उफ़ ! बाप ही बेटी का गुनहगार निकला
पगड़ी पाँव में रख कमजोर निकला !
...
जिन राहों की मंजिलें ही नहीं, उन पर अब चलना कैसा
सच ! आओ बैठें, सुकूं से बैठकर, कुछ मशवरे कर लें !
...
आज किसी के आने से रौशन है जहां
काश ! उनका बसेरा यहीं होता !
...
कभी हंसने, कभी रोने के गुर सीख लेते हैं
सच ! जिन्दगी एक पाठशाला है !
...
गरीब जिन्दगीनुमा बोझ तले, दब के जी रहे हैं
सच ! साँसें चल रही हैं, बस मुक्त होना शेष हैं !
...
जब से डूबे हैं तेरी आँखों में, बस डूबे हुए हैं
मिन्नतें कर ली हैं खुदा से, बस यहीं डूबे रहें !
...
ये अपना देश है, यहाँ शिक्षण और प्रशिक्षण
उफ़ ! चहूँ ओर नेतागिरी के केम्प संचालित हैं !
...
आज फिर कोई, मूरत बदल के बैठा है
खामोश है, नहीं तो पहचान लेते हम !
...
करके गुनाह लोग, मस्ती में मस्त है
कोई बेक़सूर था जिसको फांसी चढ़ा दिए !
...
उफ़ ! दो लोग मिलकर, जज्बे मोहब्बत के निभा नहीं पाते
चलो ठीक है, तुम कहते हो तो, मोहब्बती मजहब ही सही !
...
इन नामों को देख कर, तो ऐसा लगता है 'उदय'
लोग असल नामों पर पर्दा डालने के फिराक में हैं !
...
कुछ लोग खुद को बेच के शान से जी रहे हैं 'उदय'
उफ़ ! अब उन्हें खुद पे शर्म नहीं, गर्व होने लगा है !!
...
"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Sunday, February 6, 2011
Saturday, February 5, 2011
उफ़ ! स्कूली बस्ते बोझा, और बच्चे मजदूर हुए हैं !!
भाई भतीजावाद ! ज्यों का त्यों जान पड़ा रहा है 'उदय'
बस चेहरे, नीयत, सीरत, गली, मोहल्ले बदले हुए हैं !
...
दिल को संभाल के रखना, अब हम धड़कन हुए हैं
सच ! हम, हम न रहे 'उदय', अब हम तुम्हारे हुए हैं !
...
सियासी दांव-पेंच और घातें नुकीली हुई हैं 'उदय'
सच ! बिना पैंतरेबाजी के मसले सुलझते कहाँ हैं !
...
सच ! फेसबुक कुंभ का मेला हुआ है 'उदय'
चलो किसी "अखाड़े" में बैठ के बातें कर लें !
...
जिस जमीं को खरीद के हम बर्बाद हुए हैं 'उदय'
उफ़ ! कोई है जो उसी को बेच के आबाद हुआ है !
...
चलो किसी ने हमें अपना माना तो सही
उफ़ ! भले किरायेदार ही सही !
...
खुशबू से तर-बतर हुआ, सारा जहां 'उदय'
किसी को नहीं खबर, आखिर माजरा है क्या !
...
अच्छे-बुरे के अपने अपने फलसफे हैं 'उदय'
सच ! कोई समझाये, कौन अच्छा-कौन बुरा !
...
किन्हीं बेरहमों ने स्कूली बच्चों पे जुल्म ढा दिए
उफ़ ! स्कूली बस्ते बोझा, और बच्चे मजदूर हुए हैं !
...
सिर्फ राजा के बाजे से धुन नहीं निकली थी 'उदय'
सच ! पूरी की पूरी आर्केस्ट्रा पार्टी हुनरमंद है !
...
भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, स्वीसबैंक खाताधारी, हुनरमंद हैं
क्यूं न इन्हें पद्मश्री, भारत रत्न, पुरुस्कारों से नवाजा जाए !
...
बस चेहरे, नीयत, सीरत, गली, मोहल्ले बदले हुए हैं !
