Friday, October 1, 2010

बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

सच तो ये है, ये गांधी का वतन है
सुनता नहीं कोई, पढ़ता नहीं कोई
गांधी की राहों पे चलता नहीं कोई
सत्य-अहिंसा का पाठ पढाता तो हूँ मैं
पर, सत्य-अहिंसा का पुजारी नहीं हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

गांधी के तीनों बन्दर, बसते हैं जेहन में
उन्हीं को देख-देख बढ़ता रहा हूँ
भाईचारे सदभाव का जब उठता है मुद्दा
मुंह पे हाथ रख बैठा रहा हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

हिन्दू-मुस्लिम समभाव, सदभाव
एकता की जहां होती है चर्चा
वहां कान पे हाथ होते हैं मेरे
वहां बैठ कुछ मैं सुनता नहीं हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

जहां कत्ले-आम होते हैं हर पल
जलती हैं बस्ती, टूटते हैं घरौंदे
सच तो ये है, मैं होता वहीं हूँ
मगर आँखें मेरी कुछ देखती नहीं हैं
आँखों पे रख हाथ बैठा रहा हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

आज देश के रक्षक, खुद भक्षक हुए हैं
भ्रष्टाचार, घुटाले, सरेआम हुए हैं
लुटता रहा हूँ, लूटता भी रहा हूँ
कहता, सुनता, देखता, कुछ नहीं हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !!

18 comments:

डॉ टी एस दराल said...

सत्य के दर्शन कराती रचना ।

बापू और लाल बहादुर को शत शत नमन ।

Apanatva said...

badee sunder rachana......
aam aadmee kee soch ko bhee ingit karatee.....
Mahan aatmao ko naman....

समयचक्र said...

bahut sateek rachana...abhaar

मनोज कुमार said...

चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।
नमन बापू!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सत्य को कहती रचना ..सच बन्दर ही बन कर रह गए हैं ...

प्रवीण पाण्डेय said...

आज का मार्मिक सत्य।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर ओर सत्य

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।
कोटि-कोटि नमन बापू, ‘मनोज’ पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

ashokbajajcg.com said...

बहुत सुन्दर रचना .बधाई

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

bahut barhiya uday bhai. aabhar.

Rahul Singh said...

बंदरों का यह प्रतिबिंब आज की मुंह चिढ़ाती तस्‍वीर है, बधाई.

Rahul Singh said...

बंदरों का यह प्रतिबिंब आज की मुंह चिढ़ाती तस्‍वीर है, बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

सदा said...

एकदम सच्‍ची बात कही है आपने इस अभिव्‍यक्ति में, बधाई सुन्‍दर लेखन के लिये ।

vandan gupta said...

सत्य को उजागर करती रचना।

अनामिका की सदायें ...... said...

प्रभावशाली सटीक रचना.

Udan Tashtari said...

गजब दर्शन!

दिगम्बर नासवा said...

सत्य दर्शन .... अच्छा व्यंग है उदय जी ....