Monday, June 13, 2011

लोकपाल के दायरे में ... प्रधानमंत्री !!

हमने माना ...
और हम मानते भी हैं कि -
हमारे देश के प्रधानमंत्री ...
और उच्च व उच्चतम न्यायालयों के
न्यायाधिपति, न्यायमूर्ती, जज, प्रधान
निसंदेह ... ईमानदार थे ...
ईमानदार हैं ... और ईमानदार रहेंगे !
कौन कहता है कि -
ये कभी भ्रष्ट भी, हो सकते हैं !
नहीं, कतई नहीं, यह असंभव-सा है
जब असंभव-सा है, फिर संभवता पर
बहस ... क्यों ... किसलिए
नहीं, बिलकुल नहीं होना चाहिए
जब ईमानदार हैं, थे, और रहेंगे
फिर बहस ... बेफिजूल की बातें हैं !
जब, इमानदारी पर, कोई प्रश्न ही न उठता हो
तब, ये, लोकपाल के दायरे में हों -
या न हों, क्या फर्क पड़ता है !
अरे भाई, फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए !
मेरा तो यह मानना है कि -
कोई बोले ... या न बोले ... पर इन्हें
स्वत: ही, स्वस्फूर्त, खुद को
जन लोकपाल के दायरे में, शामिल कर देना चाहिए
ताकि, कोई इन पर, बेवजह ही, झूठे-सच्चे
भ्रष्टाचार के आरोप न लगा पाए, गर कोई लगाए, तब
आरोप लगाने वालों की, खटिया खड़ी, की जा सके
क्यों ... क्योंकि ... आरोप ... जब झूठे लगेंगे
तब झूठे आरोप, लगाने वालों की
निसंदेह, खटिया खड़ी, होनी ही चाहिए !
आरोप सच्चे ... सच्चे हो ही ...
क्यों ... क्योंकि ... ये ईमानदार हैं ... थे ... और रहेंगे !!

... देगा पटकनी ... और दिलाएगा याद ... छट्टी का दूध !!

बाबा जी ... उछले ... और उछल कर
आ
गए ... मैदान में ... बेवजह
बेवजह ... इसलिए ... उन्हें किसी से
लेना
-देना था ... शायद ... कुछ भी नहीं !
फिर भी ... मारी ... दे मारी
छलांग ... राजनैतिक अखाड़े में
भिड़ गए ... कालेधन और भ्रष्टाचार की आड़ में
राजनैतिक ... पहलवानों से
जोश ... और खरोश से ... कूदे
डटे रहे ... अड़े रहे ... डटना ... और अड़ना
पडा भारी ... पहले ... राजनैतिक पहलवानों को
पर ... जब ... जैसे ही ... उन्हें मिला मौक़ा
और ... जब दी पटकनी ... जोर की
तो ... बाबा जी हुए ... चारों खाने चित्त !
भले ही दांव ... धोखे से ... छल से
पर ... दांव तो दांव था ... वो भी जोर का
और ... बाबा जी हुए ... चित्त ... चारों खाने
अब ... सिर पकड़ें ... या कमर पकड़ें
और कब तक पकड़ें ... पटकनी ... तो थी जोर की !
और था भी नहीं ... अखाड़ा ... बाबागिरी का
जो ... सहजता से निपट लेते
राजनैतिक था ... और पटकनी भी राजनैतिक !
माना ... पटकनी से ... बाबा जी ... हुए चित्त
और राजनैतिज्ञों की हुई ... पौ-बारह
पर ... राजनैतिक पहलवान ... ये न भूलें कि -
बाबा जी ... दूध से जले हैं
और जलन भी ... खूब हुई है
ऐसा जला हुआ आदमी ... और वो भी ... बाबा
जिसके पीछे ... जन और जनाधार दोनों है
मौके की तलाश रहेगी ... जैसे मिलेगा ... मौक़ा
देगा पटकनी ... और दिलाएगा याद ... छट्टी का दूध !!

