Thursday, August 15, 2013

फटेहाल ...

गुजरती उम्र पर, तनिक तो तरस खाओ यारो
कब्र में पाँव लटके हों तो यूँ मटका नहीं करते ?
...
तू इत्मिनान रख साक़ी, हम शराबी हैं मदहोश नहीं हैं
गर लार टपकी भी तो इन आँखों से ही चख लेंगे तुझे ?

अरे कुछ तो कह, भले चुप-चाप कह
हमें आती है, तेरी आँखों की बोली ?

हुशियारी में तो वो गजब माहिर हैं 'उदय'
मगर अफसोस, आज भी फटेहाल हैं वो ?

रेज़गारी का चलन तो कब का बंद हो गया है दोस्त
इस खनखनाहट से तुम किसे डरा रहे हो आज ??

3 comments:

अनुपमा पाठक said...

All two liners excellent!!!

अरुण चन्द्र रॉय said...

कविता में कड़वा सच है। बहुत सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य बखानती,
रक्त उफानती।