...
दिल को संभाल के रखना, अब हम धड़कन हुए हैं
सच ! हम, हम न रहे 'उदय', अब हम तुम्हारे हुए हैं !
...
सियासी दांव-पेंच और घातें नुकीली हुई हैं 'उदय'
सच ! बिना पैंतरेबाजी के मसले सुलझते कहाँ हैं !
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सच ! फेसबुक कुंभ का मेला हुआ है 'उदय'
चलो किसी "अखाड़े" में बैठ के बातें कर लें !
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जिस जमीं को खरीद के हम बर्बाद हुए हैं 'उदय'
उफ़ ! कोई है जो उसी को बेच के आबाद हुआ है !
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चलो किसी ने हमें अपना माना तो सही
उफ़ ! भले किरायेदार ही सही !
...
खुशबू से तर-बतर हुआ, सारा जहां 'उदय'
किसी को नहीं खबर, आखिर माजरा है क्या !
...
अच्छे-बुरे के अपने अपने फलसफे हैं 'उदय'
सच ! कोई समझाये, कौन अच्छा-कौन बुरा !
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किन्हीं बेरहमों ने स्कूली बच्चों पे जुल्म ढा दिए
उफ़ ! स्कूली बस्ते बोझा, और बच्चे मजदूर हुए हैं !
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सिर्फ राजा के बाजे से धुन नहीं निकली थी 'उदय'
सच ! पूरी की पूरी आर्केस्ट्रा पार्टी हुनरमंद है !
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भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, स्वीसबैंक खाताधारी, हुनरमंद हैं
क्यूं न इन्हें पद्मश्री, भारत रत्न, पुरुस्कारों से नवाजा जाए !
...
लेबल:
शेर
सच ! लोग हैं जो सारा जहां बेचने के फिराक में हैं !!
कहाँ जाएं, किधर जाएं, कोई अपना नहीं दिखता
उफ़ ! जहां देखो, वहां मजहबी लोग बसते हैं !
...
खुद ही जल पडा हूँ, मत बुझाओ यारो
सच ! बस्ती में बहुत अन्धेरा है !
...
अब तन्हाई की बातों में, रक्खा क्या है 'उदय'
एक दौर था, महफिलों में रहे, तन्हाई साथ रही !
...
खुशी-गम का दौर तो चलता ही रहेगा 'उदय'
अमन के लिए, दो घड़ी बैठ के इबादत कर लें !
...
एक बार कह देते, चाहत में तुम्हारी, जान दे देते
सच ! रोज रोज मरने के झंझट से तो बच जाते !
...
ठंड बढ़ने लगी, बढ़ते गई, आग दिखी नहीं
सच ! शब्दरूपी अंगारे जलाकर ताप लेता हूँ !
...
उफ़ ! बदलता दौर है, सब शैतान बने बैठे हैं
किसको समझाएं, सब हांथों में खंजर लिए हैं !
...
जिधर देखो, उधर मायूसी का आलम है
उफ़ ! सब के सब खुदगर्ज हुए हैं !
...
आप ख़ामो-खां खरीदने पे तुले हो 'उदय' मियाँ
सच ! लोग हैं जो सारा जहां बेचने के फिराक में हैं !
...
गुट, गुटबाजी, गुटबाज, क्या आलम है 'उदय'
हिन्दी साहित्य, जगत नहीं मोहल्ला हुआ है !
...
उफ़ ! क्या घोर निंद्रा है, लोकतंत्र की 'उदय'
मच्छरनुमा दानव खून चूस-चूस के मोटे हुए हैं !
उफ़ ! जहां देखो, वहां मजहबी लोग बसते हैं !
...
खुद ही जल पडा हूँ, मत बुझाओ यारो
सच ! बस्ती में बहुत अन्धेरा है !
...
अब तन्हाई की बातों में, रक्खा क्या है 'उदय'
एक दौर था, महफिलों में रहे, तन्हाई साथ रही !
...