Sunday, June 12, 2011

... झौंके हवा के हैं कल तूफां बनेंगे, जय हिंद !!

फितरती सोच ने, लोकतंत्र का कबाड़ा कर दिया है 'उदय'
वरना था तो तंत्र, लोक का ही, पर जन जन त्राहीमाम हैं !
...
ढेरों लोगों ने इसे पागल घोषित, अघोषित रूप से कर रक्खा है
अब तो हक़ बनता है, जी में जो आये बोलने, बड़-बड़ाने का !!
...
दल-दल सा बना दिया है, दलालों ने मुल्क को
और बेशर्म से हो चले हैं, हुक्मरान मुल्क के !!
...
काश ! हंसी चेहरा तुमसा, एक और होता
हम तुम पे, और वो हम पे, मरता होता !!
...
तमगों के ख़्वाब सजाए थे, अब पूरे हुए
उफ़ ! कितने सच्चे थे, कितने झूंठे थे !!
...
आज भी, तेरे शहर में, खुशबू बिखरी, है मेरी
मैं क्यूं पडा हूँ आज भी, सूखा तेरी किताब में !

...
गर झांका हुआ होता, हमने, खुद को, अपने गिरेबां में
वतन की जमीं ही क्या, दिलों में भी, हम जी रहे होते !
...
तय है, भ्रष्टतम भ्रष्ट भ्रष्टाचारियों का निपटना, तय है
अनशन ! आज झौंके हवा के हैं कल तूफां बनेंगे, जय हिंद !!

... जायज है ... भले नाजायज है !!

भ्रष्ट ... भ्रष्टतम ... भ्रष्टाचार
कुछेक
... नापाक ... इरादों ने
न सिर्फ बाबा को
वरन मीडिया को भी
डराया, धमकाया, धौंसा
और शायद सिट्टी-पिट्टी भी
गुम ... कर के रख दी !
धौंस ... और सिट्टी-पिट्टी
बाबा तक ... तो ठीक थी
पर ... चतुर-चालाक ... मीडिया की भी
वाह ... वाह-वाह ... क्या बात है
ये लोकतंत्र है भईय्या
यहाँ ... कुछ भी ... संभव है
जायज है ... भले नाजायज है !!

Saturday, June 11, 2011

... था तो मैं पत्थर ही पर, तूने मुझे 'रब' कर किया !!

गर यूं ही चलते रहे हम, तो फिर इतना समझ लो
सच ! गर मर भी गए, तब भी हम, ज़िंदा रहेंगे !!
...
एक दिल ही है, जो हमसे सम्भाला नहीं जाता
गर 'खुदा' दो-चार दे देता, न जाने क्या हुआ होता !
...
गर तुम चाहते ही हो, तो लो सुनलो मेरी कहानी
शहर में, है नहीं कोई, जो सुन ले मेरी ज़ुबानी !!
...
नजर तुम्हारी, मुझे, छू छू कर चली गई
कहो, क्या इरादे हैं, जो बयां नहीं करते !
...
उफ़ ! अब शिकवा करें, तो किससे करें हम
नहीं दिखता कोई, जिसे अपना कहें हम !!
...
उफ़ ! क्या सुकूं, क्या ताजगी पाई है हमने
कंठ हुआ है तर-बतर, हौंठों से छू-कर तुझे !
...
मरेंगे मरेंगे, सब भ्रष्टाचारी, सड़ सड़ के मरेंगे
सच ! कुछ आज, तो कुछ कल, जरुर मरेंगे !
...
तंग हालात में, वक्त ने, तुझको, मुझसे, जुदा तो कर दिया था 'उदय'
पर 'रब' जाने, वक्त की मंसा है क्या, जो आज फिर हम मिल गए !!
...
वक्त ने करवट बदल कर, मुझको पारस कर दिया
था तो मैं पत्थर ही पर, तूने मुझे 'रब' कर किया !!