कोई उपाय सुझाएँ ... ऐंसा क्या किया जाए जिससे आप नाराज न हों, और आपकी नाराजगी का असर हमें मंत्री जी को खोकर न उठाना पड़े, ... और हाँ, सीधेतौर पर हाँथ जोड़कर प्रार्थना में बता देना कि मंत्री जी राम प्रवृति के नहीं है, कहीं कोई संशय न रहे ... जी सर ... !
लगभग आधे घंटे के बाद ... दोनों महाशय रावण से प्रार्थना-अर्चना कर वापस आकर मंत्री जी से मिले तथा बोले ... सर, मसला बेहद गंभीर है, रावण की आत्मा साक्षात प्रगट हो रही है, सर्वप्रथम तो माननीय रावण साहब भड़क गए और कहने लगे कि - तुम लोगों ने ये क्या मजाक बना कर रखा हुआ है, क्या तुम्हें इतने बड़े शहर में कोई राम जैसे स्वभाव का इंसान नहीं मिलता जो तुम शहर के सबसे दुष्ट व पापी इंसान से मेरा सालों से दहन करवा रहे हो, ... बहुत हो गया, अब मुझसे बर्दास्त नहीं होगा, जाओ चले जाओ !
फिर ... फिर हम दोनों उनके चरणों में गिर पड़े तथा अपनी मजबूरी व्यक्त किये, तब कहीं जाकर वे तनिक शांत होकर बोले - अच्छा ये बात है, ठीक है जाकर अपने रामरुपी मंत्री को बोल दो कि - मुझ पर तीर चलाने के पहले हाँथ जोड़कर मुझसे प्रार्थना करते हुए अपनी मजबूरी व्यक्त करने के बाद ही तीर चलाये, नहीं तो ... और हाँ, आप लोगों ने ये जो ढोंग बना कर रक्खा है कि शहर का सबसे बड़ा पापी व दुष्ट इंसान मुझे हर साल मार कर नाम कमा रहा है वह जल्द बंद कर दो अन्यथा ... यह सब देखते देखते अब मुझे क्रोध आने लगा है, कहीं ऐंसा न हो ... जो मेरा दहन करने आ रहा है उसका ही मैं दहन शुरू कर दूं !
बातें सुनते ही मंत्री जी सन्न हो गए तथा कुछ देर के लिए पुन: सन्नाटा-सा छा गया ... कुछ देर बाद लम्बी गहरी सांस लेते हुए मंत्री जी बोले - चलो ठीक है, जान में जान आई ... इस बार तो छुटकारा मिल गया, अगली बार का अगली बार देखेंगे ... दोनों बोल पड़े - जी सर, पर मामला बेहद संगीन होते जा रहा है, कोई न कोई हल निकालना पडेगा " रावण दहन" का ... कहीं ऐंसा न हो कि लेने-के-देने पड़ जाएं ... क्योंकि अभी सालों-साल तक आपको ही रावण दहन करना है ... ठीक है, चिंता जायज है, बाद में मुख्यमंत्री जी से बात करेंगे !
ठीक शाम सात बजे ... निर्धारित समयानुसार मंत्री जी ने रामलीला मैदान पहुँच कर ... मंच से, दूर से ही मन ही मन रावण से क्षमा प्रार्थना की तथा प्रार्थना करने के बाद ही तीर चलाया ... तीर चलते ही ... चारों ओर ... फटाकों की गूँज ... शोर-गुल ... आतिशबाजी ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... के नारे गूंजने लेगे तथा मैदान में सभी लोग एक-दूसरे से गले लगने लगे ... चारों ओर ... बधाई ... बधाई ... जय श्रीराम ... जय श्रीराम ... नारों व खुशियों के बीच रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हुआ ... इन सब के बीच ... मंत्री जी सन्न ... उपस्थित जनता प्रसन्न ... और रावण तनिक खिन्न ... नजर आये ... जय श्रीराम !!
... जज्बे तूफानी चाहिए !
घोषित लोकशाही, अघोषित तौर पे राजशाही है 'उदय'
कभी विरासत, तो कभी वसीयत की जय जयकार है !
...
न जाने क्यूं, मुल्क मेरा सौदे की मंडी हुई है
चप्पे-चप्पे पे, खुदी का सौदा कर रहे हैं लोग !
...
सर्द फिजाओं में भी, सहमे सहमे से क्यूं हो 'उदय'
मौके की नजाकत देख के, तनिक सिमट के चलो !
...
जिन्हें उठा लेना था अब तक बंदूकें हांथों में
न जाने क्या हुआ उनको, जो सहमे हुए हैं !
...
उम्मीदों भरे जिस्म, नाउम्मीदी में सुलग रहे थे
यार तो बैठा था सामने, मगर खामोश बैठा था !
...
मरते मरते जज्बात, जी पड़े हैं 'उदय'
खबर है कि उधर, वो भी बेचैन हुए हैं !
...
चवन्नी से जियादा औकात नहीं थी जिनकी
आज क्या खूब सियासत चल रही है उनकी !
...
सूखी रोटी चबा-चबा के, चटनी चांट लेते हैं
उफ़ ! गरीबी में, यही हमारे माल-पुआ हैं !!
...
खानदानी सूरमाओं को कोई समझाओ यारो
बे-वजह झूठी शान बघारी में रक्खा क्या है !
...
आज मेरे मुल्क को एक नई इंकलाबी चाहिए
बस तेरे मेरे जेहन में, जज्बे तूफानी चाहिए !
कभी विरासत, तो कभी वसीयत की जय जयकार है !
...
न जाने क्यूं, मुल्क मेरा सौदे की मंडी हुई है
चप्पे-चप्पे पे, खुदी का सौदा कर रहे हैं लोग !
...
सर्द फिजाओं में भी, सहमे सहमे से क्यूं हो 'उदय'
मौके की नजाकत देख के, तनिक सिमट के चलो !
...
जिन्हें उठा लेना था अब तक बंदूकें हांथों में
न जाने क्या हुआ उनको, जो सहमे हुए हैं !
...
उम्मीदों भरे जिस्म, नाउम्मीदी में सुलग रहे थे
यार तो बैठा था सामने, मगर खामोश बैठा था !
...
मरते मरते जज्बात, जी पड़े हैं 'उदय'
खबर है कि उधर, वो भी बेचैन हुए हैं !
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चवन्नी से जियादा औकात नहीं थी जिनकी
आज क्या खूब सियासत चल रही है उनकी !
...
सूखी रोटी चबा-चबा के, चटनी चांट लेते हैं
उफ़ ! गरीबी में, यही हमारे माल-पुआ हैं !!
...
खानदानी सूरमाओं को कोई समझाओ यारो
बे-वजह झूठी शान बघारी में रक्खा क्या है !
...
आज मेरे मुल्क को एक नई इंकलाबी चाहिए
बस तेरे मेरे जेहन में, जज्बे तूफानी चाहिए !
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