Monday, June 8, 2009

शेर - 70

शेर - 70
मेरे अंदर ही बैठा था ‘खुदा’, मदारी बनकर
दिखा रहा था करतब, मुझे बंदर बनाकर।
शेर - 69
कब तलक तुमको अंधेरे रास आयेंगे
झाँक लो बाहर, उजाले-ही-उजाले हैं ।
शेर - 68
छोड के वो मैकदा, तन्हा फिर हो गया
हम दोस्त नहीं , तो दुश्मन भी नहीं थे।
शेर - 67
हम भी करेंगे जिद, अमन के लिये
देखते हैं, तुम कितने कदम साथ चलते हो।
शेर - 66
दिखाते हो वहाँ क्यूँ दम, जहाँ पे बम नही फटते
बच्चों के खिलौने तोडकर, क्यूँ मुस्कुराते हो।

12 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही उम्दा शेर , पहल शेर तो हम सब की जिन्दगी से मिलता जुलता है.

परमजीत सिहँ बाली said...

sabhi bahut badhiyaa sher hai.

परमजीत सिहँ बाली said...

sabhi bahut badhiyaa sher hai.

Vinay said...

badhiya aashaar...

दिगम्बर नासवा said...

मेरे अंदर ही बैठा था ‘खुदा’, मदारी बनकर
दिखा रहा था करतब, मुझे बंदर बनाकर।

लाजवाब लिखा है आपने ..................... जीवन का दर्शन ........... खूबसूरत शेर

हरकीरत ' हीर' said...

छोड के वो मैकदा, तन्हा फिर हो गया
हम दोस्त नहीं , तो दुश्मन भी नहीं थे।

वाह...वाह...बहुत खूब.....!!

दिखाते हो वहाँ क्यूँ दम, जहाँ पे बम नही फटते
बच्चों के खिलौने तोडकर, क्यूँ मुस्कुराते हो।
लाजवाब.....!!

Alpana Verma said...

दिखाते हो वहाँ क्यूँ दम, जहाँ पे बम नही फटते
बच्चों के खिलौने तोडकर, क्यूँ मुस्कुराते हो।

bahut hi umda sher!

Urmi said...

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत ही बढ़िया शेर लिखा है आपने ! बहुत खूब!

sanjiv gautam said...

भाई उदय जी टिप्पणी के लिये आत्मिक आभार. आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. आपके अन्दर बहुत कुछ है. आपकी अनमोल बातें मुझे बहुत अच्छी लगीं. शेर कहने के लिये क्या किसी को उस्ताद भी बनाया है/सलाह लेते हैं यदि नहीं तो एक बार www.subeerin.blogspot.com को देखें आदरणीय सुबीर जी वहां ग़ज़ल की क्लास चला रहे हैं. आपको बहुत फ़ायदा होगा आप देखेंगे कि आप कैसे निखर कर आते हैं.
माफ़ करियेगा मैंने बिना मांगे मशवरा दिया है.
कारण मुझे आपके अन्दर बहुत कुछ दिखाई दे रहा है.

vijay kumar sappatti said...

bahut sundar boss.

sabhi sherio ko padhkar dil ek alag se ahsaas me chala gaya ..

behatreen lekhan . yun hi likhte rahe ...

badhai ...

dhanywad.
vijay

pls read my new poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

शोभना चौरे said...

कब तलक तुमको अंधेरे रास आयेंगे
झाँक लो बाहर, उजाले-ही-उजाले हैं ।
lajvab sher

vandan gupta said...

har sher lajawaab.
mere blog par aane ke liye dhanyavaad