"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए / तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"
Thursday, June 10, 2010
आत्म संतुष्टि
भिखारी बस अड्डे पे बैठ कर भीख मांग रहा था, सामने से एक सेठ गुजरा, भिखारी ने राग अलापा ... गरीब भूखा है कुछ दे दो सेठ जी भगवान भला करेगा ... सेठ जी अनसुनी करते हुए चले गये ... भिखारी मन में भगवान को याद करने लगा ... हे भगवान तू मुझे भी सेठ बना दे ... तभी अचानक सामने एक साधु प्रगट हो गये ... "बोल वत्स मुझे क्यों याद कर रहा है" .... प्रभु आप भगवान हैं ... हां बोल क्या चाहता है ... प्रभु भले में भिखारी का भिखारी रहूं पर मुझे एक बार करोडपति सेठ बना दो ... तथास्तु ... एक "गुरुमंत्र" देकर चले गये ... भिखारी आश्चर्य भाव में बैठकर चिंतन करने लगा ... फ़िर वह "गुरुमंत्र" का पालन करने लगा ... आठ-दस सालों में वह करोडपति सेठ बन गया ... संयोग से उसकी मेरे साथ जान पहचान हो गई .... उस समय में कठिन दौर से गुजर रहा था ... वह जानता था मेरे हालात ... फ़िर भी ... जब भी वह मिलता यही कहता ... भाई साहब चाय पिला दो भगवान आपका भला करेगा ... आज फ़िर उसी अंदाज में, चाय पिलाकर सेठ जी को रवाना किया ... उसके जाने के बाद मैं भगवान को याद करने लगा ... भगवान जी प्रगट हो गये .. बोल वत्स क्यों याद किया ... हे प्रभु कैसे कैसे लोगों को सेठ बना देते हो जो खुद चाय भी नहीं पी सकते ... वत्स ये बता उस भिखारी सेठ को चाय पिला कर तुझे कितनी खुशी मिली ... मतलब मेरी खुशी के लिये ... धन्य हैं आप प्रभु ... और धन्य है आपकी माया।
जीवन पथ ...
जीवन के छोटे से पथ पर
कदमों के छोटे से रथ पर
बढते हैं हम जीवन पथ पर
पग-पग रखकर बढते हैं हम
ऊंचे-नीचे जीवन पथ पर
मिलते हैं कुछ ऎसे पत्थर
देते हैं जो हमको टक्कर
खाते ठोकर - देते ठोकर
टक्कर देते बढते हैं हम
जीवन के छोटे से पथ पर
फ़िर मिलतीं कुछ पगडंडी हैं
पगडंडी पर मिलते कंकड
चुभते हैं पैरों को कंकड
छूट चले फ़िर पीछे कंकड
जीवन के छोटे से पथ पर
बढते बढते जीवन पथ पर
फ़िर मिलते मिट्टी के ढेले
ढेले भी कुछ अजब निराले
चुभते चुभते देते राहत
जीवन के छोटे से पथ पर
चलते चलते पहुंच रहे हैं
हम जीवन के सुन्दर पथ पर
इस पथ पर बिखरे हैं फ़ूल
मिले सुकूं सब को इस पथ पर
जीवन पथ पर ... जीवन पथ पर।
कदमों के छोटे से रथ पर
बढते हैं हम जीवन पथ पर
पग-पग रखकर बढते हैं हम
ऊंचे-नीचे जीवन पथ पर
मिलते हैं कुछ ऎसे पत्थर
देते हैं जो हमको टक्कर
खाते ठोकर - देते ठोकर
टक्कर देते बढते हैं हम
जीवन के छोटे से पथ पर
फ़िर मिलतीं कुछ पगडंडी हैं
पगडंडी पर मिलते कंकड
चुभते हैं पैरों को कंकड
छूट चले फ़िर पीछे कंकड
जीवन के छोटे से पथ पर
बढते बढते जीवन पथ पर
फ़िर मिलते मिट्टी के ढेले
ढेले भी कुछ अजब निराले
चुभते चुभते देते राहत
जीवन के छोटे से पथ पर
चलते चलते पहुंच रहे हैं
हम जीवन के सुन्दर पथ पर
इस पथ पर बिखरे हैं फ़ूल
मिले सुकूं सब को इस पथ पर
जीवन पथ पर ... जीवन पथ पर।
Wednesday, June 9, 2010
अंतिम कडुवा सच
... बहुत मीठापन है वाणी में ...
... पर सुना है मिठास ...
... अंत में छल कर जाती है ...
... क्यों होता है ऎसा ...
... मीठी चीजें क्यों देती हैं पीडा ...
... पता नहीं ये जीवन है ...
... यादें हैं कुछ मीठी ...
... तो कुछ कडवी हैं ...
... मीठा मुंह को भाता है ...
... और कडुवा तो बस कडुवा है ...
... खाना तो है मुश्किल ...
... पर हजम करना ...
... कहते हैं बुजुर्ग ...
...सुना है कडुवा होता तो है कडुवा ...
... पर तन मन को सुखदायी है ...
... क्यों हम दौड रहे हैं ...
... पीछे पीछे मीठे के ...
...क्यों गले नहीं लगाते कडुवे को ...
... कडुवी वाणी ... कडुवी है ...
... पर सदा रही सुखदायी है ...
... यही आज का सच है ...
... शायद अंतिम कडुवा सच है !!!
... पर सुना है मिठास ...
... अंत में छल कर जाती है ...
... क्यों होता है ऎसा ...
... मीठी चीजें क्यों देती हैं पीडा ...
... पता नहीं ये जीवन है ...
... यादें हैं कुछ मीठी ...
... तो कुछ कडवी हैं ...
... मीठा मुंह को भाता है ...
... और कडुवा तो बस कडुवा है ...
... खाना तो है मुश्किल ...
... पर हजम करना ...
... कहते हैं बुजुर्ग ...
...सुना है कडुवा होता तो है कडुवा ...
... पर तन मन को सुखदायी है ...
... क्यों हम दौड रहे हैं ...
... पीछे पीछे मीठे के ...
...क्यों गले नहीं लगाते कडुवे को ...
... कडुवी वाणी ... कडुवी है ...
... पर सदा रही सुखदायी है ...
... यही आज का सच है ...
... शायद अंतिम कडुवा सच है !!!
कम आन बेबी !!!
छोडो दोस्तो
अब समय बदल गया है
हां सच है
समय बदल गया है
सुहागरात की सेज तो है
पर अब वो घूंघट नहीं है
उठाने-उठवाने का
झंझट भी नहीं है
हाईटेक जमाना है
अब किसे शर्माना है
छोडो, जाने दो
स्टाईल तो है
पर अब हिन्दी का नहीं
अंग्रेजी का है
कम आन बेबी
लेटस डाई फ़ार ईच अदर
वी मेड फ़ार ईच अदर !
अब समय बदल गया है
हां सच है
समय बदल गया है
सुहागरात की सेज तो है
पर अब वो घूंघट नहीं है
उठाने-उठवाने का
झंझट भी नहीं है
हाईटेक जमाना है
अब किसे शर्माना है
छोडो, जाने दो
स्टाईल तो है
पर अब हिन्दी का नहीं
अंग्रेजी का है
कम आन बेबी
लेटस डाई फ़ार ईच अदर
वी मेड फ़ार ईच अदर !
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