Sunday, September 16, 2018

वक्त-वक्त की बात

01

एक और अनर्गल कविता ...
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आधी लूट
पूरी लूट
कच्ची लूट
पक्की लूट

टमाटर लूट
प्याज लूट
डीजल लूट
पेट्रोल लूट
बैंक लूट
रुपया लूट
लूट सके तो लूट, भाग सके तो भाग ..

चौकीदार अपना, दरोगा अपना, पंच-सरपंच सब अपने
बस ..
तू ... लूट .... लूट .... लूट .....

लूट .. लूट के लूट ... फिर लूट के लूट ....

लंदन जा .. न्यूयार्क जा .. मेलबोर्न जा .. पेरिस जा
कहीं भी जा के बैठ ...

अँगूठा दिखा .... पीठ दिखा ... अकड़ पकड़ के बैठ ..
तेरी मर्जी .... हा-हा-हा .. तेरी मर्जी ... !!

~ उदय

02

14 सितंबर ..

"हिन्दी दिवस ... आज की हिन्दी पर चाटूकारों का कब्जा है और वे इसे अपने चंगुल से निकलने नहीं देंगे .. किन्तु ... जो हिन्दी से प्रेम करते हैं वे करते रहेंगे !"

03

कोई रंज नहीं है कि वे इकरार से बचते हैं
इतना काफी है कि वो इंकार नहीं करते !

04

वक्त .... वक्त .... वक्त ...... वक्त-वक्त की बात है 'उदय'
कभी उन्हें काजल से प्रेम था औ अब हिना प्यारी हुई है !

05

इनके .. उनके .. किन-किन के सवालों के वो जवाब दें
सच तो ये है ..
न हिन्दू .. न मुसलमां ... वो कुर्सी के ज्यादा करीब हैं !

06

इधर हम तन्हा ..…............ उधर वो तन्हा
इस मसले का कोई हल तो बताओ 'उदय' !

07

वो इतने करीब से गुजरे हैं
लगता नहीं कि बहुत दूर पहुँचे होंगे !

( यहाँ करीब से आशय ..  जानबूझकर टकराते-टकराते बच कर निकलने से है )

08

चोट दौलत की ... जिस घड़ी उनका सीना चीर देगी
देखना ... उस दिन उन्हें भी मुफ़लिसी भाने लगेगी !

09

दरअसल, हम भी .. उनकी तरह ही तन्हा हैं
पर ये बात .. जा के ... कौन समझाए उन्हें !

~ उदय

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब

'एकलव्य' said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १७ सितंबर २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

Sudha Devrani said...

वाह!!!
बहुत सुन्दर...