खुशी-गम का दौर तो चलता ही रहेगा 'उदय'
अमन के लिए, दो घड़ी बैठ के इबादत कर लें !
...
एक बार कह देते, चाहत में तुम्हारी, जान दे देते
सच ! रोज रोज मरने के झंझट से तो बच जाते !
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ठंड बढ़ने लगी, बढ़ते गई, आग दिखी नहीं
सच ! शब्दरूपी अंगारे जलाकर ताप लेता हूँ !
...
उफ़ ! बदलता दौर है, सब शैतान बने बैठे हैं
किसको समझाएं, सब हांथों में खंजर लिए हैं !
...
जिधर देखो, उधर मायूसी का आलम है
उफ़ ! सब के सब खुदगर्ज हुए हैं !
...
आप ख़ामो-खां खरीदने पे तुले हो 'उदय' मियाँ
सच ! लोग हैं जो सारा जहां बेचने के फिराक में हैं !
...
गुट, गुटबाजी, गुटबाज, क्या आलम है 'उदय'
हिन्दी साहित्य, जगत नहीं मोहल्ला हुआ है !
...
उफ़ ! क्या घोर निंद्रा है, लोकतंत्र की 'उदय'
मच्छरनुमा दानव खून चूस-चूस के मोटे हुए हैं !
लेबल:
शेर
Friday, February 4, 2011
... ये रियासत भ्रष्टाचारी हुनर की मिशाल है !!
इतने नाजुक थे हम, मोम बन पिघलते रहे
उफ़ ! लोग छूते भी रहे, साथ साथ डरते भी रहे !
...
अब खामोश बन कर, और बदनाम न करो
सच ! जो भी कहना है, ज़रा खुल कर कहो !
...
दम भरते रहे इश्क का, खुद पे नाज करते रहे
वादे, जज्बे, और दिल तोड़, गुनहगार चले गए !
...
सच ! जब भी आती है, मेरे चेहरे पे मुस्कान
लोग बेवजह ही मुझे, दीवाना समझ लेते हैं !
...
सच ! भले हो जाएं चकनाचूर, हम गद्दी नहीं देंगे
किसी के चीखने-चिल्लाने से, डरते नहीं हैं हम !
...
सच ! ये माना हम पैदाईशी अमीर नहीं हैं
ये रियासत भ्रष्टाचारी हुनर की मिशाल है !
...
गाँव, साप्ताहिक बाजार, और बचपन की यादें
सच ! एक एक पल, अब मुझे सताने लगे हैं !
...
गर तुमने आँखों में सपने संजोये न होते
कसम 'उदय' की, हम लौट के आये न होते !
...
सच ! ये दुनिया, नज़रों का धोखा हुई है 'उदय'
नीयत, सीरत, जज्बे, चाहत, सब बदले हुए हैं !
...
अब जीवन को समझने की जुर्रत नहीं होती
एक दिन आजमाया, सुबह से शाम हो गई !
...
टूट कर बिखरे सपने, हौसला न टूटने पाए
सच ! नए दौर में हम, नए सपने सझा लेंगे !
उफ़ ! लोग छूते भी रहे, साथ साथ डरते भी रहे !
...
अब खामोश बन कर, और बदनाम न करो
सच ! जो भी कहना है, ज़रा खुल कर कहो !
...
दम भरते रहे इश्क का, खुद पे नाज करते रहे
वादे, जज्बे, और दिल तोड़, गुनहगार चले गए !
...
सच ! जब भी आती है, मेरे चेहरे पे मुस्कान
लोग बेवजह ही मुझे, दीवाना समझ लेते हैं !
...
सच ! भले हो जाएं चकनाचूर, हम गद्दी नहीं देंगे
किसी के चीखने-चिल्लाने से, डरते नहीं हैं हम !
...
सच ! ये माना हम पैदाईशी अमीर नहीं हैं
ये रियासत भ्रष्टाचारी हुनर की मिशाल है !
...
गाँव, साप्ताहिक बाजार, और बचपन की यादें
सच ! एक एक पल, अब मुझे सताने लगे हैं !
