Thursday, February 3, 2011

कैसा सुलगता जिस्म था, उफ़ ! तू जाने ना !!

उफ़ ! मत हो उदास सोचकर, कोई राहें बदल गया
चलते चलो, किसी मोड़ पे, फिर मिल जायेंगे कदम !
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चमकता बाजार, दमकती रौशनी, माल ही माल हैं 'उदय'
उफ़ ! देश का आलम, कोई मालामाल, तो कोई फटेहाल है !
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किसे काबिल, तो किसे नाकाबिल समझें 'उदय'
उफ़ ! कदम-दर-कदम, सीरत बदल रहे हैं लोग !
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तुम्हारे दिए जख्म, सहेज के रख छोड़े हैं
उफ़ ! वक्त-वे-वक्त उन्हें ही खरोंच लेता हूँ !
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सच ! सिमटा रहा कोई, सारी रात बांहों में
कैसा सुलगता जिस्म था, उफ़ ! तू जाने ना !
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जब से हम खानाबदोश हुए हैं 'उदय'
सच ! कोई है जो पता पूछता नहीं !
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नजर जब मूँद लो तुम, कहाँ खुबसूरती है
तुम्हारी नजर से देखूं, नज़ारे ही नज़ारे हैं !
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सुनो
भाई, हमें कुछ कहो, हमारी मर्जी जो करें
सच ! हम तो सारी धन-दौलत पीठ पे बांध ले जायेंगे !
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गुर्ज पे बैठ कोई, बुलंदियां सुना रहा है 'उदय'
सच ! उसकी बातें, मुझ तक नहीं आतीं !
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किसे जिद मानें, और किसे जिद्दी समझें 'उदय'
सच ! चाहत और जज्बात की हदें नहीं होतीं !
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लोग फुर्सत निकाल के, लगे हैं फिराक में
शायद काले धन का, कोई हल निकल आये !!

Wednesday, February 2, 2011

सच ! सब भूल-भुलैय्या हैं, खुद को संभालो यारो !!

हे राम ! समय बदला, लोग बदल गए
अब कोई चाहता नहीं, जीवन मेरा !
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सच ! जिन्दगी में उसूल, मुनासिब नहीं यारो
जंग और मोहब्बत, एक अलग नजरिया है !
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कितने खुश होते हैं, इल्जाम लगाने वाले
उफ़ ! बदनाम हुए, गुमनाम होने पाए !
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स्वीस बैंक, कालाधन, किसका है यह मुद्दा नहीं है 'उदय'
मुद्दा, जांच का मसला तो यह है कि यह वहां पहुंचा कैसे !
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तुम्हारे जज्बे कितने खामोश हुए हैं
उफ़ ! खुद में डूबी हो, बाहर जाओ !
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सच ! खुशनसीबी है पत्रकार हुए हो यारो
वतन को आस है, कुछ तो कर जाओ !
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घरौंदे से निकले, देश को घर मान लिया
घर तो संवारा हमने, घरौंदे लौट पाए !
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दरख्तों तले जन्नती डेरा है 'उदय'
चलो कुछ देर पनाह ले लें हम !
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सहेज के रक्खी हैं हमने दुआएं तेरी
अब तो बच्चे ही 'खुदा' लगते हैं !
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रूठ जाएगा, टूट जाएगा, झूठ का भ्रम
सत्य तो सत्य है, मानो या ना मानो !
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ब्लॉग, ट्यूटर, आर्कुट, क्लाज, चैटिंग, फेसबुक
सच ! सब भूल-भुलैय्या हैं, खुद को संभालो यारो !

क्यूं, क्योंकि, मुझे तो प्यार है ही तुमसे !!

तुम्हारे माथे पे, काला-लाल निशां
न जाने क्या, देखता रहा, कुछ अजीब सा
छोटा सा निशां, बहुत प्यारा, अनोखा
कुछ कचडा उड़ के चिपक गया हो जैसे
या तुमने लगा के कुछ रखा हो
पर मुझे, कुछ कुदरती सा लगा
था तो, लाल-काला सा ही, पर
ऐसा लगा, उसने तुम्हारी खुबसूरती में
चार चाँद लगा दिए हों !

मैं देखता रहा, निहारता रहा, कुछ देर
बहुत देर, सफ़र जो लंबा था
हिम्मत हुई, कुछ कहने, पूछने की
तुमसे कभी बात, जो हुई थी
बस ट्रेन के सफ़र में ही
तुम दिखतीं, मैं तुम्हें देखता हूँ
किन्तु, पहले कभी, मेरी नजर
तुम्हारे माथे पर, टिकी नहीं थी !

शायद इसलिए, आज पहली बार, तुम
मेरे इतने करीब थीं, बैठे थे हम
आमने सामने, सीट पर
संयोग था, खुशनसीबी भी मेरी
करीब से तुम्हें देखने का मौक़ा मिला
देखते देखते, स्टेशन पर ट्रेन रुकी
तुम उतरीं, चलीं गईं, मैं देखता रहा
क्या था, माथे पर निशां, सोचता रहा
जाने कब, मौक़ा मिले, पूछने का
मिलने का, बात करने का, तुमसे !

निशां जो भी था, जैसे भी था
तुम्हें खूबसूरत बनाया था उसने, सच
आज, मैं बहुत खुश हूँ, पास से देखा तुम्हें
तुम
, मेरी डायरी के पन्ने में
ओह, डायरी में कुछ पन्ने ही खाली बचे हैं
काश, तुमसे मेरी बात, जल्द बन जाए
सिर्फ बात नहीं, मुलाकातें भी हों
और तुम्हें मुझसे प्यार भी हो जाए
क्यूं, क्योंकि, मुझे तो प्यार है ही तुमसे !!

Tuesday, February 1, 2011

उफ़ ! मजलूम की आहें, अब ज़िंदा कहाँ हैं !!

कोई कहता रहा जिन्दगी किताब है मेरी
उफ़ ! वक्त नहीं था, पढ़ नहीं पाए !
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उसे यकीं नहीं था मौत का मेरी
उफ़ ! कब्र को टटोलने आती है !
...
उफ़ ! क्या गजब ढातीं हैं सहेलियां तेरी
तुम मिलती हो, और नहीं भी मिलतीं !
...
उसे गम था, और नहीं भी था
दिल जो टूटा था, वो मेरा था !
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क्या कहें, अफसोस है, वो उसूलों में रहा
सच ! नहीं तो आज, वो सरताज होता !
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कौन मानले, वो बहुत बड़ा है 'उदय'
सच ! हांथ छोटे हैं उसके, नीचे नहीं आते !
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चलो कुछ कदम और, हम साथ साथ चल लें
सच ! फिर मंजिलें जुदा जुदा हैं !
...
'उदय' कहता है चाहतों की घड़ी मुक़र्रर नहीं होती
जब जज्बात उमड़ ही आये हैं, चाहतें बयां कर दो !
...
धधक
कर फटने दो, अब दर्द धरती का 'उदय'
उफ़ ! मजलूम की आहें, अब ज़िंदा कहाँ हैं !
...
बिस्तर, खिड़की, रोशनी, और सुबह का मंजर
सच ! जहन में आज भी माँ का बसेरा है !
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तुम्हारी नींद को देखें, या देखें तुम्हें अब हम
सच ! तुम्हारे जागने से, मेरी रातें सुहानी हैं !
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नेता, अफसर, मंत्री, ने खूब गुल खिलाये हैं 'उदय'
सच ! तब ही तो प्राथमिकी में नाम दर्ज कराये हैं !
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सच ! गर तूने रश्में प्रेम की निभाई होतीं
'उदय' जाने, ये मंजिलें जाने कहाँ होतीं !
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सच ! आज की सब, बहुत मीठी लगी है
किसी ने मिलने की, खुद से पहल की है !
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कोई चाहता है समेटना मुझको, खुद में
सच ! किसी ने उम्मीद में बांहें बिखेरी हैं !
...
शैतानी रूह भी कांप जाती थी देख कर मुझको
सच ! माँ का साया था, हौसला था मुझमें !

उफ़, सच, मुझे, मोहब्बत हो गई, शायद ..... !!

प्यार किसे कहते हैं
क्या होता है
सच, मैं जानता नहीं था
लोग बातें करते
मुझे कुछ समझता नहीं था
फ़िल्में भी देखीं
किन्तु कुछ अहसास नहीं जगा
एक मित्र तो रोज
कुछ कुछ मुझसे ही
प्रेम की बातें बतियाता
फिर भी कुछ समझ सका
पर आज, सच, कुछ हुआ है मुझे
बेचैन सा हुआ हूँ
जाने क्या हुआ, क्यूं हुआ !

काश ! तुम
मेरे पास से गुज़री होतीं
गुजर भी जातीं
तो कोई बात होती
पर गुजरते गुजरते
तुम्हारा दुपटटा
काश ! मुझे
छुए बगैर निकल जाता
दुपट्टे ने, मुझे छुआ
मैं सिहर सा गया
शायद अभी तक, सिहरन है
मेरे जहन में
क्यूं, कुछ समझ से परे है !

मैं बेचैन, व्याकुल
इधर - उधर निहारता
कुछ तलाशता, शायद
मैं थम सा गया
दुपट्टे के इर्द-गिर्द
इन्हीं हालात में, मैं
एक मित्र से घंटों बातें
जाने क्या क्या !
उसने मुझे पकड़
हिलाया, झकझौर दिया
और चिल्ला के बोला
बता, किससे मोहब्बत हुई
कब हुई, कैसे हुई
मैं भौंचक्का सा, देखता रहा
पूछा, मोहब्बत, मुझे
हाँ, छलक रही है
उफ़, सच, मुझे
मोहब्बत हो गई, शायद
दुपट्टे ने ........ !!