...
गर तुमने आँखों में सपने संजोये न होते
कसम 'उदय' की, हम लौट के आये न होते !
...
सच ! ये दुनिया, नज़रों का धोखा हुई है 'उदय'
नीयत, सीरत, जज्बे, चाहत, सब बदले हुए हैं !
...
अब जीवन को समझने की जुर्रत नहीं होती
एक दिन आजमाया, सुबह से शाम हो गई !
...
टूट कर बिखरे सपने, हौसला न टूटने पाए
सच ! नए दौर में हम, नए सपने सझा लेंगे !
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शेर
Thursday, February 3, 2011
... ये और बात है विदेशों में हमारी जमीनें हैं !!
चापलूसी में गुजर करने का, लुत्फ़ ही अजीज है
सच ! कैसे गुजरता है दिन, मालुम नहीं पड़ता !
...
ताज ! तेरी खूबसूरती बाअदब है
मेरे महबूब का चेहरा, फीका लगे है !
...
पद्मश्री ! सम्मान तो सम्मान है 'उदय'
हमें तो रंग-रूप, बोली-वाणी से ऊंचा लगे है !
...
चैन नहीं मिलता, इधर ढूंढा, उधर ढूंढा
उफ़ ! किधर जाएं, कहीं सुकूं नहीं दिखता !
...
अब न ठहरेंगे, जो चल पड़े ये कदम
थक गए तो, कुछ देर हम सुस्ता लेंगे !
...
यूं ही पत्थर समझ, हांथ में ले लो हमको
खौफ का मंजर है, शैतानों की बस्ती है !
...
हम इजहार-ए-मोहब्बत करते रहे, तुम खामोश रहे
उफ़ ! अब हम ही गुनहगार हुए, लो कर लो बात !
...
चिराग, चाँद, तारे, सूरज, न भी हों, फर्क नहीं पड़ता
सच ! जब तुम साथ होती हो, उजाले साथ चलते हैं !
...
अरे भाई, पत्रकार हैं, इसका मतलब ये तो नहीं है 'उदय'
सच ! देश में लूट मची हो, और हम देखते रहें !
...
हम और हमारे लोग निकम्मे नहीं है 'उदय'
सच ! विदेशी बैंकों में हमारे खाते हैं !
...
भारत ! ये माना देश हमारा ही है 'उदय'
ये और बात है विदेशों में हमारी जमीनें हैं !!
सच ! कैसे गुजरता है दिन, मालुम नहीं पड़ता !
...
ताज ! तेरी खूबसूरती बाअदब है
मेरे महबूब का चेहरा, फीका लगे है !
...
पद्मश्री ! सम्मान तो सम्मान है 'उदय'
हमें तो रंग-रूप, बोली-वाणी से ऊंचा लगे है !
...
चैन नहीं मिलता, इधर ढूंढा, उधर ढूंढा
उफ़ ! किधर जाएं, कहीं सुकूं नहीं दिखता !
...
अब न ठहरेंगे, जो चल पड़े ये कदम
थक गए तो, कुछ देर हम सुस्ता लेंगे !
...
यूं ही पत्थर समझ, हांथ में ले लो हमको
खौफ का मंजर है, शैतानों की बस्ती है !
...
हम इजहार-ए-मोहब्बत करते रहे, तुम खामोश रहे
उफ़ ! अब हम ही गुनहगार हुए, लो कर लो बात !
...
चिराग, चाँद, तारे, सूरज, न भी हों, फर्क नहीं पड़ता
सच ! जब तुम साथ होती हो, उजाले साथ चलते हैं !
...
अरे भाई, पत्रकार हैं, इसका मतलब ये तो नहीं है 'उदय'
सच ! देश में लूट मची हो, और हम देखते रहें !
...
हम और हमारे लोग निकम्मे नहीं है 'उदय'
सच ! विदेशी बैंकों में हमारे खाते हैं !
...
भारत ! ये माना देश हमारा ही है 'उदय'
ये और बात है विदेशों में हमारी जमीनें हैं !!
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